बिजनेस स्टैंडर्ड - खाद्य उत्पादों में जीएम तत्त्व और कायदा-कानून के दांवपेच
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खाद्य उत्पादों में जीएम तत्त्व और कायदा-कानून के दांवपेच

सुनीता नारायण /  July 30, 2018

सरकार से हमारी अपेक्षा यही होती है कि वह सही और गलत में भेद करे। परंतु जब बात हमारे खाने के नियमन की आती है तो लगता है कि हम सरकार से कुछ ज्यादा ही अपेक्षा कर रहे हैं। हमारी ताजा जांच इसकी गवाह है। सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वॉयरनमेंट (सीएसई) की प्रदूषण निगरानी प्रयोगशाला ने प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ के 65 नमूनों का परीक्षण किया ताकि उनमें जीन संवर्धित (जीएम) तत्त्वों की मौजूदगी का पता लगाया जा सके।

इसके नतीजे अच्छे और बुरे दोनों तरह के हैं। हमने जिन नमूनों का परीक्षण किया उनमें से 32 फीसदी में जीएम तत्त्व थे। यह बुरी बात है लेकिन इससे भी बुरी बात यह है कि हमें शिशुओं के खाने की चीजों में जीएम तत्त्व मिले। यह शिशु उत्पाद अमेरिकी दवा कंपनी ऐबट लैबोरेटरीज द्वारा बीमार शिशुओं के लिए बनाया जाता है। एक उत्पाद उन बच्चों के प्रयोग के लिए था जो लैक्टोस नहीं ले सकते थे। दूसरा उन बच्चों में एलर्जी की संभावना कम करने के लिए था जिन्हें किसी चीज से एलर्जी थी। दोनों ही मामलों में जीएम तत्त्वों को लेकर कोई चेतावनी नहीं दी गई थी। जीएम खाद्य पदार्थों से जुड़ी अहम स्वास्थ्य चिंता यह है कि ये एलर्जी उत्पन्न कर सकते हैं। वर्ष 2008 में (2012 में अद्यतन किया गया) भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने ऐसे खाद्य पदार्थों की सुरक्षा तय करने के लिए कुछ दिशानिर्देश जारी किए थे। परिषद की चेतावनी के मुताबिक इस बात की संभावना है कि चाहे गए बदलाव के साथ ऐसे अनचाहे बदलाव हो सकते हैं जो उपभोक्ता के स्वास्थ्य या उसके पोषण स्तर को प्रभावित कर सकते हैं।  

यही वजह है कि ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, यूरोपीय संघ और अन्य देश खाने में जीएम तत्त्वों का नियमन करते हैं। लोग खाने की चीजों के विषाक्त होने की आशंका से घबराते हैं और चेतावनी देखकर विचलित होते हैं। सरकार यह सुनिश्चित करती है कि उन्हें चयन का अधिकार हो। आंशिक रूप से अच्छी खबर यह है कि जो चीजें जीएम के प्रभाव वाली निकलीं उनमें से अधिकांश आयातित थीं। भारत अभी भी मोटे तौर पर जीएम से मुक्त है। एक खाद्य उत्पाद जो जीएम के प्रभाव वाला निकला वह था कॉटनसीड (बिनौला) खाद्य तेल। ऐसा इसलिए क्योंकि देश में केवल बीटी कॉटन ही एकमात्र जीएम फसल है। जिसकी खेती की इजाजत दी गई है। कॉटनसीड तेल में जीएम तत्त्व का होना चिंतित करने वाली बात है। पहली बात तो यह कि जीएम कॉटनसीड तेल के इंसानी खपत की कोई इजाजत कभी नहीं दी गई। दूसरी बात, कॉटनसीड तेल को अन्य खाद्य तेलों में भी मिलाया जाता है। खासतौर पर वनस्पति तेल में। 

जीएम खाद्य पदार्थ किसकी निगरानी में आयात किया जा रहा है? कानून इस बारे में एकदम स्पष्ट है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम किसी भी तरह के जीएम उत्पाद के आयात, निर्यात, परिवहन, निर्माण, प्रसंस्करण, इस्तेमाल या बिक्री को सख्त रूप से प्रतिबंधित करता है। केवल उन्हीं वस्तुओं के प्रयोग की अनुमति है जिन्हें पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (जीईएसी) की मंजूरी मिली हुई हो। 

