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सहज और निष्पक्ष हो बैंकिंग व्यवस्था

देवाशिष बसु /  August 09, 2018

बैंकिंग के नियमन आसान प्रवेश की अनुमति नहीं देते। यही वजह है कि इस क्षेत्र में उतनी प्रतिस्पर्धा नहीं है जो होनी चाहिए। कोई भी कारोबार जो प्रतिस्पर्धा से सुरक्षित होगा वह आगे चलकर उपभोक्ता विरोधी हो जाएगा। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक विभिन्न बैंकों ने अपने जमाकर्ताओं से जुर्माने के रूप में 50 अरब रुपये की राशि जुटाई है।

बैंक लंबे समय से ऐसा करते आ रहे हैं। वे मनमाने ढंग से बेतरह शुल्क लगाते हैं, जुर्माना लगाते हैं, गैर वित्तीय प्रतिबंध लगाते हैं और उत्पादों को गलत ढंग से बेचते हैं जिससे उन्हें कमीशन मिलता है और उपभोक्ताओं को नुकसान होता है। यहां हम रघुराम राजन की कही एक शानदार बात का जीता जागता उदाहरण देख सकते हैं। उन्होंने कहा था कि अक्सर पद पर मौजूदा पूंजीपति, पूंजीवाद को परास्त करने का रास्ता तलाश कर लेते हैं। यह बात 2003 की पुस्तक सेविंग कैपिटलिज्म फ्रॉम कैपिटलिस्ट्स की केंद्रीय अवधारणा है जिसका उन्होंने सह लेखन किया था।

मौजूदा दौर में अकादमिक जगत के लोग जो अनुशंसाएं करते हैं, उनका क्रियान्वयन वे शायद ही करा पाते हैं। परंतु संयोग ऐसा रहा कि राजन को देश के केंद्रीय बैंक का गवर्नर बना दिया गया। माना जा रहा था कि वह अपनी कही बात को लागू करेंगे और देश में कई नए बैंक देखने को मिलेंगे।

परंतु आरबीआई ने शुरुआत में केवल सार्वभौमिक बैंक को लाइसेंस दिया और वह था आईडीएफसी बैंक। यह चयन काफी विचित्र था। तब एक डिप्टी गवर्नर ने कहा कि एक बैंक को लाइसेंस जारी करने पर सवाल उठ सकते हैं। दूसरा खुशकिस्मत बैंक निकला बंधन बैंक। यानी सन 2000 के आरंभ से हमें केवल दो नए बैंक मिले। उस समय कोटक महिंद्रा और येस बैंक को इजाजत दी गई थी। इस दर से चलें तो 2024 तक दो और बैंकों को इजाजत मिल सकती है। भारतीय स्टेट बैंक के छह बड़े अनुषंगी बैंकों के उसमें विलय के बाद प्रतिस्पर्धा और विकल्प बहुत कम हो गए हैं। आरबीआई ने सूक्ष्म वित्त बैंकों और भुगतान बैंकों के परिचालन की भी अनुमति दी है लेकिन वे गति नहीं पकड़ सके हैं। 

इस बीच दुनिया के कई हिस्सों में वित्तीय फर्म ऐसे तकनीक आधारित प्रयोग कर रही हैं जिनसे लागत में कमी आई है, पहुंच में सुधार हुआ है और सेवा का स्तर भी सुधरा है। वर्ष के आरंभ में जब यह अफवाह उड़ी थी कि एमेजॉन सह-ब्रांडेड उत्पाद पेश कर सकता है जिसे अमेरिकी युवाओं को ध्यान में रखकर जारी किया जाएगा। कंपनी पहले ही चेज के जरिये सह-ब्रांडिंग वाला क्रेडिट कार्ड जारी कर चुकी है जबकि एमेजॉन कैश/पे (ई वॉलेट) उपभोक्ताओं को सीधे एमेजॉन के खाते में पैसा जमा करने की सुविधा देता है। बीते एक साल में एमेजॉन ने ऑनलाइन बिक्री करने वाले कारोबारियों को एक अरब डॉलर का ऋण दिया है। अमेरिकी सलाहकार कंपनी बेन ऐंड कंपनी ने 22 देशों के 1,35,000 उपभोक्ताओं का सर्वेक्षण करके पाया कि अमेरिका में आधे से अधिक लोगों को तकनीकी कंपनी से वित्तीय सेवा उत्पाद खरीदना पसंद आएगा। 

हमारे आसपास इससे भी बड़ा बदलाव हो रहा है। 62 करोड़ से अधिक लोग अलीपे का इस्तेमाल कर रहे हैं। वॉलस्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के मुताबिक एक बार जब लोग पैसा अपने बैंक खाते से ई वॉलेट में स्थानांतरित कर देते हैं तो इसमें से अधिकांश

