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संवेदनशील है आधार का डेटाबेस स्वतंत्र निगरानी की हो व्यवस्था

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  August 01, 2018

नीतिगत विवादों को सोशल मीडिया पर हल करने का विचार सिरे से गलत है। अक्सर सोशल मीडिया पर होने वाली चर्चा मूल मुद्दे से भटक जाती है। ढेर सारी बातें होती हैं लेकिन मुद्दे पर एक भी नहीं।  फिर भी कई जवाबदेह पदों पर बैठे लोगों ने हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर अपनी बात रखते हुए खास नीतिगत मुद्दों पर बहस छेड़ी है। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के चेयरमैन रामसेवक शर्मा भी उनमें से एक हैं।  शर्मा भारतीय विशिष्टï पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) द्वारा जारी 12 अंकों के बायोमेट्रिक आधारित पहचान 'आधारÓ के बड़े समर्थकों में से एक हैं। वह 2009 से 2013 तक यूआईडीएआई के पहले महानिदेशक रहे हैं और आधार प्रणाली से बहुत करीबी से जुड़े रहे हैं। माना जा रहा था कि यह प्रणाली नकली पहचान और दोहरी पहचान की समस्या को खत्म करने में सहायक रहेगी। परंतु डिजिटल मजबूती और डेटा में सेंध की समस्या 2009 में आधार की शुरुआत के बाद से ही चर्चा में बनी हुई है। यह बहस गत सप्ताह नई ऊंचाई पर पहुंच गई जब सोशल मीडिया पर किसी के चुनौती देने के बाद उन्होंने अपनी आधार पहचान ट्विटर पर साझा करते हुए कहा कि आधार मजबूत है और नंबर सार्वजनिक होने पर भी उसका दुरुपयोग संभव नहीं है। उन्होंने चुनौती दी कि उनके आधार का दुरुपयोग करके दिखाया जाए। वह ऐसा करके आधार के आलोचकों को यह बताना चाहते थे कि इसके साथ छेड़छाड़ संभव नहीं। 

 
आने वाले दिनों में सोशल मीडिया की कई पोस्ट में लोगों ने शर्मा के फोन नंबर, ईमेल, उनका पैन और आदि जारी करके बता दिया कि आधार की मदद से उन्होंने ये हासिल किए। एक व्यक्ति ने बताया कि कैसे उनके खाते में रकम तक जमा की जा सकती है।  शर्मा इन खुलासों से विचलित नहीं हुए। वह सही भी थे। जो डेटा लीक होने की बात कही गई उससे यह साबित नहीं होता था कि शर्मा की आधार पहचान में सेंध लगी है। ऐसी जानकारी कई सार्वजनिक स्रोतों से जुटाई जा सकती है। यहां तक बिना उनकी पहचान के साथ समझौता किए उनके खाते में एक रुपये की राशि भी जमा की जा सकती है। 
 
इस पूरे घटनाक्रम से हमें एथिकल हैकिंग करने वाले समुदाय के बारे में भी जानकारी मिलती है जिसने शर्मा की पहचान में सेंध लगाने का प्रयास किया। साथ ही हमें उस बहस का भी अंदाजा मिलता है जो सोशल मीडिया जैसे माध्यमों पर होती है। आधार की निंदा करने वाले अपनी बात को पूरी तरह साबित कर पाने में नाकाम रहे, वहीं सोशल मीडिया भी नीतिगत मसलों पर किसी गंभीर या स्वस्थ बहस को पूरा करने में पूरी तरह नाकाम नजर आता है।  इसके बावजूद यह मान लेना गलत होगा कि शर्मा का आधार के पूर्ण सुरक्षित होने का दावा सही है और उसके साथ छेड़छाड़ की कोई खास गुंजाइश नहीं है। हो सकता है शर्मा की आधार पहचान में सेंध नहीं लगाई गई हो लेकिन यह कहना गलत होगा कि इस व्यवस्था में कोई जोखिम नहीं है। यहां जोखिम केवल निजता के मसले का नहीं है। उम्मीद की जानी चाहिए कि निजता की चिंता को न्यायमूर्ति बीएन श्रीकृष्ण समिति की रिपोर्ट के बाद बनने वाले प्रस्तावित कानून से हल किया जा सकेगा। परंतु कई अन्य जोखिम भी हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। हालिया विवाद के सिलसिले में इनमें से दो जोखिमों का जिक्र करना उचित होगा। 
 
पहला, आधार व्यवस्था एक डेटाबेस में निहित है। पूरे देश के बायोमेट्रिक पहचान डेटा को एक जगह रखना अपने आप में जोखिम भरा है। हैकरों या शत्रु राष्ट्र के लिए इसमें सेंध लगाना आसान हो सकता है। अगर देश के सभी नागरिकों के लिए आधार पहचान अनिवार्य हो जाए तो यह जोखिम और बढ़ जाता है।  आधार के समर्थक दलील देंगे कि यह पहचान का प्रमाण नहीं है बल्कि यह पहचान के प्रमाणन का जरिया है। परंतु जिस तरह आधार का इस्तेमाल हो रहा है उसे देखकर कहा जा सकता है कि वह पहचान का प्रमाण बनकर रह गया है।
 
यह बात सही है कि किसी पहचान का प्रमाणन करना जरूरी है। परंतु सवाल यह है कि पहचान के प्रमाणन के लिए केवल आधार का इस्तेमाल क्यों किया जाए? आयकर के उद्देश्य से पैन जारी करते समय या ड्राइविंग लाइसेंस जारी करते समय भी उसी तरह का प्रमाणन क्यों नहीं? ऐसा शासन ढांचा जो केवल एक ही पहचान व्यवस्था पर निर्भर हो वह समान मजबूती वाली पहचान प्रणाली की तुलना में कमजोर होता है। आधार पर जोर तथा हर तरह की अन्य पहचान व्यवस्था को दरकिनार करना एक खतरनाक रास्ता है और अगर डिजिटल संवेदनशीलता के जोखिम को खत्म करना है तो हमें इससे बचना होगा। 
 
दूसरा जोखिम आधार डेटाबेस को सुरक्षित रखने वाले संगठनात्मक ढांचे से ताल्लुक रखता है। शासन चाहे किसी का भी हो, पूरे देश का पहचान डेटा राजनीतिक नेतृत्व के सीधे नियंत्रण और पर्यवेक्षण के अधीन होगा। आखिर ऐसा महत्त्वपूर्ण डेटाबेस अगर एक संवैधानिक स्वतंत्र निकाय के अधीन क्यों नहीं रह सकता? इस बात से इनकार नहीं है कि पूरे देश की पहचान का डेटाबेस उसके लिए किसी बहुत बड़ी संपत्ति से कम नहीं है जिसका इस पर नियंत्रण हो। ऐसा डेटाबेस किसी स्वतंत्र निकाय के पास रहना चाहिए। बेहतर होगा अगर उक्त निकाय को भारतीय नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक या भारतीय निर्वाचन आयोग जैसी स्वतंत्रता हासिल होगी। जब तक आधार डेटाबेस का स्वामित्व ऐसे किसी स्वतंत्र संस्थान को हस्तांतरित नहीं होता है तब तक आधार की डिजिटल संवेदनशीलता को लेकर चिंता बरकरार रहेगी। 
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