बिजनेस स्टैंडर्ड - पुरानी चीनी मिलों के रेल इंजनों का संरक्षण
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पुरानी चीनी मिलों के रेल इंजनों का संरक्षण

विवेक देवरॉय /  August 02, 2018

खस्ताहाल सार्वजनिक उपक्रमों की परिसंपत्तियों के बारे में विचार करते समय हमें जमीन, संयंत्र और मशीनों के अलावा पुराने रेल इंजनों पर भी गौर करना चाहिए। बता रहे हैं विवेक देवरॉय

 
बिहार का विभाजन होने के बाद इस राज्य में 28 चीनी मिलें रह गईं। उनमें से आधी से अधिक मिलें अब बंद हो चुकी हैं। खासकर बिहार राज्य चीनी निगम (बीएसएससी) के नियंत्रण वाली मिलों की हालत अधिक खस्ता है। निजी क्षेत्र की खस्ताहाल चीनी मिलों एवं डिस्टिलरी के नियंत्रण, परिचालन एवं प्रबंधन के लिए 1974 में बीएसएससी का गठन किया गया था। उसके बाद निजी क्षेत्र की 15 चीनी मिलों एवं दो डिस्टिलरी का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। लेकिन जैसा होता आया है, खस्ताहाल निजी कंपनियां सार्वजनिक क्षेत्र का हिस्सा बनने के बाद भी उसी हालत में बनी रहीं। वैसे इस लेख में हम बीएसएसी मिलों के निजीकरण या उनमें नई जान फूंकने के बारे में चर्चा नहीं करेंगे। 
 
मधुबनी के लोहट स्थित दरभंगा शुगर कंपनी लिमिटेड मिल का भी राष्ट्रीयकरण किया गया था। वर्ष 1914-15 में शुरू हुई इस मिल का 1977 में अधिग्रहण किया गया और फिर 1997-98 में बंद कर दिया गया। इंपीरियल गजट ऑफ इंडिया के मुताबिक '1874 के अकाल ने दरभंगा में रेलवे के निर्माण को बड़ा प्रोत्साहन दिया था और संचार सुविधाओं के मामले में यह काफी धनी है। जिले के दक्षिण-पश्चिम इलाके में 29 किलोमीटर तक बंगाल एवं उत्तर-पश्चिम रेलवे (बीएनडब्ल्यूआर) की मुख्य रेल लाइन है। हाजीपुर से बछवाड़ा को जोडऩे वाली नई लाइन भी 25 मील तक इस जिले में गंगा नदी के समानांतर होकर गुजरती है। समस्तीपुर से एक रेल लाइन दरभंगा शहर तक जाती है और उसकी शाखाएं दो दिशाओं में बंट जाती हैं। पश्चिमोत्तर की ओर जाने वाली एक शाखा कमतौल और जोगियारा होते हुए सीतामढ़ी जाती है जबकि दूसरी शाखा कोसी के किनारे खानवा घाट तक पहुंचती है।' भारत के दूसरे हिस्सों में भी रेलवे का विस्तार अकाल के समय फौरी राहत मुहैया कराने और भविष्य में ऐसे हालात से निपटने में सहयोगी होने के आधार पर किया गया था। 
 
यह हमारा ध्यान दरभंगा के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह (1858-98) और तिरहुत स्टेट रेलवे (टीएसआर) की ओर भी ले जाता है। माना जाता है कि महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने 1874 में दरभंगा से बाजितपुर तक रेललाइन के निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी। बिहार में 1873-74 के भीषण अकाल के बाद खुद दरभंगा नरेश भी लोक निर्माण कार्यों में सक्रिय हो गए थे।  सवाल यह है कि दरभंगा और बाजितपुर के बीच रेल लाइन का निर्माण किसने कराया था? निश्चित रूप से यह बीएनडब्ल्यूआर तो हो नहीं सकता था क्योंकि उसका गठन ही 1882 में हुआ था। असल में यह लाइन टीएसआर ने बिछाई थी। समस्तीपुर-दरभंगा लाइन को भी टीएसआर ने ही बनाया था। इन रेललाइनों समेत कई मीटर गेज लाइनों को बीएनडब्ल्यूआर ने बाद में अपने नियंत्रण में ले लिया था। वैसे रेलवे के बाकी हिस्सों की तरह टीएसआर के बारे में उतना लिखा नहीं गया है। 
 