विधिक माप (पैकेटबंद वस्तु) नियम 2011 में कहा गया है कि खाने की वस्तुओं के पैकेट पर जीएम की जानकारी दी जानी चाहिए। विदेश व्यापार (विकास एवं नियमन) अधिनियम 1992 में कहा गया  है कि जीएम खाद्य को बिना जीईएसी की इजाजत के आयात नहीं किया जा सकता है। अगर बिना मंजूरी का कोई जीएम खाद्य पदार्थ देश में आयात किया जाता है और बेचा जाता है तो उसके आयातक को जिम्मेदार मानते हुए उस पर इस उल्लंघन के लिए अधिनियम के तहत मामला चलाया जा सकता है।

सीएसई ने पाया कि कई बड़ी कंपनियां खुलेआम बिना जानकारी दिए जीएम खाद्य पदार्थ बेच रही हैं। उनके पास इसकी मंजूरी भी नहीं है। कुछ मामलों में हमने पैकेट पर लिखा देखा कि यह खाद्य पदार्थ जेनेटिक इंजीनियरिंग उपज के साथ बनाया गया है। इसकी अनुमति कैसे दी गई? इसका उत्तर यह है कि समस्या कानून में नहीं बल्कि हमारी नियामकीय एजेंसियों में है। वर्ष 2016 तक खाद्य पदार्थों में जीएम के नियमन का काम जीईएसी के पास था। एफएसएसएआई ने कहा कि उसके पास नियमन की क्षमता नहीं है। अब गेंद एक बार फिर एफएसएसएआई के पाले में है। वे बताएंगे कि जीएम खाद्य के आयात की इजाजत नहीं दी गई है। यह हमारे नियामकों का पाखंड है। कानून बनते हैं लेकिन उनका प्रवर्तन नहीं होता। वे कागज पर ही रहते हैं। यानी जीएम तत्त्वों को लेकर हमने जो भी पाया वह सब अवैध था। कानून स्पष्टï हैं लेकिन नियामक नहीं। यह चिंतित होने और नाराज होने की बात है क्योंकि यह हमारा खाना है। यह हमारे स्वास्थ्य का मसला है।

वर्ष 2018 में एफएसएसएआई ने लेबलिंग को लेकर एक मसौदा अधिसूचना जारी की जिसमें जीएम खाद्य पदार्थ शामिल थे। इसमें कहा गया कि कोई भी खाद्य पदार्थ जिसमें 5 फीसदी या उससे अधिक जीएम तत्त्व हो, उस पर लेबलिंग की जानी चाहिए और इस तत्त्व को उत्पाद के प्रतिशत के मुताबिक शीर्ष तीन में होना चाहिए। परंतु सरकार के पास यह सुनिश्चित करने का कोई तरीका ही नहीं है। यह जांच काफी मुश्किल है। हमारे पास इसके लिए जरूरी सुविधाओं की कमी है। यानी एक तरह से कंपनियों को यह छूट दी गई है कि वे खुद ही इस बारे में घोषणा करें। वे जो चाहें कह सकती हैं और बच सकती हैं। 

एफएसएसएआई ने एक और अधिसूचना जारी की थी जो जैविक खाद्य पदार्थ पर थी। यह कहती है कि यह जानकारी अनिवार्य तौर पर देनी होगी कि इसमें किसी तरह के कीटनाशक के तत्त्व नहीं हैं। यानी जो चीज अच्छी है उसमें यह उल्लेख जरूरी है कि वह सुरक्षित भी है। क्या मेरा यह पूछना गलत है कि किसके हितों का बचाव किया जा रहा है? अपने खाने का ध्यान रखिए। कोई और उसका ध्यान नहीं रखेगा।

Keyword: सीएसई, जीएम, शिशु, ऐबट लैबोरेटरीज, दवा कंपनी, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, यूरोपीय संघ, पर्यावरण, वन,
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