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इलाज के बढ़ते खर्च से निपटने में मददगार है नो क्लेम बोनस

प्रियदर्शनी माजी /  August 05, 2018

नाम से ही पता लग जाता है कि ‘नो क्लेम बोनस’ दावा नहीं करने के एवज में मिलने वाला फायदा है। जब कोई बीमा पॉलिसीधारक पूरे साल तक बीमा का कोई दावा नहीं करता है तो बदले में कंपनी उसे नो क्लेम बोनस देती है। यह बोनस कंपनी के लिए भी फायदेमंद होता है और बीमा कराने वाले व्यक्ति के लिए भी। बीमा कंपनी के लिए फायदा यह है कि उसे पॉलिसीधारक के दावे के एवज में किसी तरह की रकम नहीं चुकानी पड़ती है। पॉलिसी लेने वाले को फायदा दो तरह से हो सकता है। या तो उसके बीमा की रकम बढ़ा दी जाती है या उसका प्रीमियम कम कर दिया जाता है। आम तौर पर स्वास्थ्य बीमा कंपनियां दो तरह से नो क्लेम बोनस देती हैं: या तो वे पॉलिसीधारक से वसूले जाने वाले प्रीमियम में छूट दे देती हैं या बोनस देने के बजाय बीमा की रकम बढ़ा देती हैं। ओरियंटल इंश्योरेंस की फैमिली फ्लोटर स्वास्थ्य बीमा योजना में प्रीमियम घटाया जाता है। दावा नहीं करने के एवज में हरेक साल प्रीमियम में 5 फीसदी की कटौती कर दी जाती है। लेकिन इस तरह से प्रीमियम में अधिकतम 20 फीसदी तक कटौती की जा सकती है।

ज्यादातर स्वास्थ्य बीमा कंपनियां संचयी लाभ के रूप में नो क्लेम बोनस देती हैं। इसमें जिस साल दावा नहीं किया जाता है, उस साल बीमा राशि में कुछ फीसदी इजाफा कर दिया जाता है। यह फीसदी इजाफा भी हर साल बढ़ता रहता है। हालांकि संचयी बोनस की इस व्यवस्था में भी लाभ प्राप्त करने की अधिकतम सीमा तय कर दी गई है। बीमा राशि में हर साल कम से कम 5 फीसदी का इजाफा होता है और आपको अधिकतम 50 फीसदी इजाफा हासिल हो सकता है। कुछ स्वास्थ्य बीमा कंपनियां बुनियादी बीमा राशि के 100 फीसदी तक संचयी बोनस देती हैं, लेकिन ज्यादातर कंपनियां 50 फीसदी तक ही बोनस देती हैं। उदाहरण के लिए फ्यूचर जेनराली के हेल्थ सुरक्षा प्लान के तहत अगर आप किसी साल दावा नहीं करते हैं तो बीमा राशि में 10 फीसदी की बढ़ोतरी कर दी जाती है। इस तरह राशि में अधिकतम 50 फीसदी तक बढ़ोतरी की जा सकती है। फ्यूचर जेनराली के हेल्थ टोटल प्लान के तहत अगर किसी साल दावा नहीं किया जाता है तो उस साल बीमा राशि 50 फीसदी बढ़ जाती है और यही नो क्लेम बोनस होता है। लेकिन बोनस बुनियादी बीमा राशि के 100 फीसदी से अधिक नहीं हो सकता, इसलिए बीमा राशि में 50 फीसदी का यह इजाफा केवल दो साल ही होता है।

फ्यूचर जेनराली इंडिया इंश्योरेंस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और परिचालन प्रमुख (ग्राहक सेवा एवं स्वास्थ्य बीमा) श्रीराज देशपांडे बताते हैं, ‘संचयी बोनस का हिसाब-किताब बुनियादी बीमा राशि के आधार पर होता है, बीमा राशि में हुए इजाफे के आधार पर नहीं। साथ ही किसी भी पॉलिसी के लिए पहले साल में बोनस उसकी बीमा राशि का अधिकतम 100 फीसदी ही हो सकता है।’ अगर किसी साल कोई दावा किया जाता है तो संचयी बोनस उसी दर से घटता जाता है, जिस दर से वह जुड़ा था। एसबीआई जनरल इंश्योरेंस के प्रमुख (उत्पाद विकास)  पुनीत साहनी का कहना है, ‘अगर पॉलिसी के तहत दावा किया जाता है तो अगले नवीकरण यानी रीन्युअल के समय संचयी बोनस में उतने फीसदी की ही कमी होगी, जितने फीसदी का जिक्र पॉलिसी में किया गया है और आम तौर पर यह 10 फीसदी होता है। हालांकि इस कटौती के बाद भी बीमा राशि पॉलिसी की बुनियादी बीमा राशि से कम कभी नहीं होती।’ 

अगर स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी को पोर्ट किया जाता है यानी बीमा कंपनी बदली जाती है तो पोर्टेबिलिटी के तहत बीमा राशि में वही फायदे मिलते हैं, जो पुरानी पॉलिसी या पुरानी कंपनी के साथ होते हैं। साथ ही पुरानी पॉलिसी से आया संचयी बोनस भी बरकरार रहता है। जो प्रीमियम वसूला जाता है, वह कुल बीमा राशि यानी बुनियादी राशि और संचयी बोनस पर लिया जाता है। यदि नई बीमा कंपनी के पास पुरानी पॉलिसी की बीमा राशि जितनी बीमा राशि उपलब्ध नहीं है तो बीमा राशि का अगला बैंड लागू होगा। बैंकबाजार डॉट कॉम के मुख्य कारोबार विकास अधिकारी नवीन चंदानी कहते हैं, ‘अगर कोई पॉलिसी ग्रेस अवधि के दौरान प्रीमियम नहीं चुकाने के कारण खत्म हो जाती है तो उसके साथ मिने वाले संचयी बोनस के फायदे भी चले जाते हैं।’ स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च हर साल 15 से 20 फीसदी की दर से बढऩे का अनुमान लगाया जा रहा है। ऐसे में नो क्लेम बोनस से कुछ अतिरिक्त फायदे मिलते हैं, जो चिकित्सा पर होने वाले खर्चों का बोझ कम करने में मददगार हो सकते हैं।

Keyword: स्वास्थ्य बीमा, पॉलिसी, ओरियंटल इंश्योरेंस, फैमिली फ्लोटर,
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