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डब्ल्यूटीओ के नियम तोडऩे को तैयार भारत

शुभायन चक्रवर्ती /  July 29, 2018

भारत ने वर्ष के शुरुआती छह महीनों में आयात शुल्क में कई बार इजाफा किया। अमेरिका और चीन ने इसे संरक्षणवाद बताते हुए इसकी आलोचना भी की लेकिन इसके बावजूद भारत ने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) का कोई नियम नहीं तोड़ा था। परंतु 4 अगस्त को अमेरिका के खिलाफ नई उच्च आयात शुल्क दरें लागू होने के बाद पहली बार डब्ल्यूटीओ की बाध्य दरों की शर्त टूट जाएगी। कारोबारी विशेषज्ञ और सेंटर फॉर डब्ल्यूटीओ स्टडीज के प्रमुख अभिजीत दास के मुताबिक इसके साथ ही भारत उन देशों की सूची में शामिल हो जाएगा जिन्होंने डब्ल्यूटीओ के साथ अपनी प्रतिबद्घता तोड़ी। 

 
इसके बाद भारत आधिकारिक तौर पर संरक्षणवाद के लिए आलोचना के घेरे में आ जाएगा। डब्ल्यूटीओ की बाध्यकारी शुल्क दर, सीमा शुल्क की वह दर है जिसकी प्रतिबद्घता कोई देश तरजीही मुल्क के सिद्घांत के तहत अन्य सदस्य देशों को देता है। यह वैश्विक कारोबारी कानून डब्ल्यूटीओ के 164 सदस्य देशों पर लागू होता है।  भारत ने इस वर्ष बजट में 43 श्रेणियों की वस्तुओं के मूलभूत सीमा शुल्क में इजाफा किया था। इसमें इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं भी शामिल हैं। उसने 76 वस्त्र उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ाया और चीन तथा मलेशिया से आयातित सोलर सेल्स पर बचाव के उपाय के रूप में शुल्क बढ़ाने की घोषणा की। 
 
दास कहते हैं, 'भारत ने अब तक जो भी शुल्क वृद्घि लागू की थी वह बाध्यकारी दरों के सिद्घांत के अनुरूप थी। यह अमेरिका के उलट था जिसने स्टील और एल्युमीनियम पर शुल्क बढ़ाए और चीन और अमेरिका ने जिस तरह एक दूसरे के खिलाफ शुल्क दरों में इजाफा किया।'
 
अमेरिका और भारत कर रहे प्रयास 
 
दूसरी ओर सबसे अहम कारोबारी कदम रहा है अमेरिका से आने वाली 29 वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाना। इनमें कृषि संबंधित वस्तुएं प्रमुख हैं। भारत ने अमेरिका द्वारा स्टील और एल्युमीनियम की शुल्क दरों में इजाफे के प्रतिरोध में यह कदम उठाया। जून में घोषित इस कदम के तहत सेब और बादाम जैसी उच्च मूल्य वाली वस्तुओं का आयात शुल्क बढ़ाया गया। ऐसा करने से 24 करोड़ डॉलर मूल्य का आयात शुल्क बढ़कर दोगुना हो सकता है।  व्यापारिक विशेषज्ञों का कहना है कि डॉनल्ड ट्रंप के कदमों के बाद ऐसा होना लाजिमी था। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और व्यापारिक विशेषज्ञ विश्वजीत धर कहते हैं, 'भारत ने डब्ल्यूटीओ को बता दिया था कि वह दरें बढ़ाने की योजना बना रहा है। परंतु मौजूदा मानक किसी देश को एक देश के खिलाफ बचाव के उपाय अपनाने की इजाजत नहीं देते जबकि भारत ने ऐसा ही किया है। अमेरिका ने भी बहुपक्षीय व्यवस्था का मान नहीं रखा है लेकिन कुछ अनुचित लगने पर वह उसकी मदद ले सकता है।'
 
