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समझ और संवेदनशीलता

संपादकीय /  August 07, 2018

असम में राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) का अंतिम मसौदा तैयार होने के पहले जो विवादास्पद कवायद हुई उसे कहीं और ही समर्थन मिलता दिख रहा है। गत सप्ताह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पश्चिम बंगाल इकाई ने वहां भी ऐसी ही कवायद दोहराए जाने की मांग की। इतना ही नहीं त्रिपुरा के सत्ताधारी गठबंधन के सदस्य इंडीजीनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) ने त्रिपुरा में, जनता दल (यूनाइटेड) ने नगालैंड में और कुछ सामाजिक कार्यकर्ता समूहों ने मेघालय और मिजोरम में यह प्रक्रिया दोहराने की मांग की है। क्या सरकार को इन मांगों पर विचार करना चाहिए? असम में इस प्रक्रिया की खामियों की बात सामने आई है। अपने नागरिकों का निर्धारण करना निरपवाद रूप से किसी सरकार की जवाबदेही है। खासतौर पर तब जबकि नागरिकता के साथ करदाताओं के पैसे से लोगों को कल्याणकारी लाभ मिलते हों। 

असम में एनआरसी की प्रक्रिया को सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में अंजाम देने पर जोर दिए जाने के बावजूद हकीकत यह है कि यह एक बांटने वाले राजनीतिक समझौते की देन है। यह समझौता सन 1985 में तत्कालीन केंद्र सरकार और असम आंदोलन के नेताओं के बीच हुआ था। ये नेता अवैध अप्रवासियों को चिह्नित कर उनके देश वापस भेजने की मांग कर रहे थे। ये तथाकथित अवैध प्रवासी मुख्यतौर पर बांग्लादेशी मुस्लिम थे। उनमें से कुछ आजादी के पहले की कई पीढिय़ों से असम में रहते और काम करते थे। जबकि अन्य सन 1971 की जंग के बाद भारत में शरण लेने आए थे। यह प्रक्रिया अनिवार्य तौर पर विदेशी लोगों के प्रति घृणा की वजह बनेगी। यह मात्र संयोग नहीं है कि असम में एनआरसी के मसौदे से मुस्लिम बाहर हैं। हालांकि कुछ हिंदुओं के साथ भी ऐसा ही हुआ है। 

मौजूदा समय में धर्म, जातीयता और नागरिकता को लेकर जो सार्वजनिक बहस चल रही है उसमें देशव्यापी एनआरसी प्रक्रिया की कल्पना करना कठिन है। अगर उसे अपनाया गया तो कई तरह के विवाद उत्पन्न होने तय हैं। खासतौर पर सीमावर्ती राज्यों में जहां नेपाली और बर्मी मूल के लोग आबादी का हिस्सा हैं। बंगाल और उत्तर प्रदेश ऐसे ही राज्य हैं जहां बहुत बड़ी तादाद में मुस्लिम रहते हैं।

असम में अपनाई गई प्रक्रिया यह भी बताती है कि सार्वजनिक रिकॉर्ड कितने कमजोर हैं। आधार ने काफी हद तक समस्या को हल किया है लेकिन वह अनिवार्य तौर पर नागरिकता का निर्धारण नहीं करता। असम की एनआरसी प्रक्रिया विरासती दस्तावेजों पर केंद्रित रही। तथ्य यह है कि ऐसे कई भारतीय नागरिक भी होंगे जो तत्काल ये दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर पाएंगे। आज भी एक खास आयुवर्ग के कई भारतीयों के पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं मिलेंगे। सन 1990 में अनिवार्य किए जाने के पहले उनकी जरूरत भी शायद ही पड़ती थी। कई भारतीयों को सरकारी अधिकारियों की लापरवाही का भी शिकार होना पड़ा होगा क्योंकि विभिन्न दस्तावेजों में उनके 

नामों के हिज्जे, उम्र और लिंग आदि गलत लिखे हो सकते हैं। अशिक्षित और अल्पशिक्षित लोगों के साथ यह दिक्कत ज्यादा है। असम में कई परिवारों के सदस्य इसी वजह से अंतिम मसौदे से बाहर हैं। देश के नागरिकता कानूनों में भी सुधार की आवश्यकता है। समय के साथ वे काफी जटिल और समय खपाऊ हो चुके हैं। कई बार नागरिकता लेने में एक दशक तक का वक्त लग सकता है। भारतीय राज्य के मानवता के सिद्घांत के मद्देनजर एक अहम बदलाव की आवश्यकता है। किसी के माता-पिता की राष्ट्रीयता चाहे कुछ भी हो अगर कोई बच्चा भारत में पैदा हुआ है, उसने अपना पूरा जीवन यहां बिताया हो तो उसे भारत की नागरिकता क्यों नहीं मिलनी चाहिए? संक्षेप में सरकारों को नागरिकता के मसले से समझदारी और संवेदनशीलता से निपटना होगा।
Keyword: assam, nrc, central govt, Bangladeshi, Citizen, movement,
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