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ईरान में अटके बासमती के 5 अरब रुपये

दिलीप कुमार झा / मुंबई August 09, 2018

द्विपक्षीय सौदों के तहत भारत के कुछ निजी बासमती ब्रांडों का ईरानी आयातकों ने भुगतान नहीं किया है। इस वजह से चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के दौरान भारत के बासमती चावल निर्यात में गिरावट आई है। सरकार ने स्थानीय निर्यातकों को ईरानी आयातकों केसाथ निजी लेनदेन से बचने की चेतावनी दी है।

कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) द्वारा जुटाए गए आंकड़ों से पता चलता है कि 2018 की अप्रैल-जून तिमाही में भारत का बासमती चावल निर्यात 7.2 प्रतिशत तक गिरकर 11.7 लाख टन हो गया जबकि पिछले साल समान अवधि में यह 12.6 लाख टन था।

भारत का बासमती चावल निर्यात फिलहाल ईरान में दर्जनों आयातकों द्वारा भुगतान न किए जाने के संकट का सामना कर रहा है। ईरान भारत के ब्रांडेड और गैर-ब्रांडेड बासमती चावल का सबसे बड़ा आयातक है। जानकार सूत्रों ने कहा कि मुख्य रूप से भारत के निजी बासमती चावल निर्यातकों के साथ निजी तौर पर व्यापार करने वाले कई आयातकों ने अनुमानित रूप से करीब पांच अरब रुपये का भुगतान नहीं किया है। अपनी पहचान जाहिर न करने की शर्त पर एपीडा के एक वरिष्ठï अधिकारी ने कहा कि भारत से निजी सौदों के तहत किए गए मोहसिन और आवाज जैसे निजी ब्रांडों के बासमती चावल निर्यात का आयातकों द्वारा भुगतान न किए जाने के संबंध में एपीडा को निर्यातकों से शिकायतें मिली हैं। 

आमतौर पर निर्यातकों को एपीडा से प्रमाण-पत्र मिलता है और उचित तरीके से निर्यात प्रक्रिया का पालन किया जाता है। व्यापारिक सूत्रों के अनुसार इन ब्रांडों के अंतर्गत आयातकों को बड़ी मात्रा में किए गए निर्यात के एवेज में भुगतान प्राप्त न होने की वजह से बासमती चावल निर्यात करने वाली कई बड़ी कंपनियां अपने बैंकरों की गैर-निष्पादित संपत्ति (एनपीए) बन गई हैं। भुगतान में इस चूक के सबसे बड़े शिकार मोहसिन और आवाज बने हैं।

व्यापारिक सूत्रों के मुताबिक कुछ भारतीय निर्यातक विदेशी आयातकों से पैसा प्राप्ति की गारंटी सुनिश्चित करने वाले साख पत्र (एलसी) केबिना ही ईरानी आयातकों केसाथ निजी तौर पर व्यापार कर रहे थे। ईरानी आयातक अब तक भारतीय रुपये में भुगतान किया करते थे। इन आयातकों में से अधिकतर नियमित हैं। इसलिए वहां से मिलने वाली राशि बिना किसी समस्या के भारतीय निर्यातकों को मिल जाती थी। ईरानी आयातकों द्वारा भुगतान न किये जाने की बात काफी मायने रखती है। अप्रैल-जून तिमाही में भारत के कुल बासमती चावल निर्यात में ईरान का योगदान 36 प्रतिशत था।

एपीडा के अधिकारी के अनुसार ईरान को निर्यात किए गए भारत के बासमती चावल के लगभग एक-तिहाई हिस्से पर भुगतान न किए जाने का संकट मंडरा रहा है। अधिकारी ने कहा कि हम इस मसले को ईरान के व्यापार मंत्रालय के सामने ले गए हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि भारतीय निर्यातकों को ईरानी आयातकों से पैसा वसूलने के लिए कानूनी रास्ता ही अपनाना पड़ेगा। यह भारत के बासमती चावल निर्यात के लिए एक झटका है।

इस मामले पर गंभीरता से विचार करते हुए एपीडा ने निर्यातकों को बासमती चावल के अनुबंध न करने का सुझाव दिया है और इन निजी ब्रांडों में बासमती चावल निर्यात के लिए पंजीकरण-सह-आवंटन प्रमाण-पत्र (आरसीएसी) जारी करने को कहा है। एपीडा का सुझाव है कि इन ब्रांडों में बासमती चावल निर्यात के अनुबंध के लिए एपीडा को प्रार्थना पत्र देने से पहले भुगतान का पुख्ता प्रबंध कर लिया जाए।

इस घटनाक्रम की पुष्टि करते हुए ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के कार्यकारी निदेशक राजन सुंदरेशन ने कहा कि एपीडा ने हमारी सिफारिशों के आधार पर व्यापार संबंधी परामर्श जारी किया है। ईरान भारत का सबसे बड़ा बासमती चावल आयातक है। अमेरिका की ओर से व्यापारिक प्रतिबंध लगाए जाने की वजह से ईरानी आयातक भारतीय बासमती चावल निर्यातकों को रुपये में भुगतान करते हैं। ऐसे कई लेनदेन एपीडा समेत विनियामकों और बैंकों को शामिल किए बिना निजी आधार पर किए जाते हैं।

कोहिनूर ब्रांड के बासमती चावल के निर्यातक और उत्पादक तथा कोहिनूर फूड्स लिमिटेड के संयुक्त प्रबंध निदेशक गुरनाम अरोड़ा ने कहा कि कुछ निजी ब्रांड के डिफॉल्ट मामले पिछले कुछ महीने के दौरान प्रकाश में आए हैं जो भविष्य में ईरान को किए जाने वाले भारत के बासमती चावल निर्यात को नुकसान पहुंचा सकते हैं। दूसरी तरफ ईरान में स्थानीय चावल के जोरदार उत्पादन से बासमती चावल निर्यात में गिरावट आई है। ये हालात कुछ महीने में सामान्य हो सकते हैं।
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