बिजनेस स्टैंडर्ड - उद्घव ठाकरे को बधाई के राजनीतिक मायने
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उद्घव ठाकरे को बधाई के राजनीतिक मायने

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  July 29, 2018

हम जानते हैं कि राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता। वहां केवल हितों के अनुसार रिश्ते बदलते रहते हैं। इसके बावजूद हर तरह के राजनीतिक गठजोड़ या अलगाव देखने को मिले हैं जिनको हम जोड़-तोड़ की राजनीति कहते हैं। अब उनकी भूमिका नए सिरे से तैयार हो रही है। मुझे भारतीय राजनीति के तीन महान शिक्षकों से सीखने का अवसर मिला है। वे हैं प्रणव मुखर्जी, लालकृष्ण आडवाणी और सीताराम केसरी। मुझे यकीन है कि प्रणव दा मुझे यह बात कहने के लिए माफ कर देंगे कि बड़े फलक पर लालकृष्ण आडवाणी से बेहतर शिक्षक दूसरा कोई नहीं।

 
सन 1980 के दशक के आखिर में  जब आडवाणी ने भाजपा को नए सिरे से खड़ा किया तो वह गठबंधन निर्माण के बारे में एक बात कहते थे, 'पांच ऐसे दल हैं जिनको लगता है कि हम राष्ट्र विरोधी हैं। उनके अलावा हम किसी से भी गठबंधन करने को तैयार हैं।' इन पांच दलों के नाम थे कांग्रेस, वाम दल, मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी, लालू प्रसाद का राष्ट्रीय जनता दल और मुस्लिम लीग।  कुछ दल ऐसे भी थे जिनके पास भाजपा के साथ गठबंधन करने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था। मिसाल के लिए शिवसेना, शिरोमणि अकाली दल और उस वक्त का तेलुगू देशम। इनमें से पहले दो दलों की राजनीति और सत्ता प्राप्ति के लिए धर्म अनिवार्य तत्त्व था। तीसरे दल के पास कोई विकल्प नहीं था क्योंकि कांग्रेस उसकी इकलौती विरोधी पार्टी थी।
 
वह जो उपदेश देते थे, उस पर उन्होंने व्यवहार में भी अमल किया। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में उन्होंने जो गठबंधन सरकार बनाई वह अपना कार्यकाल पूरा करने वाली पहली गठबंधन सरकार थी। इससे गठबंधन को लेकर उपजा भय समाप्त हुआ। यह भ्रम भी टूटा कि कोई अन्य विकल्प नहीं है। इससे पहले तक जॉर्ज फर्नांडिस कहा करते थे कि अगर 'ससुराल' (इटली) में गठबंधन सरकार फलफूल सकती हैं तो भारत में क्यों नहीं? बहरहाल, बाद में उसी 'इटली की बेटी' ने एक ऐसा गठबंधन तैयार किया जो दो बार कार्यकाल पूरा करने में सफल रहा।
 
मूलभूत मानक फिर भी नहीं बदले। कई ऐसे दल थे जिनके साथ आप कभी जाना नहीं चाहें, ऐसे भी दल थे जिनके पास आपके साथ रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। इसके अलावा किसी भी चुनाव में 75 से 150 के बीच सीटें उन दलों को जानी तय होतीं जो सत्ता के अनुरूप अपनी विचारधारा बदल लेते। 272 सीटों में से करीब 160 ऐसी ही होतीं। अब यह सब बदल रहा है लेकिन उस तरह नहीं जिस तरह हमने 2014 में मोदी सरकार के बहुमत में आने के बाद अपेक्षा की थी। आज संकेतक 2014 के पहले के दौर की वापसी के संकेत दे रहे हैं। परंतु इस बार एक बदलाव है। इस बार किसी दल को पूर्ण बहुमत मिलने की संभावना नजर नहीं आ रही है। यहां तक कि भाजपा के समर्थक भी इसकी दलील नहीं दे रहे हैं। वे ज्यादा से ज्यादा यही कह रहे हैं कि उन्हें 230 से अधिक सीटों पर जीत मिलेगी। वे कहते हैं कि अगर इससे कुछ कम सीटें भी मिलीं तो भी भाजपा के सामने कौन है? यह सन 1989 के बाद की तरह है लेकिन एकदम उसकी तरह भी नहीं।
 
राहुल गांधी ने उद्धव ठाकरे के जन्मदिन पर उन्हें शुभकामनाएं क्यों दीं। उन्होंने ट्वीट किया कि वह हमेशा उनके अच्छे स्वास्थ्य और खुश रहने की कामना करते हैं? दरअसल पाखंड एक ऐसी चीज है जिससे राजनेता रत्ती भर नहीं हिचकिचाते। अपने विरोधी को जन्मदिन की शुभकामना देने में कुछ भी विचित्र नहीं है। या फिर कहें अचानक अपने सबसे बड़े विरोधी के गले लगकर उसे चौंका देने में भी। परंतु यहां मामला थोड़ा अलग है। इससे पहले कभी किसी कांग्रेस अध्यक्ष ने उस दल के सर्वोच्च नेता को यूं सार्वजनिक शुभकामना नहीं दी है जो वैचारिक रूप से एकदम विपरीत ध्रुव पर खड़ा है। शिवसेना, कांग्रेस के लिए भाजपा से भी अधिक अस्पृश्य है। वह राजग का सबसे अनिवार्य घटक रही है। अगर राहुल गांधी उसके मुखिया को सार्वजनिक रूप से शुभकामनाएं देते हैं तो इसके तीन अर्थ हो सकते हैं। पहला, वह भाजपा-शिवसेना में दरार देख रहे हैं और इस बात से प्रसन्न हैं, दूसरा वह 2019 में अपनी नीति को लेकर एकदम स्पष्ट हैं यानी मोदी के अलावा कोई भी भले ही उनका नाम पीछे रह जाए और तीसरा, अगर 2019 में एक बार फिर गठबंधन का दौर आता है तो वह आडवाणी द्वारा तय गठबंधन मानकों को तोडऩे के लिए तैयार हैं।
 