साइमन डार्विल की किताब 'इंडस्ट्रियल रेलवे ऐंड लोकोमोटिव्स ऑफ इंडिया ऐंड साउथ एशिया' पढऩे से लगता है कि लोहट चीनी मिल को टीएसआर ने ही 1914 में खोला था। उस समय दरभंगा के शासक महाराजा कामेश्वर सिंह (1907-64) थे। वर्ष 1917 में पंडौल स्टेशन और चीनी मिल के बीच मीटर गेज लाइन बिछाने के लिए बीएनडब्ल्यूआर और टीएसआर के बीच समझौता भी हुआ था। सवाल उठता है कि लोहट में यह मिल क्यों लगाई गई थी जबकि सबसे नजदीकी रेल स्टेशन पंडौल में है? इसके जवाब के लिए मैं 1908 में प्रकाशित मिंडेन विल्सन की किताब 'हिस्ट्री ऑफ बिहार इंडिगो फैक्ट्रीज' पढऩे की सलाह देता हूं। इस लेखक के मुताबिक, 'मैंने पंडौल, नरहरा, जयनगर या कमतौल का विवरण दर्ज नहीं किया है। ये सभी कारखाने दरभंगा के महाराजा से संबंधित हैं... इस बात में कोई संदेह नहीं है कि बिहार में गन्ने की खेती की संभावनाएं हैं। मुझे 1793 और उसके बाद के दस्तावेजों से पता चला है कि तिरहुत इलाके में स्थित नील के पुराने कारखानों को चीनी एवं शीरा बनाने के लिए पेश किया जा रहा है। अपने बैलों के चारे के तौर पर एक-दो बीघा गन्ना उपजाने वाले किसानों को भी अनुभव से पता है कि गन्ने की फसल लगने के बाद उस खेत में नील की अच्छी खेती होती है। उनको लगता है कि ऐसी स्थिति में गन्ने की खेती करना भी फायदे का सौदा क्यों नहीं हो सकता है? कुछ अध्ययनों से पता चला है कि नए खेतों में भी गन्ने की फसल से अच्छी कमाई हो सकती है।' 
 
पंडौल में नील का एक बड़ा कारखाना पहले से ही मौजूद था। महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने तिरहुत इलाके में एक तरह से नील की खेती पर पूरी तरह रोक लगा दी थी। ऐसे में विचार आया कि वहां पर क्यों न एक चीनी मिल लगाई जाए। पंडौल स्टेशन से लोहट चीनी मिल तक जाने वाली रेल लाइन भी बिछाई गई थीं। वहां रेल पटरियां मौजूद थीं तो फिर रेल इंजन भी होने चाहिए थे और भाप से चलने वाले ये इंजन चीनी के साथ थोड़ा बहुत नील भी लेकर जाते होंगे। भारतीय रेलवे अपनी विरासत के संरक्षण को लेकर अब अधिक जागरूक हो गया है और पुराने दौर के इंजनों को उसने संरक्षित भी कर रखा है। हालांकि कुछ इंजन रेलवे के नियंत्रण के बाहर भी हो सकते हैं। खास तौर पर कोयला खदानों और चीनी कारखानों में ढुलाई के लिए इस्तेमाल होते रहे कुछ पुराने रेल इंजन अब भी मौजूद हो सकते हैं। लोहट चीनी मिल की पुरानी तस्वीरों के बारे में तलाशने पर भी इंटरनेट पर कुछ खास नजर नहीं आता है। हालांकि इसकी तगड़ी संभावना है कि आपको शेड के भीतर खड़ा पुराना मीटर गेज का भाप का इंजन की तस्वीर दिख जाए। व्हाइट संकेत पद्धति के मुताबिक वह 0-6-0 श्रेणी का इंजन है। 
 
जब हम खस्ताहाल सार्वजनिक उपक्रमों की परिसंपत्तियों के बारे में सोचते हैं तो हमारा ध्यान जमीन, कारखाने और मशीनों की तरफ ही जाता है। लेकिन कुछ लोको इंजन भी इसका हिस्सा हो सकते हैं। शुरू में मैंने आप से हालिया रिपोर्टों को नजरअंदाज करने को कहा था क्योंकि यह लोको इंजन हाल में चर्चा में रहा है।  बीएसएससी का मानना है कि इस इंजन का स्वामित्व राज्य सरकार के पास है। बिहार सरकार ने अब इसे हटाने की अनुमति दे दी है और इसे लोहट से हटाकर दरभंगा रेल स्टेशन ले जाया गया है ताकि लोग इसे देख सकें और उसकी तारीफ करें। लोग इसे काफी पसंद भी कर रहे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक यह इंजन छोटी गेज लाइन का है (असल में इसे मीटर गेज का होना चाहिए)। रिपोर्ट कहती हैं कि यह इंजन 1913 में बना था और चीनी मिल में उसे अगले साल ले जाया गया। हो सकता है कि यह भी सच न हो। इंटरनेट से मुझे पता चला कि इस इंजन का निर्माण स्टैफर्ड के मशहूर लोको निर्माता बैग्नल ने 1919 में 2120 कूटनाम से किया था। भारत में लाए जाने पर इस इंजन को 253 नंबर की पहचान मिली। बैग्नल की 0-6-0 सीरीज का केवल एक और इंजन ही भारतीय रेल के पास है जो उसके संग्रहालय में रखा हुआ है।
 
(लेखक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)
Keyword: sugar, farmer, mills, rail,,
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