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अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता विवादों का बढऩा चिंता का मसला

ए के भट्टाचार्य /  August 08, 2018

भारत सरकार के लिए अगस्त अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का महीना लग रहा है। मध्यस्थता के तीन बड़े मामलों में सरकार के काफी व्यस्त रहने की संभावना है। दो मामले पहले ही सुर्खियों में आ चुके हैं जबकि तीसरा अगले हफ्तों में सुर्खियां बनने वाला है। हरेक मामला सरकार के लिए यह सबक देकर जाएगा कि भारतीय शासन प्रणाली में अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का भरोसा बढ़ाने और भारत में कारोबारी सुगमता बढ़ाने के लिए क्या होना चाहिए?

पिछले हफ्ते यह जानकारी सामने आई कि जापान की कंपनी निसान मोटर भारत सरकार के साथ जारी विवाद जल्द ही हल कर सकती है। चेन्नई में एक संयंत्र लगाने वाली इस जापानी कंपनी के बकाया भुगतान को लेकर यह विवाद खड़ा हुआ था। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक भुगतान में देरी से होने वाले नुकसान के एवज में 29.2 करोड़ डॉलर की बकाया राशि मिलते ही निसान भारत सरकार के खिलाफ दायर अपने अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता मामले को वापस ले लेगी।

कुछ दिन पहले तीन सदस्यीय अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता पंचाट ने कृष्णा-गोदावरी बेसिन में सरकारी कंपनी ओएनजीसी के ब्लॉक से गैरकानूनी गैस उत्पादन में रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) के लिप्त होने संबंधी भारत सरकार के दावे को नकार दिया। मध्यस्थता पंचाट ने आरआईएल की अगुआई वाले समूह को इस मुकदमे की लागत के तौर पर 83 लाख डॉलर का भुगतान करने को भी कहा है।

यह मामला मध्यस्थता के लिए तब ले जाया गया जब भारत सरकार ने ओएनजीसी के ब्लॉक से गैस निकालने के आरोप में आरआईएल के समूह पर 1.55 अरब डॉलर का जुर्माना लगाया था। जुर्माने का यह आदेश नवंबर 2015 में एक अमेरिकी सलाहकार फर्म की रिपोर्ट के आधार पर दिया गया था। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि ओएनजीसी के ब्लॉक से 11.12 अरब घन मीटर प्राकृतिक गैस नजदीकी ब्लॉक केजी-डी6 में स्थानांतरित कर ली गई। यह गैरकानूनी स्थानांतरण अप्रैल 2009 से मार्च 2015 के बीच हुआ था।

एक पखवाड़े बाद ब्रिटेन की केयर्न एनर्जी और भारत सरकार के बीच विवाद की भी हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता पंचाट में सुनवाई शुरू होगी। यह प्रक्रिया 31 अगस्त को समाप्त होगी और सितंबर के पहले सप्ताह तक फैसला भी आ जाने की संभावना है। केयर्न विवाद पिछली तारीख से करारोपण से जुड़ा हुआ है। वर्ष 2006 में केयर्न समूह के भीतर हुए शेयर हस्तांतरण सौदे पर कर लगाने का निर्देश दिया गया था। केयर्न इंडिया का प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) लाने के लिए यह शेयर हस्तांतरण हुआ था।

राजस्थान के बाड़मेर में तेल भंडार की खोज करने वाली कंपनी केयर्न इंडिया ने यहां पर बड़ा तेल उत्खनन क्षेत्र विकसित किया था। केयर्न के प्रतिनिधियों ने यह सफाई दी है कि समूह के भीतर शेयर हस्तांतरण एक पूंजीगत लेनदेन था और और केयर्न इंडिया के आईपीओ को मंजूरी देने के पहले सरकार के कई विभागों ने प्रस्ताव को स्वीकृति भी दी थी। लेकिन आईपीओ लाने के करीब आठ साल बाद सरकार की तरफ से केयर्न को 1.6 अरब डॉलर के कर भुगतान के साथ जुर्माना भरने का भी नोटिस भेज दिया गया। अब यह मामला मध्यस्थता पंचाट के पास पहुंच चुका है। भारत-ब्रिटेन द्विपक्षीय निवेश संधि के तहत विवाद की स्थिति में मामला मध्यस्थता पंचाट के पास ले जाने का प्रावधान है।

मध्यस्थता विवादों से कई तरह के सवाल खड़े होते हैं। निसान मोटर ने अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता पंचाट को विवाद में लपेटे बगैर इस मामले को समझौते के जरिये निपटाने की कोशिश की। भारत में किसी कारोबारी विवाद के समाधान के लिए अंतरराष्ट्रीय पंचाट कोई अंतिम मंच नहीं है। आरआईएल के मामले में ही भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय पंचाट के फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देने का फैसला किया है। अधिक संभावना है कि यह विवाद कम-से-कम दो साल तक और चलेगा। उस नजरिये से देखें तो जापानी कार कंपनी ने भारत सरकार के साथ चल रहे विवाद को अंतरराष्ट्रीय पंचाट के बाहर ही निपटाने के लिए जो तरीका निकाला है वह तारीफ के काबिल है। निसान के लिए तो यह विवाद सरकार के साथ सहमति पर दस्तखत होने के साथ ही खत्म हो जाएगा। लेकिन आरआईएल के मामले में शायद ऐसा नहीं होगा।

इन दोनों मध्यस्थता विवादों का केयर्न इंडिया के लिए क्या मायने है? अगर मध्यस्थता अदालत में फैसला उसके पक्ष में आता है तो भी यह विवाद खत्म नहीं होगा क्योंकि भारत सरकार उस फैसले को भारतीय अदालत में चुनौती देगी और फिर मामला कुछ साल तक खिंचता रहेगा। 

इन मामलों से भारत की शिकायत निपटान प्रणाली और विवाद समाधान प्रणाली के प्रति विदेशी निवेशकों के भरोसे को लेकर भी कई तरह के सवाल खड़े होते हैं। अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के 20 से अधिक मामले चल रहे हैं जिनमें बाहरी निवेशकों के साथ पैदा हुए विवादों का समाधान निकालने की कोशिश की जा रही है। दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में यह संख्या सर्वाधिक है।

पिछले साल भारत सरकार ने 50 देशों के साथ हुए द्विपक्षीय निवेश समझौतों को निरस्त कर दिया था। नए निवेश समझौतों में यह प्रावधान जोड़ा जाएगा कि भारतीय न्यायिक प्रणाली में हासिल विवाद समाधान प्रक्रिया का रास्ता अपनाने के बाद ही प्रभावित निवेशक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता पंचाट का रुख कर सकता है।

भारत सरकार को विदेशी निवेशकों के साथ होने वाले विवादों के समाधान के लिए विधायी ढांचे पर नए सिरे से सोचना चाहिए ताकि मध्यस्थता प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और त्वरित हो। शिकायत निपटान प्रणाली के बारे में अनिश्चितता होना इसमें होने वाले विलंब की ही तरह समस्या पैदा करने वाली बात है। 
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