बिजनेस स्टैंडर्ड - नियामकों की क्षमता बढ़ाने से ही बन पाएगी बात
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नियामकों की क्षमता बढ़ाने से ही बन पाएगी बात

सोमशेखर सुंदरेशन /  August 09, 2018

पिछले लेख में मैंने प्रतिभूति अपील अधिकरण (एसएटी) में रिक्तियों के चलते कामकाज प्रभावित होने का जिक्र किया था। अधिकरण अक्सर आलोचनाओं के घेरे में आ जाते हैं। सवाल उठाया जाता है कि ये अधिकरण स्टाफ से जुड़ी मुश्किलों के बावजूद किस तरह अदालतों की भूमिका निभा पाते हैं। अक्सर इन अधिकरणों की तरफ से बयान आता है कि उन्हें जरूरी स्टाफ नहीं मिल पा रहा है।

हालांकि सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में इसका अभाव दिखता है कि अदालतों की तरह काम करने वाले इन अधिकरणों के स्टाफ की नियुक्ति कैसे होती है, उन्हें जरूरी स्टाफ क्यों नहीं मिल रहा है और ये अधिकरण क्या अपनी जिम्मेदारी पूरी करने लायक हैं?

पहला, भारत में नियमन ढांचा इस तरह बना है कि हरेक काम के लिए एक नियामक बनाया गया है और उसके फैसलों के खिलाफ अपील की सुनवाई के लिए एक अधिकरण होता है। अधिकरण के फैसलों के खिलाफ अपील सीधे उच्चतम न्यायालय में जाती है। जहां विमर्श मुख्यत: इस पर होता है कि अधिकरण उच्चतर न्यायपालिका का विकल्प बनते जा रहे हैं। 

नियामक की व्यवस्था वाले हरेक कानून में नियामक संस्था को दीवानी अदालत की कुछ विशिष्ट एवं सीमित शक्तियां सौंपी जाती हैं। लेकिन असल सवाल यह है कि क्या ये नियामक न्यायाधीश की भूमिका निभाने और अदालत की तरह इंसाफ दिला पाने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं? अमूमन इन कानूनों में एक व्यापक मूलभूत राजाज्ञा निहित होती है कि ‘नियामक प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का अनुसरण करेगा’। लेकिन इसके मायने और वास्तविक कार्य इसे एक बेलगाम घोड़ा बना देते हैं। किसी एक मापदंड से संचालित होने वाले दो नियामक प्रकृति में पूरी तरह जुदा हो सकते हैं। मसलन, रिकॉर्ड का मुआयना करने की इजाजत देने के मामले में दो नियामकों का रवैया पूरी तरह अलग हो सकता है। यहां तक कि एक नियामकीय संस्था के भीतर भी किसी आरोपी को मामले से जुड़े रिकॉर्ड देखने की इजाजत देने को लेकर दो अफसरों की राय अलग हो सकती है। रिकॉर्ड देखने से वंचित होने से खुद को गलत तरीके से आरोपित मानने वाला व्यक्ति अपील अधिकरण का रुख करता है और कई बार यह मामला वर्षों तक चलता रहता है। 

दूसरा, नियामकों के गठन का प्रावधान करने वाले कानून आम तौर पर संबंधित मसले पर दीवानी अदालतों के अधिकार-क्षेत्र को दरकिनार कर देते हैं। इसके चलते अक्सर भारी दुविधा की स्थिति बनती है। एक नियामक दंड देने और नियम अनुपालन के साथ ही उपचारात्मक व्यवस्था भी कर सकता है। लेकिन एक नियामक निजी सुनवाई करने, साक्ष्यों को तौलने और मुआवजे के आकलन में सक्षम नहीं होगा। अगर आपको लगता है कि किसी नियामकीय कानून के तहत हासिल आपके अधिकारों का हनन हुआ है और उसके एवज में क्षतिपूर्ति चाहते हैं तो आप नियामक के समक्ष खुद याचिका नहीं दायर कर सकते हैं। अगर आप सीधे नियामक के पास जाते हैं तो वह आपकी याचिका की प्रासंगिकता और दायरे को देखते हुए उसे स्वीकार करने के प्रति अनिच्छुक हो सकता है। यह भी हो सकता है कि वह इसे अपना दायित्व ही न माने। अगर आप नियामक को इसके लिए मजबूर करना चाहेंगे तो उसके लिए संवैधानिक अदालत में रिट याचिका दायर करनी होगी। अगर नियामक को इस शिकायत पर कार्यवाही शुरू करनी पड़ती है तो संभव है कि सवालों के घेरे में रहे नियामकीय अधिकारी की शिकायतकर्ता और आरोपी व्यक्ति के बीच विरोधात्मक कार्यवाही चलाने की मंशा और चाहत न हो। 
दूसरी तरफ एक नियामक गलत काम करने वाले शख्स को दंडित करने के लिए सक्षम होगा। नियामक गलत व्यक्ति को उपचारात्मक निर्देश भी दे सकता है। लेकिन विशेष शक्तियों के बगैर नियामक क्षतिपूर्ति के दावे की कार्यवाही नहीं चला सकता है। नियामक को ऐसी शक्तियों से लैस करने के लिए कानून में संशोधन किए जा सकते हैं लेकिन इसमें सावधानी भी बरतनी होगी। 
असल में आदेश पलटने की शक्ति पहली बार सेबी अधिनियम 1992 में दी गई थी। लेकिन उससे केवल इतना हो सकता है कि गलत काम करने वाला शख्स दोषपूर्ण तरीके से अर्जित लाभ का उपयोग न कर सके। अगर वह लाभ उसके पास नहीं है तो फिर यह प्रावधान भी उससे वसूली नहीं कर पाएगा। अगर नियामक के पास नुकसान के आकलन और हर्जाने के भुगतान का आदेश देने की शक्ति नहीं है तो सामान्य अदालत के न्याय-क्षेत्र को बेदखल नहीं किया जा सकेगा। 
हमें अपने नियामकों को सशक्त करने के बारे में सोचने की जरूरत है। यह भी देखना होगा कि नियामक को अदालत की पूरी भूमिका निभानी चाहिए या नहीं। अगर उसे अदालत की भूमिका निभाने के लिए अधिकार सौंपे जाते हैं तो फिर उसी तरह का हंगामा मचेगा जैसा अधिकरणों पर होता है। आज नियामक काफी काम इसलिए कर पाते हैं कि वे भले ही देखने और काम करने में अदालत की तरह हैं लेकिन असल में अदालत नहीं हैं।
आखिर में, प्राकृतिक न्याय के समुचित अनुपालन के लिए गठित निकाय के न्यायिक प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण की गंभीर कोशिशें काफी जरूरी हैं। नैसर्गिक न्याय के अनुपालन संबंधी विवादों पर अधिक संसाधन लगाना न केवल समय बल्कि नियामक के वित्तीय संसाधनों का भी अपव्यय है। एक ही नियामकीय संस्था के भीतर उठाए जाने वाले कदमों के बारे में एकरूपता होनी चाहिए। कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संघर्ष में जगह तलाशना काफी नहीं है। अगर कार्यपालिका को लगता है कि इसकी एजेंसियां न्यायाधीश की भूमिका निभा सकती हैं तो उसे नियामकों की क्षमता बढ़ाने में निवेश करना चाहिए ताकि निष्पक्ष, वस्तुनिष्ठ, सुदृढ़ और संयमित तरीके 
से अदालत की तरह कार्यवाही चल सके।
(लेखक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)
Keyword: SAT, प्रतिभूति अपील अधिकरण, Regulation, Regulator, न्यायाधीश,
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