परंतु अन्य लोग भी सतर्क हैं। यह बढ़ोतरी बढ़ते व्यापारिक गतिरोध को और बढ़ाएगी। इससे घरेलू विनिर्माण आकर्षक होगा और सीमा शुल्क में बढ़ोतरी आयात को महंगा बना देगी।  डेलॉयट इंडिया के अप्रत्यक्ष कर साझेदार एम एस मणि के मुताबिक कृषि उत्पादों, मसलन दालों पर शुल्क 30 फीसदी से बढ़ाकर 70 फीसदी कर दिया गया। इससे रकबा बढ़ेगा और उपज भी।  भारत ने अपने कदमों को अमेरिकी प्रशासन के कदमों का प्रत्युत्तर बताया है। उसे यह भी उम्मीद है कि मामला सहमत से निपट जाएगा। 
 
एक अधिकारी के मुताबिक, 'शुल्क वृद्घि 4 अगस्त से लागू होगी और हमें उम्मीद है कि उसके पहले यह मसला हल हो जाएगा। जून में सहायक अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि मार्क लिंस्कॉट की भारत यात्रा के दौरान यह तय किया गया कि दोनों देश उन वस्तुओं की सूची बनाएंगे जिनके बारे में दोनों देशों के नेता घोषणा कर सकते हैं।' फिलहाल भारत के अधिकारियों का एक दल अमेरिका में है और वह एल्युमिनियम शुल्क दर में की गई वृद्घि से रियायत का प्रयास कर रहा है। अगर ऐसा हुआ तो भारत भी आयात शुल्क कम कर सकता है।
 
औद्योगिक दबाव की आशंका
 
वाणिज्य विभाग के एक वरिष्ठï अधिकारी के मुताबिक भारत ने व्यापारिक सुविधाओं के मामले में भी अन्य देशों से कहीं ज्यादा बढ़चढ़कर प्रयास किए हैं। डब्ल्यूटीओ की एक रिपोर्ट के मुताबिक देशों में भारत ने व्यापार को लेकर 28 सुधारों का क्रियान्वयन किया है। यह चीन के दो सुधारों की तुलना में बहुत अधिक है। परंतु उसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत ने पिछले एक साल में कई ऐसे उपाय अपनाए हैं जिन्हें व्यापक तौर पर कारोबारी दृष्टि से प्रतिबंधात्मक माना जा सकता है। लगभग इसी दौर में अमेरिका और चीन के बीच वैश्विक कारोबारी युद्ध की शुरुआत हुई। अक्टूबर 2017 से मई 2018 के बीच भारत ने टैरिफ में इजाफा किया, सीमा प्रक्रियाओं में कड़ाई की, कर और निर्यात शुल्क आदि लगाए। रिपोर्ट बताती है कि 16 मौकों पर प्रतिबंधात्मक पहल की गई। जबकि अमेरिका और चीन का आंकड़ा दो-दो का रहा।
 
कहा गया कि इनमें से अधिकांश कदम जरूरी थे क्योंकि व्यापार घाटा बढ़ रहा था। जून में यह 61 महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त इजाफा इसकी वजह थी। निकट भविष्य में होने वाला स्वर्ण आयात भी घाटे में इजाफे की वजह बन सकता है। ऐसा तब है जबकि इंजीनियरिंग और औषधि उत्पादों के निर्यात में 17.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इक्रा के प्रमुख अर्थशास्त्री अदिति नायर कहती हैं कि चालू खाते का मौजूदा घाटा 16-17 अरब डालर तक बढ़ सकता है। वित्त वर्ष 2019 की पहली तिमाही में यह जीडीपी के 2.5 फीसदी तक हो सकता है। 
 
दूसरी ओर घरेलू उद्योग जगत के विभिन्न क्षेत्रों मसलन इस्पात, वस्त्र और इलेक्ट्रॉनिक्स आदि की शिकायत है कि विदेशी वस्तुएं बाजार में बढ़ रही हैं। कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल्स इंडस्ट्रीय के चेयरमैन संजय जैन कहते हैं कि जीएसटी लागू होने के बाद आयात शुल्क में गिरावट आई थी। इससे सस्ते आयात को बढ़ावा मिला था। वर्ष 2017-18 में आयात 16 फीसदी की दर से बढ़ा। ऐसे में कई वस्त्रों आयात शुल्क का बढऩा राहत की बात है।
Keyword: india, america, WTO,,
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