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गलत सलाह

संपादकीय /  August 08, 2018

दूरसंचार विभाग ने कहा है कि वह आपातकालीन परिस्थितियों में व्हाट्सऐप, फेसबुक, इंस्टाग्राम और टेलीग्राम आदि ऐप्स को ब्लॉक करने पर विचार कर रहा है। खासतौर पर उस समय जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा और सामान्य व्यवस्था को किसी तरह का जोखिम हो। इस विषय में विभाग ने दूरसंचार सेवा प्रदाताओं और इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को पत्र लिखा है और यह लक्ष्य प्राप्त करने के विषय में उनका नजरिया जानना चाहा है। 

आमतौर पर विभाग वेबसाइट या यूआरएल ब्लॉक करने के निर्देश तब भेजा करता है जब उसे अदालतों द्वारा इस बारे में निर्देश दिया जाता है या फिर जब इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय उसे ऐसा करने को कहता है। ब्लॉक करने की कार्रवाई सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और टेलीग्राफ अधिनियम के अधीन की जाती है। विभाग द्वारा ऐसे ऐप्लीकेशन पर प्रतिबंध लगाए जाने की सोच के पीछे ताजा वजह देश भर में हो रही लिंचिंग (भीड़ द्वारा लोगों को मारा जाना) की घटनाएं जिम्मेदार हैं। इन घटनाओं के लिए आमतौर पर सोशल मीडिया माध्यमों पर प्रसारित फेक न्यूज जिम्मेदार हैं। 

ऐसी घटनाएं त्रासद तो हैं ही, ये हमें देश में कानून व्यवस्था की खराब स्थिति के बारे में भी बताती हैं। बहरहाल, यह केवल कानून व्यवस्था का मसला नहीं है। अगर इससे निपटने के लिए सरकार सेंसरशिप अपनाती है, वेबसाइटों या ऐप्स पर प्रतिबंध लगाती है तो यह कतई सही नहीं होगा। फेक न्यूज भडक़ाने का काम करती है और जहां ये खबरें तेजी से फैलती हैं, वहां इन मंचों पर करीब नजर रखना जरूरी है लेकिन हिंसा की इन घटनाओं के लिए ऐसे तकनीकी मंचों को जिम्मेदार ठहराए जाने का अर्थ यह है कि सरकार हमारे समाज में बढ़ती कट्टïरता की अनदेखी कर रही है। इन सामाजिक कमियों को दूर करने की शुरुआत राजनीतिक संदेशों से होनी चाहिए। इसके  बजाय सरकारी विभाग अगर तकनीक और उससे जुड़ी कंपनियों को निशाने पर लेते हैं तो इसे कतई सही नहीं कहा जा सकता है। इसकी भी कई वजह हैं।

मिसाल के तौर पर ऐसा प्रतिबंध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार का हनन करता है। इसके अलावा यह देश की आधुनिक समाज होने की छवि को भी धक्का पहुंचाएगी। एक ऐसा समाज जो लोकतांत्रिक सिद्घांतों की कद्र करता है और उनका संरक्षण करता है। अगर सरकार प्रतिबंध लगाती है तो वह संकट पैदा करने वाले चंद लोगों को रोकने के लिए उन लाखों उपभोक्ताओं को नुकसान पहुंचाएगी जो इन माध्यमों का समुचित इस्तेमाल करते हैं। उद्योग जगत के अनुमानों के मुताबिक वर्ष 2012 से 2017 के बीच इंटरनेट बंद किए जाने से देश की अर्थव्यवस्था को 3 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। जम्मू कश्मीर तथा राजस्थान में लगे प्रतिबंध कुछ ताजा उदाहरण हैं। कड़वी हकीकत यह भी है कि मौजूदा दौर में ऐसे प्रतिबंध को लागू करना आसान नहीं है। इनमें से अधिकांश ऐप्स की होस्टिंग देश के बाहर है। बाजार में वर्चुअल प्राइवेट नेटवक्र्स (वीपीएन) की बाढ़ है जिनकी मदद से उपभोक्ता ब्लॉक की गई सामग्री को आसानी से खोल सकते हैं। यह भी सच है कि ऐसे प्रतिबंध से सबसे अधिक नुकसान आम लोगों को होगा जिनका शायद फेक न्यूज या हिंसा से कोई लेनादेना नहीं होगा। 

ऐसे कदम उठाते वक्त इस बात की अनदेखी कर दी जाती है कि उद्योग जगत स्वनियमन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के दुरुपयोग को रोकने के लिए कितनी मेहनत कर रहा है। उदाहरण के लिए व्हाट्स ऐप ने कुछ सुधार किए हैं जिनके बाद फेक न्यूज का प्रसार करना कठिन होगा। सरकार के लिए बेहतर यही होगा कि वह ऐप्स पर प्रतिबंध लगाने के बजाय संबंधित कंपनियों के साथ मिलकर काम करे।
Keyword: VPN, Fake news, social media, Facebook, WhatsApp, Instagram, telegram, internet,
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