राशि वापस नहीं लौटती। अलीपे अलीबाबा समूह का है जिसमें अंट फाइनैंशियल भी शामिल है। अंट फाइनैंशियल दुनिया का सबसे बड़ा मुद्रा बाजार फंड चलाता है। उसने पांच साल में 100 अरब डॉलर का ऋण दिया है। उसने एक ऑनलाइन बैंक शुरू किया है जो अलीबाबा के साथ उपभोक्ता के लेनदेन की जानकारियां जुटाकर तत्काल ऋण स्वीकृत कर देता है। बेन के मुताबिक 2017 में उपभोक्ताओं ने अलपे के माध्यम से 17 खरब डॉलर का लेनदेन किया। यह पेपल के जरिये किए गए लेनदेन से पांच गुना अधिक है।

जापान की प्रमुख ई-कॉमर्स कंपनी राकुतेन देश के सबसे बड़े इंटरनेट बैंक और लेनदेन के हिसाब से तीसरी सबसे बड़ी क्रेडिट कार्ड कंपनी चलाती है। राकुतेन के कुल राजस्व में वित्तीय सेवा की हिस्सेदारी 40 फीसदी है। 

ये तो हुए उन ई-कॉमर्स कंपनियों के उदाहरण जो उपभोक्ताओं के आंकड़ों का इस्तेमाल बैंकिंग के कुछ सहज कामकाज करने के लिए करती हैं। नए दौर की तकनीक आधारित बैंकिंग के सबसे प्रेरक प्रयोगों में से एक तब सामने आया जाब 2009 में बने स्टार्टअप सिंपल ने अपने उपभोक्ताओं को नि:शुल्क चेकिंग अकाउंट और उनके लेनदेन के आंकड़ों का गहन विश्लेषण प्रदान करना शुरू किया। जैसा कि कई उपभोक्ता अनुकूल स्टार्टअप के साथ होता है, सिंपल के संस्थापक जोशुआ रीच के (शमीर करकल के साथ मिलकर ) इस संस्थान को शुरू करने के पीछे उनका निजी अनुभव जिम्मेदार था। बड़े बैंक उनसे ऊंचा और मनमाना ओवरड्राफ्ट शुल्क वसूल करते थे।

वे उन बैंकों की ग्राहक सेवाओं से भी त्रस्त थे। रीच ने अपने ब्लॉग में लिखा, ‘खुदरा व्यावसायिक सेवाओं में ब्रांड को लेकर उदासीनता प्राय: देखने को मिलती है।’ इसमें सबसे शीर्ष बिक्री चैनल है शाखा। बैंक अपनी नई योजनाओं को ग्राहकों तक पहुंचाने के लिए अपनी शाखा की सहायता लेते हैं। उपभोक्ता सेवा और शाखा में मुस्कराते हुए परिवारों के चेहरे उनके बैनरों पर छपे होते हैं। 

रीच ने आगे बताया कि कैसे जब वे अपने अमेरिकन एक्सप्रेस के खाते में लॉग इन करते हैं तो स्क्रीन का एक छोटा हिस्सा काम का होता है और बाकी ढेर सारी जगह का इस्तेमाल कुछ न कुछ बेचने के लिए किया जाता है। वह लिखते हैं कि अगर बैंक मेरे पैसे को लेकर उचित समझ दिखाता है और मुझे प्रसन्न करता है तो मैं शायद अन्य चीजों में रुचि भी लूं। परंतु अगर मूलभूत सूचना और चर्चा ही सही नहीं रही तो चिंता होना स्वाभाविक है। तब मैं नई योजनाओं पर भला क्यों विचार करूंगा? 

 

इसका मुकाबला करने के लिए ही सिंपल की शुरुआत की गई। इसके लिए कुछ सिद्घांत तय किए गए: उपभोक्ताओं को भ्रमित करके कभी लाभ न कमाना, बैंकों के काम की तुलना में उपभोक्ताओं के सोच के हिसाब से काम करना, शुल्क या दरों के बजाय उपभोक्ता के अनुभवों को प्रतिस्पर्धा का जरिया बनाना और हर वह काम करना जिससे लोगों का पैसा सुरक्षित रहे। सिंपल के इस्तेमाल का कोई शुल्क नहीं है। यह ब्याज और अन्य बैंकों से मिलने वाले शुल्क से चलता है। अगर हमें उपभोक्ताओं का अनुभव बेहतर बनाना है और बैंकिंग को बेहतर और पारदर्शी बनाना है तो हमारे नीति निर्माताओं को देश में डिजिटल बैंकों को इजाजत दे देनी चाहिए। उन्हें वही सिद्घांत अपनाने चाहिए जो रीच ने अपनाए। 
Keyword: आईडीएफसी बैंक, येस बैंक, कोटक महिंद्रा, भारतीय स्टेट बैंक. SBI, RBI, Banking, Regulation,
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