बिजनेस स्टैंडर्ड - कंपनियों को काली सूची में डालने पर दिशानिर्देश जरूरी
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कंपनियों को काली सूची में डालने पर दिशानिर्देश जरूरी

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  July 29, 2018

सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे काली सूची में डाली गई कंपनियों की फाइल गोपनीय रखें। अंतरराष्ट्रीय व्यापार खासकर रक्षा सौदों में तो ये विवरण और भी गोपनीय होते हैं। लेकिन एक ठेकेदार, विनिर्माता, आपूर्तिकर्ता या सलाहकार के लिए इस गोपनीयता के परिणाम अनर्थकारी होते हैं।  सरकार सबसे ज्यादा ठेके देती है। जब कोई सार्वजनिक उपक्रम किसी फर्म को काली सूची में डालता है तो बाकी कंपनियां भी उस फर्म के साथ वाणिज्यिक रिश्ता रखने से परहेज करने लगती हैं। इस तरह काली सूची में डाली गई कंपनियां निजी क्षेत्र के लिए भी अछूत हो जाती हैं। इस कलंक को मिटाने का इकलौता रास्ता अदालत की शरण में जाना ही रह जाता है। हालांकि कानूनी प्रक्रिया लंबे समय तक चलने से उस फर्म पर काली छाया लंबे समय तक मंडराती रहती है और नाशकारी जीत के बाद भी पूरी तरह मुक्ति नहीं मिल पाती है।

 
हाल के दिनों में कुछ न्यायालयों ने कंपनियों को काली सूची में डालने के सार्वजनिकों उपक्रमों के कुछ आदेशों को मनमाना या वाजिब वजह के बगैर उठाया गया कदम बताते हुए निरस्त कर दिया है। किसी ठेकेदार फर्म के खिलाफ लगाया जाने वाला आम आरोप यही होता है कि उसने योग्यता संबंधी शर्तों में छेड़छाड़ की, अनुबंध हासिल करने के लिए साझा उपक्रम साझेदारों के नाम का इस्तेमाल किया और वांछित नतीजे हासिल करने या मुश्किल मोड़ पर पहुंची बोली को वापस लेने के लिए अनुचित दबाव का इस्तेमाल किया है। ठेका दे दिए जाने के बाद भी प्रदर्शन ठीक नहीं होने या समय पर काम पूरा नहीं होने के आधार पर उस फर्म को काली सूची में डाला जा सकता है। 
 
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) इस तरह के कई मामलों में पक्षकार रहा है। उसने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक मामले की सुनवाई के दौरान यह दलील दी कि अदालतों को इन मामलों में दखल नहीं देना चाहिए क्योंकि उसने सभी तथ्यों पर सावधानीपूर्वक गौर किया है और वह इसके लिए सक्षम है। एनएचएआई ने एक फर्म को इस आधार पर काली सूची में डाल दिया था कि उसने सड़क निर्माण के अनुभव के बारे में गलत जानकारी दी थी। वहीं निर्माण फर्म का कहना था कि उसे अपना पक्ष रखने का मौका भी नहीं दिया गया। उच्च न्यायालय ने प्राधिकरण के आदेश को निरस्त करते हुए कहा, 'किसी भी कंपनी को काली सूची में डालने के गंभीर नतीजे होते हैं जिसकी वजह से हमेशा यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि ऐसे मामलों में निर्णय-निर्माण में वस्तुनिष्ठता बरतने के अलावा पूरी तरह संतुष्ट होना भी जरूरी होता है। इस दौरान अधिकारियों को उच्च स्तर की वस्तुनिष्ठ शुचिता का पालन करना चाहिए और यह सुनिश्चित करने की कोशिश करनी चाहिए कि मुकम्मल इंसाफ हुआ है।'
 
इस बीच बंबई उच्च न्यायालय ने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और पंजाब नैशनल बैंक की तरफ से एक विदेशी कंप्यूटर फर्म को काली सूची में डालने के फैसले को निरस्त कर दिया है। कंप्यूटर उपकरणों की आपूर्ति में देरी को आधार बनाते हुए उस फर्म को प्रतिबंधित कर दिया गया था जबकि उस कंपनी ने कहा था कि भारी बाढ़ आने के कारण सामान आयात नहीं किया जा सका। उच्च न्यायालय ने इन दलीलों के आधार पर उसके खिलाफ उठाए गए कदम को निरस्त कर दिया। ठेका कंपनियां अपने कारोबार के लिए काफी हद तक सार्वजनिक उपक्रमों पर आश्रित होती हैं और इसी के चलते उन्हें अन्यायपूर्ण समझौतों पर भी हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया जाता है। एनएचएआई ने भी एक कंपनी को ऐसे कागज पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा जिसमें उसे बिना किसी सुनवाई के कंपनी को काली सूची में डालने और ठेका निरस्त करने की शक्ति दी गई थी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि इस तरह का एकतरफा कदम उस फर्म के कारोबार करने के बुनियादी अधिकार को ही प्रभावित करता है। इस तरह की तनावपूर्ण स्थितियों का मूल कारण यह है कि किसी फर्म को काली सूची में डालने के बारे में कोई एकसमान नियम नहीं हैं और न ही इसके ठोस आधार तय हैं। उच्चतम न्यायालय ने अपने हालिया फैसलों में इस खामी की तरफ ध्यान दिलाया है। उच्चतम न्यायालय ने नोएडा में निर्धारित योजना से बाहर जाकर निर्माण करने वाले बिल्डरों को काली सूची में डालने के बारे में केंद्र सरकार से दो हफ्ते के भीतर समुचित दिशानिर्देश जारी करने को कहा है। हालांकि इन दिशानिर्देशों में निर्माण क्षेत्र के अलावा अन्य कारोबारी क्षेत्रों को भी शामिल करने की बात न्यायालय ने कही है। 
 
एक अन्य मामले में न्यायालय ने भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) को निविदा प्रक्रिया में शामिल और पहले से जारी परियोजनाओं से जुड़ी फर्मों को काली सूची में डालने के बारे में दिशानिर्देश तय करने को कहा था। इस मामले में ऑप्टिकल फाइबर की आपूर्ति करने वाली एक फर्म को हमेशा के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया था। बंबई उच्च न्यायालय ने इस कदम को सही ठहराया था लेकिन इसके खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई के बाद उच्चतम न्यायालय ने उसे खारिज कर दिया। 
 
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि बीएसएनएल के साथ कारोबार पर निर्भर फर्म को हमेशा के लिए प्रतिबंधित करना काफी सख्त फैसला है। उसने दोषी फर्मों पर कार्रवाई की प्रक्रिया में वस्तुनिष्ठता और पारदर्शिता का पालन करने के लिए विस्तृत दिशानिर्देशों की जरूरत भी महसूस की। हालांकि इन परामर्शों पर अमल करने के बजाय अनुबंध करने वाली फर्मों के बीच विश्वास कायम करने और भ्रष्टाचार के आरोपों पर लगाम लगाने के लिए शायद ही कोई कदम उठाया गया है। वैसे हाल के दिनों में अदालतों की तरफ से सरकार को दिए गए निर्देश कंपनियों को काली सूची में डालने की दशा-दिशा को तय करने का अवसर मुहैया करा रहे हैं। इस काम को जल्द-से-जल्द अंजाम दिया जाना चाहिए।
Keyword: supreme court, high court, उच्चतम न्यायालय,
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