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तेलंगाना की राजनीति और केसीआर का गुणा-गणित

आदिति फडणीस /  July 31, 2018

 पिछले दिनों तेलुगू राजनीति काफी सुर्खियों में रही। पहले तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) ने आंध्र प्रदेश के लिए विशेष दर्जे की लड़ाई लड़ी तो उसके बाद तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) ने खुद को गैर कांग्रेस, गैर भाजपा पार्टियों के बीच मजबूती से स्थापित करने की कोशिश की। ये वे दल हैं जो 2019 के आम चुनाव के पहले एक संघीय मोर्चा बनाने के लिए प्रयासरत हैं। तेलुगू देशम ने अपना रास्ता एकदम अलग कर लिया। वह भारतीय जनता पार्टी पर पूरी तरह हमलावर रुख अपनाए हुए है। यह एनटी रामाराव के दिनों की याद दिलाता है जो तेलुगूभाषी लोगों की आवाज और उनका आत्म गौरव बनकर उभरे थे। परंतु टीआरएस कहीं अधिक बारीकी से खेल रही है। 

पहले बात करते हैं आंकड़ों की। तेलंगाना की 119 सदस्यों वाली विधानसभा में टीआरएस के 82 विधायक हैं जबकि मजलिस ए इत्तेहाद उल मुसलमीन (एमआईएम) के पास सात सीट हैं। कांग्रेस 17 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल है जबकि भाजपा के पास केवल पांच सीट हैं। आपको लगेगा कि टीआरएस के हमले की जद में कांग्रेस होगी क्योंकि वह मुख्य विपक्षी दल है। परंतु ऐसा नहीं है। हाल ही में जब जनता दल सेक्युलर के विधायकों ने पड़ोसी राज्य कर्नाटक में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया तो विधायकों को सुरक्षित रखने के लिए हैदराबाद ले जाया गया। मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने रिजॉर्ट जाकर विधायकों से मुलाकात तो नहीं की लेकिन हरसंभव मुदद की। मुलाकात न करने की वजह यही रही होगी कि विधानसभा में टीआरएस और कांग्रेस आमने-सामने हैं। 

लेकिन इसके साथ-साथ भाजपा भले ही तेलंगाना में कोई राजनीतिक शक्ति नहीं हो लेकिन राव ने ध्यान रखा कि उसमें चिढ़ पैदा न की जाए। केसीआर की बेटी कविता निजामाबाद से सांसद हैं। हैदराबाद में चर्चा है कि वह अगली बार विधानसभा चुनाव लडऩा चाहती हैं। उनका इरादा राज्य की राजनीति में सक्रिय होने का है और वह मई 2019 में होने वाले विधानसभा चुनाव में जगतियाल सीट से लडऩा चाहती हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में निजामाबाद की सात विधानसभा सीटों में से टीआरएस को छह में जीत मिली थी। इससे पता चलता है कि पार्टी का कितना असर है। कविता जगतियाल से लडऩा चाहती हैं। यह इकलौती सीट थी जहां टीआरएस पीछे और कांग्रेस आगे थी। यह प्रतिष्ठा का प्रश्न है और राजनीतिक अस्तित्व का भी। 

उस स्थिति में लोकसभा सीट को अरविंद धर्मपुरी के लिए तैयार किया जा रहा है। यही वह सीट है जहां से कांग्रेस प्रवक्ता मधु गौड यक्षी पिछले आम चुनाव में हारे थे। इसके पीछे एक कहानी है। धर्मपुरी के पिता डी श्रीनिवास टीआरएस के एक बड़े नेता और राज्यसभा सदस्य हैं। धर्मपुरी ने गत वर्ष भाजपा की सदस्यता ली थी और उनके पास टीआरएस और कविता के खिलाफ शिकायतों का पुलिंदा था। कविता के लोकसभा चुनाव न लडऩे का संकेत देकर टीआरएस ने भाजपा को आश्वस्त कर दिया है कि निजामाबाद की सीट उपलब्ध है। टीआरएस और भाजपा के बीच एक अनकहा समझौता यह लग रहा है कि टीआरएस तीन लोकसभा सीटों सिकंदराबाद, निजामाबाद और महबूबनगर में नाममात्र के लिए उम्मीदवार उतारेगी बदले में भाजपा सभी सात विधानसभा सीटों पर पीछे रहेगी। 

परंतु तेलंगाना की राजनीति केवल यहीं तक सीमित नहीं है। तेलंगाना में मुस्लिम आबादी 15-16 प्रतिशत के करीब है लेकिन वे मुख्यरूप से हैदराबाद में एमआईएम के साथ हैं। केसीआर मुस्लिमों और एमआईएम को अलग-थलग नहीं रहने दे सकते। उन्होंने नोटबंदी पर भाजपा की तारीफ की थी और अविश्वास मत के दौरान गैरहाजिर रहकर उसकी मदद की थी। परंतु इसके साथ-साथ वह मुस्लिमों से भी वादा कर रहे हैं कि उर्दू प्रदेश की दूसरी भाषा होगी। तेलंगाना विधानसभा ने पिछड़े मुसलमानों को शिक्षण संस्थानों में आरक्षण 6 से बढ़ाकर 12 फीसदी करने का विधेयक पास जरूर किया है लेकिन वह केंद्र सरकार के पास लंबित है। केसीआर सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि वह इसके लिए लड़ेंगे। उनके सांसदों ने बजट सत्र में लगातार सात दिन तक लोकसभा को बाधित किया। उनकी मांग थी कि आरक्षण का कोटा राज्यों के पास रहना चाहिए। 

अनुमान है कि आगामी विधानसभा चुनाव में टीआरएस को 10 सीटों का नुकसान हो सकता है। ऐसा आंशिक रूप से कांग्रेस के लिए समर्थन के चलते होगा लेकिन उसे भाजपा का समर्थन भी मिलेगा। कांग्रेस 2 अक्टूबर से आगामी लोकसभा के लिए अपना प्रचार शुरू करेगी। अभी हाल ही में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह हैदराबाद गए थे। वहां उन्होंने पार्टी के विधायकों का यह दावा मानने से इनकार कर दिया कि तेलंगाना में पार्टी मजबूत है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि 24 बिंदु वाली कार्य सूची में से उन्होंने केवल 12 का क्रियान्वयन किया है। गोशमहल के विधायक टी राजा सिंह ने कहा कि माहौल भाजपा के पक्ष में है। जानकारी के मुताबिक शाह ने उनसे कहा कि पहले वे दिखाएं कि वे खुद कितने मजबूत हैं। इन हालात में के चंद्रशेखर राव के आगामी कदमों पर नजर रखनी होगी। वह राजनीति के बेहद चपल खिलाड़ी हैं।
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