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पाक में सुधारों की कीमत

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  August 03, 2018

पाकिस्तान में चुनाव के बाद के हालात के प्रेस कवरेज का ध्यान इमरान खान के सेना के साथ रिश्तों और भारत के साथ उसकी संभावित नीति के बजाय देश की खस्ता आर्थिक स्थिति को ओर स्थानांतरित हो गया है। इनमें अंतिम दो बातें आपस में संबंधित हैं। पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार इस वर्ष बहुत तेजी से घटा है जबकि उसका चालू खाते का घाटा बढ़ा है। देश पर भारी भरकम कर्ज अदायगी भी बकाया है। पाकिस्तानी रुपया बुरी तरह लडख़ड़ाया है। हालांकि केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में तेज इजाफा किया है। पहले मई में इसमें इजाफा किया गया था और पिछले महीने भी इसमें 100 आधार अंकों का इजाफा किया गया। छह वर्ष की तेजी के बाद आर्थिक वृद्घि में गिरावट आना तय है। इस दौरान इसने 5.6 फीसदी की उच्चतम दर हासिल की। ऐसा लगता है कि उसे अंतरराष्टï्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के समक्ष ऋण के लिए आवेदन करना ही होगा। 
 
यहां अमेरिका बनाम चीन के मुकाबले की रोचक पृष्ठïभूमि तैयार होती है। चीन पाकिस्तान का वित्त पोषण करने वाला सबसे बड़ा देश है। गत जून में समाप्त वित्त वर्ष 2017 में पाकिस्तान ने जो विदेशी मुद्रा ली उसमें 38 फीसदी हिस्सेदारी चीन की थी। इस बीच अमेरिका छठे हिस्से के बराबर मताधिकार के साथ आईएमएफ का सबसे बड़ा अंशधारक है। उसने कहा है कि वह पाकिस्तान द्वारा आईएमएफ के धन का इस्तेमाल चीन का कर्ज चुकाने में किए जाने का विरोध करेगा। इसका यह अर्थ नहीं है कि उसे ऋण स्वीकृत नहीं किया जाएगा लेकिन उसके लिए पाकिस्तान को अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का सहयोग जुटाना होगा। 
 
ऋण मंजूर हो या नहीं, पाकिस्तान को अपनी स्थिति दुरुस्त करनी होगी। पाकिस्तान एक नए और अनुभवहीन प्रधानमंत्री के अधीन काम कर रहा होगा। ऐसे में सुधार का पूरा बोझ वित्त मंत्री के कंधों पर आएगा। माना जा रहा है कि कारोबारी से राजनेता बने असद उमर को वित्त मंत्री बनाया जाएगा। ऐसी संभावना बन सकती है कि खान और उमर नरसिंह राव और मनमोहन सिंह का करिश्मा दोहराने का प्रयास करें और विदेशी मुद्रा संकट के बीच व्यापक आर्थिक सुधारों पर काम करें। उमर कई वर्ष पहले तब सुर्खियों में आए थे जब एनग्रो समूह के मुख्य कार्याधिकारी के रूप में उन्हें पाकिस्तान में सबसे अधिक वेतन मिल रहा था। उन्होंने 50 वर्ष की उम्र में राजनीति में शामिल होने के लिए पद से इस्तीफा दे दिया। वह तब से ही इमरान खान की पाकिस्तान तहरीके इंसाफ (पीटीआई) की ओर से संसद के सदस्य हैं। माना जाता है कि पीटीआई के घोषणापत्र में निगमित कर को कम करने और सरकार को तमाम सरकारी उपक्रमों से दूर करते हुए उन्हें स्वतंत्र प्रबंधन के अधीन करने की बात उन्होंने ही लिखी है। 
 
सुधार का एजेंडा निवेशकों और ऋणदाताओं को उत्साहित कर सकता है और डॉलर का बहिर्गमन रोक सकता है। इससे वित्तीय स्थिरता बहाल करने में भी मदद मिलेगी। इसका एक अर्थ यह भी है कि इमरान खान को अपना जनकल्याण योजनाओं का खर्चीला चुनावी वादा भूलना होगा। गुंजाइश कम है लेकिन व्यय में भी कटौती करनी होगी। ब्याज भुगतान के बाद सबसे अधिक व्यय रक्षा क्षेत्र में होता है। इस क्षेत्र का खर्च सरकार द्वारा स्वास्थ्य और शिक्षा पर किए जाने वाले खर्च से आठ गुना अधिक है। क्या सेना के उच्चाधिकारी अपने ही आदमी की चुनावी जीत के बाद अपने खर्च में कटौती के लिए सहमत होंगे? 
 
ज्यादा से ज्यादा यह हो सकता है कि खान और उमर आईएमफ से मदद हासिल करें और अर्थव्यवस्था को बार-बार के संकट से उबार लें। भारत में राव और सिंह ने जो करिश्मा किया था, उसे दोहराए जाने की संभावना नजर नहीं आती। इसकी एक सीधी वजह यह है कि पाकिस्तान के सकल घरेलू उत्पाद के हिस्से के रूप में बचत और निवेश की दर भारत की तुलना में आधी भी नहीं हैं। ऐसे में भारत जैसी आर्थिक वृद्घि हासिल करना संभव नहीं दिखता। कर-जीडीपी अनुपात भारत की तुलना में बमुश्किल दो तिहाई है। ऐसे में सरकार की व्यय करने की क्षमता भी सीमित है। गत वर्ष सुधार के पहले लगातार तीन साल तक निर्यात में गिरावट आई। पाकिस्तानी रुपया फिलहाल 123 रुपये प्रति डॉलर है। यह प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता के लिहाज से अभी कम है। 
 
आखिर में अगर खान की भारत नीति की बात करें तो उनके लिए सबसे तार्किक बात यही होगी कि वह भारत के साथ शांति स्थापना के प्रयास करें, रक्षा खर्च में कमी करें और कायम हुई शांति व्यवस्था का इस्तेमाल देश की अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए करें। दुर्भाग्यवश लगता नहीं कि ऐसा कुछ हो पाएगा।
Keyword: pakistan, election, Imran Khan, पाकिस्तान आम चुनाव,
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