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असम के राजनीतिक माहौल में सोनोवाल का संतुलन

आदिति फडणीस /  August 06, 2018

असम में हालात बहुत अधिक खराब हो सकते थे। परंतु मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल को यह श्रेय देना होगा कि राष्टï्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) के जरिये 40 लाख लोगों की नागरिकता पर प्रश्नचिह्न लगने के बाद उन्होंने राजनीति को नियंत्रित ही नहीं रखा बल्कि यह आश्वस्ति भी देते रहे कि किसी को कोई नुकसान नहीं होगा। एनआरसी ने इन लोगों के भविष्य पर प्रश्नचिह्नï लगा दिया है। इनमें वे परिवार भी शामिल हैं जो कई दशकों से असम में रह रहे हैं। 

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सन 1946-47 के बाद पहली बार एनआरसी में देश को विभाजित करने की क्षमता दिख रही है। यह बहुत बड़ी तादाद में लोगों को नागरिकता से वंचित कर सकती है। दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक दल के अध्यक्ष का कहना है कि जो लोग अपने भारतीय होने का दस्तावेजी सबूत नहीं दिखा सकते वे सभी घुसपैठिये माने जाएंगे और उनसे उसी तरीके से निपटा जाएगा। जो परिवार खुद को भारतीय मानते हैं और असम में रहते हुए भारत के विकास में अपना यथासंभव योगदान देते रहे हैं उन्हें अचानक यह लग रहा है कि उनके पैरों के नीचे से किसी ने जमीन खींच ली है। अगर सोनोवाल चाहते तो वह इस प्रकरण का राजनीतिक लाभ उठा सकते थे। उनके पास सर्वोच्च न्यायालय का आदेश भी है। वह यह दलील दे सकते थे कि गैर भारतीयों में से भारतीयों को छांटने का काम उन्हें नहीं करना चाहिए। सोनोवाल ने राजनीति में आते ही पहचान की राजनीति का सबक सीख लिया था। 

सन 1992 में वह ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) के अध्यक्ष बने और सन 1999 तक उस पद पर रहे। इसके बाद उन्होंने सन 2001 में असम गण परिषद का रुख किया और उसी वर्ष विधानसभा सदस्य बने। आसू और असम गण परिषद ‘धरती पुत्र यानी असमिया धरती की संतान’ के मॉडल पर काम करते थे। सोनोवाल ने असमिया पहचान का विस्तार किया और जनजातीय छात्र समूहों को इसमें शामिल किया ताकि असम के स्थानीय जनजातीय समूह इसका हिस्सा बन सकें। वह कांग्रेस का मुकाबला करना चाहते थे। कांग्रेस की दलील थी कि जब तक अली (मुस्लिम), कुली (चाय बागान मजदूर) और बंगाली (बंगाली हिंदू जो अक्सर क्लर्क या छोटे कारोबारी होते हैं और जो बांग्लादेश के गठन के वक्त असम आए) कांग्रेस के साथ हैं तब तक पार्टी कभी असम में हार नहीं सकती। 

असम गण परिषद एक डूबता जहाज बन चुकी थी और नेतृत्व के बंटे होने के चलते सोनोवाल ने भविष्य में पेशेवर राजनीतिज्ञ की तरह कदम उठाने की सोची। सन 2011 में वह भाजपा में शामिल हो गए। उनके कई सहयोगियों ने भी ऐसा ही किया। 2012 में उन्हें भाजपा की असम इकाई का अध्यक्ष बनाया गया जो अपने आप में काफी तेज प्रगति थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा के वर्षों के प्रयास के बावजूद वहां उनकी कोई खास जगह नहीं बन सकी थी। उस लिहाज से देखें तो वह अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह की भाजपा का उपज थे।

बाकी का किस्सा तो सब जानते हैं। सोनोवाल ने अवैध प्रवासी (पंचाट द्वारा निर्धारण) अधिनियम को चुनौती दी। इसकी मदद से असम विद्रोह से प्रभावित अल्पसंख्यकों को बिलावजह शोषण से संरक्षण प्रदान किया गया था। इस कानून के कारण अवैध प्रवासियों को वापस भेजना भी मुश्किल हो गया था। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कानून ने व्यक्ति की नागरिकता के निर्धारण का दायित्व आरोप लगाने वाले पर डाल दिया था, बजाय कि आरोपित के। यह शेष भारत में लागू कानून विदेशी अधिनियम के प्रावधानों से अलग था। 

सन 2005 में सर्वोच्च न्यायालय ने अवैध प्रवासी अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया। सोनोवाल 2014 में लोकसभा में चुने जाने के पहले तक असम भाजपा अध्यक्ष बने रहे। उन्हें मोदी सरकार में राज्यमंत्री बनाया गया। वर्ष 2015 में विधानसभा चुनाव से एक साल पहले एक बार फिर उन्हें असम भाजपा का अध्यक्ष बना दिया गया। हालांकि उन्हें थोड़ा झटका लगा क्योंकि भाजपा नेतृत्व ने कांग्रेस से हिमंत विश्व शर्मा को पार्टी में लाने का निर्णय किया। लगभग उसी समय एक अमेरिकी कंपनी लुई बर्गर ने अमेरिका की एक अदालत में स्वीकार किया कि उसने दुनिया भर में प्रोजेक्ट हासिल करने के लिए राजनेताओं और अधिकारियों को रिश्वत दी है। 

कंपनी ने कहा कि उसने 2010 में जल विकास परियोजनाओं के लिए गोवा और असम में भी अधिकारियों को रिश्वत दी। उस वक्त शर्मा संबंधित मंत्रालय के मंत्री थे। इस विषय पर सोनोवाल और अरुणाचल प्रदेश के नेता किरण रिजिजू (केंद्र में मंत्री)ने संवाददाताओं को संबोधित किया। शारदा घोटाले में शर्मा की भूमिका को लेकर सवाल उठाने के प्रयास भी किए गए। पश्चिम बंगाल की यह पोंजी स्कीम 2013 में नाकाम हो गई थी और विश्वशर्मा पर आरोप था कि उन्होंने इसके संस्थापकों से रिश्वत ली है। 

इन बातों का कोई असर नहीं हुआ और भाजपा के सबसे प्रभावशाली महासचिव राम माधव अडिग रहे। पार्टी ने जनवरी 2016 में उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया। यह परंपरा से अलग था। चुनाव में पार्टी को 45 प्रतिशत वोट मिले और सोनोवाल की पुरानी पार्टी असम गण परिषद के साथ मिलकर भाजपा ने सरकार बनाई। अच्छी बात है कि एनआरसी के मसले से उपजी चिंता के बीच भी दोनों नेताओं के बीच की प्रतिद्वंद्विता का असर देखने को नहीं मिला है। परंतु अगर सोनोवाल असुरक्षित महसूस करते हैं या भाजपा उनके विकल्प पर काम करती है तो ऐसा हो सकता है। यह अजीब लग सकता है लेकिन राजनीति में ऐसा ही होता है। 

Keyword: भाजपा, महासचिव, राम माधव, NRC, असम,
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