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भारतीय बाजार मौजूदा स्तर पर सस्ते नहीं

पुनीत वाधवा /  August 05, 2018

यूटीआई ऐसेट मैनेजमेंट कंपनी के समूह अध्यक्ष एवं प्रमुख वेत्री सुब्रमण्यम ने पुनीत वाधवा के साथ बातचीत में कहा कि बाजार के सर्वाधिक ऊंचाई पर पहुंचने से अब इसकी आगामी चाल सिर्फ आर्थिक वृद्घि की राह पर नहीं बल्कि मूल्यांकन पर भी निर्भर होगी। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश:

पिछले सप्ताह बाजार सर्वाधिक ऊंचाई पर पहुंच गए। क्या यह तेजी बरकरार रहेगी?
बाजार की चाल के लिए कई कारक मायने रखते हैं। वृद्घि के नजरिये से भारत अभी भी मजबूत बना हुआ है। वृहद परिदृश्य एक साल पहले के मुकाबले कुछ हद तक विपरीत रह सकता है, लेकिन बाजार सामान्य दायरे में बने रहेंगे। विपरीत हालात इस तथ्य से पैदा होते दिख रहे हैं कि भारत में मूल्यांकन महंगा है और बाजार कुछ समय से महंगे बने हुए हैं। यह एक बड़ी चुनौती है। बाजार के लिए परिदृश्य न सिर्फ आर्थिक विकास की राह पर निर्भर करता है बल्कि यह मूल्यांकन पर भी आधारित है। भारतीय बाजार मौजूदा स्तरों पर सस्ते नहीं हैं। वैश्विक निवेशकों के लिए, भारतीय कंपनियों का आकर्षण लंबे समय से बना हुआ है और यह उनके पिछले अनुभवों पर आधारित है। हमारा मानना है कि जब निवेशक दुनियाभर में तुलनात्मक मूल्यांकन पर विचार करते हैं तो वे कहीं और अच्छी वैल्यू तलाशते हैं और पूंजी प्रवाह के आंकड़ों पर भी इसका प्रभाव दिखा है।
क्या आप इसे लेकर चिंतित हैं कि बाजार में तेजी सिर्फ कुछ शेयरों की वजह से आई है?
आम धारणा यह है कि बाजार में यदि बड़ी तादाद में कारोबारी हिस्सा लेते हैं तो इसमें उतार-चढ़ाव आता है। बाजार में सभी क्षेत्रों या शेयरों से जुड़ी तेजी को लेकर कुछ भी असामान्य नहीं है। इस साल, मिड-कैप सूचकांक निफ्टी-50 में 5 प्रतिशत की तेजी की तुलना में 14 फीसदी नीचे आया है। इन दोनों सूचकांकों में मौजूदा अंतर 20 फीसदी का है। यह काफी हद तक पिछले साल जैसी स्थिति है जब दोनों सूचकांकों ने सकारात्मक प्रतिफल दिया, हालांकि इनके प्रतिफल के बीच 20 फीसदी का अंतर था।
वित्त वर्ष 2019 और वित्त वर्ष 2020 के लिए आपके आय अनुमान क्या हैं?
यदि आप मोटे तौर पर देखें तो वृद्घि अभी भी एक अंक में बनी हुई है। ब्लूमबर्ग ने वित्त वर्ष 2019 के लिए निफ्टी-50 सूचकांक की प्रति शेयर आय (ईपीएस) वृद्घि 23-24 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। वास्तव में यह मजबूत आंकड़ा है। हालांकि, हमने अतीत में यह देखा है कि वृद्घि के अनुमान साल के शुरू में ऊंचाई पर रहते हैं और फिर आय उस स्तर पर नहीं रहती। भले हम मान रहे हैं कि यह अनुमान सही साबित होगा, लेकिन आपको यह समझना चाहिए कि इस वृद्घि का बड़ा हिस्सा कई कंपनियों के आंकड़े 2017-18 में दबाव में दिखे। 
आगामी अनुमानों को लेकर मुख्य जोखिम क्या हैं?
आय के लिए जोखिम के नजरिये से कुछ बातों को ध्यान में रखे जाने की जरूरत है। पहली, कच्चे माल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में हम ऐसी स्थिति में थे जहां सकल मार्जिन कॉरपोरेट भारत (गैर-वित्त) के लिए लगातार बढ़ रहा था। इसके फिर से दोहराने की संभावना नहीं है क्योंकि कच्चे माल की कीमतें बढ़ रही हैं। इसलिए मुनाफा वृद्घि के स्रोत के तौर पर सकल मार्जिन वृद्घि अच्छी नहीं दिख रही है। इससे आय पर दबाव बढ़ेगा। आय के लिए राहत बिक्री वृद्घि और परिचालन दक्षता से मिलेगी। सकल मार्जिन पर दबाव के बावजूद परिचालन दक्षता के साथ राजस्व वृद्घि अच्छी मुनाफा वृद्घि में मददगार साबित हो सकती है। ब्याज लागत भी बढ़ी है। इससे आय में कुछ कमजोरी आ सकती है। निवेशकों को इस पर नजर रखे जाने की जरूरत होगी कि आय में किस तरह से बदलाव आता है, क्योंकि कुल आय बैंक नुकसान की वजह से प्रभावित हो रही है और इस साल पीएंडएल का स्तर ऊंचा बना रह सकता है।
अगले एक साल के दौरान कौन सा बड़ा जोखिम है - आय वृद्घि नहीं होना या राजनीतिक परिदृश्य?
पिछले 25 वर्षों के दौरान हमने कई चुनाव देखे हैं और हमेशा से चुनाव-संबंधित उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। भारतीय बाजारों विभिन्न राजनीतिक शासनकाल में दीर्घावधि के दौरान ऊपर बने रहे हैं। आखिरकार, मामला आय से जुड़ा है। इक्विटी बाजार आय के अधीन हैं। यदि कोई कंपनियों और बाजार के 20 वर्षों के प्रदर्शन को देखें तो पता चलता है कि राजनीति में बदलाव से बाजार में अस्थिरता पैदा हुई है। निर्धारक कारकों से देश के विकास और कॉरपोरेट आय को मदद मिलती है। 
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