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अच्छी शुरुआत

संपादकीय /  August 06, 2018

कंपनी मामलों के मंत्रालय ने राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट (एनसीएलटी) के अधीन आठ विशेष अदालतें गठित करने का निर्णय लिया है ताकि विशेष तौर पर दिवालिया मामलों से निपटा जा सके। यह कदम स्वागतयोग्य है। ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी), 2016 में प्रवर्तन में आई। यह अब तक फंसे हुए कर्ज की भारी भरकम समस्या से निपटने का सबसे अच्छा तरीका साबित हो रहा है। यह वह संकट है जिसने देश के बैंकिंग और कारोबारी जगत को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया है। एनसीएलटी इस ऋणशोधन प्रक्रिया की रीढ़ है। परंतु अगर समान न्यायिक प्रतिष्ठानों से तुलना की जाए तो इस पर काम का बोझ बहुत ज्यादा है।

भारतीय ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया बोर्ड (आईबीबीआई) की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक एनसीएलटी ने 907 मामले विचारार्थ स्वीकार किए जिनमें से 32 मामले मंजूर हुए हैं। इससे 498 अरब रुपये की राशि की प्राप्ति हुई है। कई अन्य मामले नकदीकरण की प्रक्रिया में हैं। मार्च 2018 तक यह संख्या 87 थी। चूंकि यह प्रक्रिया नई है और दिवालिया कानून में नए मामलों के साथ बदलाव हो रहा है, उदाहरण के लिए प्रवर्तकों को अपनी कंपनी के लिए बोली लगाने की पात्रता आदि, तो ऐसे में इसे उत्साहजनक माना जा सकता है।

परंतु दो तथ्य इस रिकॉर्ड की दृढ़ता को रेखांकित करते हैं। पहला, आईबीसी की प्रक्रिया की एक अहम बात यह थी कि यह समयबद्घ है। इसके लिए 270 दिन की अवधि की इजाजत है। अब तक निस्तारण के लिए स्वीकृत 390 कंपनियों ने इस अवधि का उल्लंघन किया है। एक अन्य बात यह है कि बैंकिंग व्यवस्था के 83 खरब रुपये के फंसे हुए कर्ज को देखते हुए अब तक हुई प्राप्तियां सागर में एक बूंद के समान हैं। अपील और समीक्षा के संदर्भ में देखें तो विधिक मामलों ने प्रक्रिया को धीमा किया है लेकिन यह कारक 10 फीसदी से भी कम मामलों के लिए उत्तरदायी है। दिवालिया मामलों के अलावा पंचाट कंपनी अधिनियम के अधीन विलय और अधिग्रहण तथा अन्य मामलों को भी संभालता है। ताजा आंकड़े बताते हैं कि 11 पीठों के समक्ष 9,000 से अधिक मामले लंबित हैं। इसका समर्थन नहीं किया जा सकता। पीठों के समक्ष मामलों के वितरण में भी विसंगति है। दिल्ली में दो पीठ हैं जबकि मुंबई और कोलकाता में एक-एक पीठ। दिवालिया मामलों के लिए विशेष तौर पर आठ अदालतें गठित करने का निर्णय एक बड़ी खामी तो दूर करेगा। खासतौर पर तब जबकि मुंबई जैसी व्यस्त जगह पर इसका विस्तार भी किया जाएगा।

बहरहाल, केवल अदालतों की संख्या बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। जरूरत इस बात की भी है कि क्षमता में भी सुधार किया जाए। प्रमुख तौर पर यह काम न्यायाधीशों तथा निस्तारण पेशेवरों की संख्या और उनकी गुणवत्ता में सुधार करके किया जा सकता है। कुछ बातों का ध्यान रखने की भी आवश्यकता है। उदाहरण के लिए यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि न्यायिक कर्मियों की कमी के चलते जिस तरह प्रतिभूति अपील पंचाट का काम ठप है, वह समस्या आईबीसी के लिए विशेष तौर पर बने एनसीएलटी पीठ के साथ नहीं आनी चाहिए। निस्तारण प्रतिनिधियों के साथ समस्या न्यूनतम पात्रता (सीए) से अधिक अनुभव की है। कई प्रतिनिधियों के पास कारोबार चलाने या उसके मूल्यांकन का कोई अनुभव ही नहीं है। कई मामलों में ऐसे कारकों से विवाद भी पैदा हुआ है। इसमें वे मामले भी शामिल हैं जिनका जिक्र आरबीआई कर चुका है। इनमें से कुछ मसले समय के साथ हल हो सकते हैं लेकिन सरकार के लिए यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि दिवालिया निस्तारण की प्रक्रिया गति पकड़ती रहे। उस लिहाज से देखें तो और ज्यादा अदालतों का गठन करना एक अच्छी शुरुआत है।

Keyword: आईबीसी, NCLT, दिवालिया, आईबीबीआई, IBBI,
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