बिजनेस स्टैंडर्ड - मल्टीप्लेक्स में खानपान की कीमतों का गरमाता मसला
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मल्टीप्लेक्स में खानपान की कीमतों का गरमाता मसला

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  August 03, 2018

यह लगभग 1992 की बात है। एक चूहा मेरे पैर पर चढ़ गया था। मैंने कुर्सी पर अपने पैर खींच लिए और पर्दे पर 'जो जीता वही सिकंदर' फिल्म देखने लगी। यह वाकया करीब 25 साल पहले मुंबई के नवरंग थिएटर का है। उस समय मेरे किसी भी दोस्त ने चूहे को तवज्जो नहीं दी थी। वहां पर हमने न तो बासी खाना खाया और न ही गंदगी से भरे शौचालय का ही इस्तेमाल किया। जब हमने वर्ष 2000 में पहली बार मल्टीप्लेक्स को देखा तो हम साफ शौचालय और अच्छी सीट से काफी खुश हुए थे। समय बीतने के साथ मल्टीप्लेक्स ने समूचे फिल्म कारोबार की सूरत ही बदलकर रख दी। वर्ष 2000 के बाद से फिल्म उद्योग का आकार करीब पांच गुना बढ़कर 156 अरब रुपये पर जा पहुंचा है तो वह काफी हद तक मल्टीप्लेक्स की ही वजह से है। वैसे इनका इकलौता सबसे बड़ा योगदान फिल्म कारोबार को साफ-सुथरा करने और गलत स्रोत से आने वाले धन से निजात दिलाने में रहा। आज के समय में सिनेमाघरों में बिकने वाले हरेक टिकट को खाते में दर्ज किया जाता है और उससे मिलने वाला पैसा कर भुगतान या उद्योग की कार्यशील पूंजी के रूप में तंत्र का ही हिस्सा बन जाता है। कुछ साल पहले आई मेरी किताब 'द इंडियन मीडिया बिज़नेस' में इन बदलावों का जिक्र है।

 
अब हम 2018 की तरफ लौटते हैं। पिछले महीने शेयर बाजार में मल्टीप्लेक्स कारोबार से जुड़ी कंपनियों पीवीआर सिनेमाज और आइनॉक्स लेज़र के शेयरों की कीमत में खासी गिरावट आई तो मैं सोच में पड़ गई कि ऐसा क्यों हुआ है? मुख्यधारा का मीडिया मल्टीप्लेक्स में बाहर से खाद्य पदार्थ ले जाने संबंधी विवाद का जिस उत्साह से कवरेज कर रहा है और मल्टीप्लेक्स में बिकने वाले पॉपकॉर्न और कोल्ड ड्रिंक की कीमतों को लेकर सोशल मीडिया में लोग जिस तरह नाराजगी जता रहे हैं, वह एक गहरी समस्या की तरफ इशारा करता है। क्या मल्टीप्लेक्स इस बाजी को हार चुके हैं?
 
इस सवाल का जवाब तलाशने के पहले अतीत की तरफ एक नजर डालते हैं। अगस्त 2017 में एक निवासी ने बंंबई उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर बाहरी खानपान महाराष्ट्र के फिल्म थिएटर और मल्टीप्लेक्स के भीतर ले जाने पर लगी पाबंदी पर रोक लगाने की मांग की थी। इस बीच जून 2018 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकताओं ने इन खाद्य उत्पादों की कीमतों को लेकर पुणे में पीवीआर आइकॉन के सहायक प्रबंधक पर हमला कर दिया। महाराष्ट्र के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति राज्यमंत्री रवींद्र चव्हाण ने जुलाई में विधानसभा में कहा कि गृह विभाग मल्टीप्लेक्स में बाहरी खाद्य पदार्थों की मंजूरी के बारे में नीति बनाने में लगा हुआ है। हालांकि कोई निर्देश जारी नहीं हुआ लेकिन मल्टीप्लेक्स कंपनियों के शेयरों में तीव्र गिरावट देखी गई।
 
