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रक्षा क्षेत्र में सुधार कहना आसान, अमल कठिन

प्रेमवीर दास /  August 03, 2018

मौजूदा व्यवस्था के पुरातन होने की बात तो सही है लेकिन इसमें शीघ्र सुधार की कोई भी उम्मीद आशावादी है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं प्रेमवीर दास

 
इस समाचार पत्र में कुछ दिन पहले प्रकाशित आलेख में पत्रकार और संपादक शेखर गुप्ता ने देश में उच्च रक्षा कमान के ढांचे की मौजूदा स्थिति पर टिप्पणी की थी। उनका यह कहना सही है कि वर्ष 2018 में हमारी स्थिति छह दशक पहले की तुलना में शायद ही बेहतर है। उन्होंने यह भी कहा कि तीनों सशस्त्र बलों के लिए 19 कमान हैं और वे शायद ही आधुनिक युद्घ कला की दृष्टिï से एकीकृत प्रबंधन के अनुरूप हों। इन आलोचनाओं को आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता है। हालांकि हमें यह विश्लेषण करना होगा कि चीजें मौजूदा स्वरूप में क्यों हैं?   
 
सन 1980 के दशक के मध्य तक थलसेना, नौसेना और वायुसेना अपने-अपने अनुसूचित हिस्सों में काम करती थीं। योजना और क्रियान्वयन के स्तर पर वे स्वतंत्र थीं। हमने कई ऐसी जंग भी लड़ीं जिनमें ये सब एक साथ आए लेकिन इस दौरान भी मोटे तौर पर तालमेल के नाम पर अनौपचारिक चर्चा ही हुई। आश्चर्य नहीं कि सेना की स्थिति प्रभावशाली रही। कुछ मतांतर भी रहे। स्वर्गीय एयर चीफ मार्शल पीसी लाल ने सन 1971 की जंग से जुड़ी अपनी याद में इन मतभेदों में से कुछ का उल्लेख भी किया है। सन 1985 में सरकार ने इन पर ध्यान दिया और एक एकीकृत संस्था का गठन किया गया जिसे रक्षा योजना स्टाफ (डीपीएस) का नाम दिया गया। 
 
इसमें तीनों सेनाओं के काफी वरिष्ठï अधिकारियों को समान तादाद में स्थान दिया गया था। इसके अलावा विज्ञान शाखा और विदेश मंत्रालय से असैन्य सलाहकारों को भी इसमें शामिल किया जाना था लेकिन वह कभी इसमें शामिल नहीं हुए। एक उप प्रमुख स्तर के विशिष्टï अधिकारी को डीजीडीपीएस के रूप में इसकी कमान सौंपी गई। इस समिति की परिचालन मामलों में कोई हैसियत ही नहीं थी। यहां तक कि योजना निर्माण में भी इसके निर्देश तीनों सेनाओं की योजनाओं को सम्मिलित करने तक सीमित थे, बजाय कि खुद के एकीकृत अध्ययन के। 
 
दुख की बात है कि इसे अपने ही लोगों से पूरा समर्थन नहीं मिला और अगले कई प्रमुख अपेक्षाकृत कनिष्ठï अधिकारी बने। सन 1999 में करगिल जंग तक यह नखदंतविहीन हो चुका था।  सन 1999 में युवाओं की बहादुरी की बदौलत हम अपनी खोई जमीन वापस पाने में कामयाब रहे लेकिन उस दौरान कई स्पष्टï गलतियां हुई थीं। इसके बाद सरकार ने करगिल समीक्षा समिति का गठन किया। इसकी अध्यक्षता जानेमाने रक्षा विश्लेषक स्वर्गीय के सुब्रमण्यम को सौंपी गई। समिति ने उच्च रक्षा प्रबंधन, खुफिया विभाग, आंतरिक सुरक्षा, और सीमा प्रबंधन को लेकर कई कमियों की जानकारी दी और समीक्षा की बात कही। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तेजी से काम किया और उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की अध्यक्षता में एक मंत्रिसमूह का गठन किया। समूह में रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री, गृह मंत्री और विदेश मंत्री शामिल थे। मंत्रिसमूह ने चार समितियां गठित कीं ताकि करगिल समिति द्वारा कमजोर दर्शाए गए क्षेत्रों को लेकर काम किया जा सके। उच्च रक्षा प्रबंधन से जुड़ी समिति की अध्यक्षता का काम पूर्व रक्षा मंत्री और क्षेत्र के विशेषज्ञ अरुण सिंह को सौंपा गया। अन्य सभी समूहों में जहां सेवानिवृत्त विशेषज्ञों को स्थान दिया गया था वहीं अरुण सिंह के नेतृत्व में एक के अलावा सभी सेवारत अधिकारी थे। अरुण सिंह के शब्दों में कहें तो ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जिसके अपने हित न हों। 
 