प्रेम, युद्ध और राजनीति तीनों में वह पुरानी कहावत लागू होती है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। अगर आप अपने दुश्मन के सबसे अच्छे दोस्त तक पहुंच बना रहे हैं तो यह दिखाता है आप जिसे नापसंद करते हैं उसे परास्त करने के आप दूसरे के कितना करीब जा सकते हैं। आप अपनी पार्टी और अपने परिवार के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं और आप भारत की अवधारणा को बचाना चाहते हैं। यानी नए नियम लिखे जा सकते हैं। वैचारिक अनिवार्यताओं को कुछ देर के लिए परे रखा जा सकता है।
 
मोदी के बहुमत पाने की कम होती संभावनाओं ने भी हमारी उस धारणा को नए सिरे से बल दिया है कि उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र (तेलंगाना सहित), तमिलनाडु, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और केरल में से जो पांच राज्यों में जीतेगा, उसी की सरकार बनेगी। हमने इन नौ राज्यों का चयन सबसे बड़े राज्य होने के आधार पर ही नहीं किया है बल्कि इसलिए भी किया है क्योंकि इन राज्यों में बड़ा बदलाव संभव है। यही वजह है कि हमने ओडिशा, पश्चिम बंगाल और गुजरात का नाम छोड़ दिया। उन नौ राज्यों में 351 संसदीय सीट हैं। पांच राज्यों में जीतने वाले गठबंधन को करीब 200 सीट मिलेंगी। 160 से अधिक सीट मिलना तो तय है। वर्ष 2014 तक यह आंकड़ा 272 था। 
 
अब इसे राहुल गांधी जैसे नेता के नजरिये से देखते हैं जिनका एक मात्र लक्ष्य है मोदी-शाह की भाजपा को अगली सरकार न बनाने देना। अगर सपा और बसपा साथ बनी रहती हैं तो भाजपा को उत्तर प्रदेश में एकतरफा जीत नहीं मिलेगी। बल्कि उसे 2014 की 73 सीटों का आधा जीतने के लिए भी संघर्ष करना होगा। राजस्थान, मध्य प्रदेश और हरियाणा में जहां 2014 में उसे बहुत बड़ी जीत मिली थी, वहां उसका प्रदर्शन नीचे आना तय है। उसे आशा है कि वह देश के पूर्वी और पूर्वोत्तर हिस्से में इसकी भरपाई कर लेगी। पिछले चुनाव में उसे महाराष्ट्र से 48 लोकसभा सीट मिली थीं, वहां वह अपनी पकड़ बनाए रखना चाहेगी। हाल के दिनों में अमित शाह ने कार्यकर्ताओं का आह्वान किया है कि महाराष्ट्र में पार्टी अपने दम पर लड़ सकती है। परंतु वह भी जानते हैं कि बिना शिवसेना की मदद के इतनी बड़ी जीत असंभव है।
 
यह बात राहुल भी जानते हैं। अगर 2019 में एक बार फिर मुकाबला उपरोक्त नौ राज्यों में केंद्रित हुआ तो वह महाराष्टï्र को भाजपा और राजग के हाथ में जाने नहीं दे सकते। यह बात तो कोई नहीं कहेगा कि शिवसेना कांग्रेस और संप्रग के साथ गठजोड़ करेगी लेकिन राहुल को इसकी जरूरत भी नहीं है। अगर शिवसेना राजग से बाहर रहती है तो भी उन्हें उनका लक्ष्य हासिल हो जाएगा। जहां तक अनकहे राजनीतिक समझौतों की बात है तो कांग्रेस और शरद पवार को इसमें महारत हासिल है।  कुल मिलाकर उद्घव ठाकरे को जन्मदिन की बधाई देने के राजनीतिक निहितार्थ यही हैं। अगर आप अविश्वास मत पर प्रधानमंत्री के भाषण को दोबारा सुनेंगे तो आपको एक अहम बात सुनाई देगी। उन्होंने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के प्रति नाराजगी के उलट तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव को विकास पुरुष को संज्ञा दी। नायडू अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर भाजपा विरोधी मोर्चा बनाने का प्रयास कर रहे हैं। अगर मोदी आंध्र और तेलंगाना में दरार पैदा करके उन तक पहुंच सकते हैं और राहुल गांधी उद्घव ठाकरे को बधाई दे सकते हैं तो आप कह सकते हैं इन चुनावों में कुछ भी हो सकता है।
Keyword: BJP, shivsena, narendra modi,,
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