मल्टीप्लेक्स के भीतर खानपान की बिक्री का कंपनियों के कुल राजस्व में एक चौथाई हिस्सा है। विज्ञापन राजस्व के बाद खानपान सेवा का राजस्व मल्टीप्लेक्स के लिए दूसरा सबसे मुनाफे वाला जरिया है। टिकट की बिक्री से बहुत कुछ नहीं मिलता है। सौ रुपये वाले टिकट का बराबर हिस्सा करों, निर्माताओं और मल्टीप्लेक्स में बंट जाता है। विश्लेषकों के मुताबिक ऐसी सूरत में खानपान के सामान की कीमतों में कटौती की काफी कम गुंजाइश बचती है। मार्च 2018 में समाप्त वित्त वर्ष में पीवीआर ने पांच फीसदी और आइनॉक्स ने 8.5 फीसदी का शुद्ध लाभ कमाया था। 
 
मल्टीप्लेक्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एमएआई) ने सरकार को सौंपे गए अपने प्रतिवेदन में कहा है कि दुनिया भर में खानपान के सामानों की बिक्री सिनेमाघरों के कारोबारी मॉडल का अभिन्न हिस्सा है। अगर उनसे उत्पादों की कीमत तय करने और बिक्री की आजादी छिन जाएगी तो वे अपना कारोबार समेटने लगेंगे। अगर ऐसा होता है तो सिनेमाघरों में प्रत्यक्ष रोजगार में लगे 10 लाख लोगों और अप्रत्यक्ष रोजगार वाले 5 लाख लोगों में से एक चौथाई लोगों पर असर पड़ेगा। एमएआई का कहना है, 'एक ग्राहक और सिनेमाघर मालिक के बीच का रिश्ता विशुद्ध रूप से आनुबंधिक और निजी होता है। किसी फिल्म थिएटर का टिकट खरीदना वाला व्यक्ति सारी शर्तें मानने पर भी सहमति जताता है।' एमएआई का दावा है कि बाहर से खाने-पीने का सामान थिएटर के भीतर ले जाने में कई जोखिम भी हैं। मसलन, थिएटर में अलग-अलग खाद्य पदार्थों की महक फैलेगी और खाने की आवाजें होंगी, दर्शक बाहर से अल्कोहल भी ले जाने की कोशिश करेंगे जिससे सुरक्षा का मामला भी खड़ा हो सकता है। उनका कहना है कि मल्टीप्लेक्स इस तरह के खतरों से निपटने के लिए तैयार नहीं हैं। यह कुछ उसी तरह है जैसे ग्राहक को रेस्टोरेंट के भीतर अपना खाना ले जाने या होटल में बेड ले जाने की इजाजत दी जाए।
 
इस पूरे विवाद का असली सार यही है। प्रतिस्पद्र्धी बाजार में कीमत तय करना प्रबंधन का काम है। उपभोक्ताओं के सामने सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर, मल्टीप्लेक्स, टेलीविजन, ऑनलाइन स्ट्रीमिंग और डीवीडी जैसे कई विकल्प हैं। कोई भी उन्हें मल्टीप्लेक्स जाने के लिए बाध्य नहीं करता है। इसके अलावा फिल्में जरूरत वाले उत्पाद भी नहीं हैं कि उनकी कीमतों को नियंत्रित किया जाए।  फिर भी सवाल यह है कि टिकटों के दाम इतने अधिक क्यों हैं? एक मल्टीप्लेक्स संचालक ने इस पर कहा था कि टिकटों के दाम 70 रुपये (सुबह का शो) से लेकर 500 रुपये (सप्ताहांत) तक जाते हैं। ब्लॉकबस्टर फिल्मों के टिकट 10-20 फीसदी और महंगे हो जाते हैं। हालांकि ये आंकड़े बड़े शहरों के हैं और जलगांव जैसे कस्बों में टिकटों के दाम इससे कम होते हैं।
 
मल्टीप्लेक्स में बाहरी खाद्य पदार्थों की इजाजत वाली याचिका पर 8 अगस्त को सुनवाई होगी। इसी तरह की एक याचिका पर जुलाई में जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय ने लोगों को बाहर से थिएटर के भीतर खाने-पीने का सामान ले जाने की इजाजत दी थी। सर्वोच्च  न्यायालय ने दिसंबर 2017 में कहा था कि होटल एवं रेस्टोरेंट पानी की बोतलें अधिकतम खुदरा मूल्य से ऊंचे दाम पर भी बेच सकते हैं। 
Keyword: PVR, multiplex,
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