चार महीने के श्रम के बाद सिंह ने अपनी रिपोर्ट पेश की। चर्चा के दौरान, खासतौर पर एकीकृत कमान और नियंत्रण के सवाल कर कई असहमतियां सामने आईं। मुख्य आपत्ति वायुसेना की ओर से आई। वायुसेना का मानना था कि अतीत में थोड़े तालमेल के साथ स्वतंत्र परिचालन नियंत्रण कामयाब रहा है और भविष्य में भी रहेगा।  नौसेना और कुछ हद तक सेना ने एकीकृत कमान को लेकर रुझान दिखाया। आखिरकार, तमाम अन्य व्यापक मुद्दों की तरह अरुण सिंह को भी समझौता करना पड़ा। तय हुआ कि निजी तौर पर कमान बरकरार रहेगी लेकिन दो नए एकीकृत संस्थान बनाए जाएंगे। द्वीपों के लिए बनने वाले कमान को अंडमान और निकोबार का नाम दिया गया। वहीं परमाणु मुद्दों से निपटने वाली कमान को स्ट्रैटजिक कमान का नाम दिया गया। 
 
डीजीडीपीएस को बहाल कर उसका नाम बदल दिया गया। अब वह चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (सीआईएससी) बन गया था। यह पद अभी भी चेयरमैन चीफ्स ऑफ स्टाफ के प्रति जवाबदेह था। अरुण सिंह ने अनुशंसा की थी कि इस पद पर आसीन व्यक्ति को प्रमुख सैन्य सलाहकार होना चाहिए तथा उसकी अनुशंसाओं को मंत्रिसमूह द्वारा स्वीकार किया जाना चाहिए। परंतु हमारे राजनीतिक प्रतिष्ठïान ने बीते 17 वर्ष से इस मामले को अधर में लटकाकर रखा है।  संक्षेप में कहें तो सीआईएससी सन 1985 में बने प्रतिष्ठïान से कतई अलग नहीं है बल्कि इसका नौकरशाही ढांचा और व्यापक है। दोनों एकीकृत कमान काम कर रही हैं। हालांकि उनका नेतृत्व अब तीनों सेनाओं के बजाय नौसेना और वायुसेना के हाथ में है। इस बीच कुछ और कमान गठित करने के सुझाव सामने आए हैं। पहले से मौजूद 19 कमान भी सक्रिय हैं। 
 
यह सवाल बनता है कि जब दुनिया के सभी प्रमुख देशों में एकीकृत सैन्य कमान सफलतापूर्वक संचालित है तो भारत में इसे अनावश्यक क्यों माना जा रहा है? एक वजह यह हो सकती है कि न केवल हमारे राजनेता बल्कि सेना भी हितों के बजाय खतरे का ध्यान करके चलती है। चूंकि खतरा अक्सर जमीन पर होता है इसलिए थल सेना के पास कमान होनी चाहिए क्योंकि उस पर जिम्मेदारी भी है। अन्य सहायक भूमिका में ही हो सकते हैं। दूसरी बात, अच्छा प्रदर्शन करने वाली व्यवस्था से छेड़छाड़ क्यों की जाए? तीसरी बात, क्या एक स्थायी चीफ्स ऑफ स्टाफ चेयरमैन अधिक आक्रामक होगा और वह समस्या बन सकता है? 
 
चौथी बात क्या सेना की परिचालन कमान को ऐसे एक चेयरमैन के अधीन करना उचित होगा। पांचवां, क्या इससे सेना प्रमुखों का कद और कमजोर नहीं होगा? इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं और सबसे बेहतर यही होगा कि यथास्थिति बनी रहने दी जाए। हर जगह ऐसे सुधार राजनीतिक निर्देश पर ही लागू होते हैं और ज्यादातर मौकों पर यह सैन्य पदानुक्रम की इच्छा के विरुद्घ होता रहा है। परंतु लगता नहीं कि भारत में ऐसा किया जा सकता है क्योंकि हमारे यहां बदलाव को लेकर तगड़ा प्रतिरोध है। ऐसे में मौजूदा व्यवस्था के पुरातन होने का आकलन सही है लेकिन इसमें जल्द सुधार की उम्मीद आशावादी है। 
 
(लेखक डिफेंस प्लानिंग स्टाफ के महानिदेशक रह चुके हैं। सेवानिवृत्ति के बाद वह उच्च रक्षा प्रबंधन पर अरुण सिंह के नेतृत्व में बनी समिति के सदस्य भी थे। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।) 
Keyword: defense, military, aircraft,,
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