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इमरान खान कैसे ले जाएंगे भविष्य की ओर पाकिस्तान?

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  July 27, 2018

वर्ष 1990 के दशक में पाकिस्तानी पत्रकारों को भारत आने की छूट थी। उस दौरान भारत की एक समाचार पत्रिका ने पाकिस्तान के सर्वाधिक सम्मानित राजनीतिक टिप्पणीकारों में से एक और बेहतरीन इंसान एम बी नकवी से इमरान खान के बारे में लिखने का आग्रह किया। दरअसल पाकिस्तान की सर्वाधिक चर्चित एवं रंगीन शख्सियतों में से एक इमरान की मंत्रमुग्ध करने वाली जिंदगी को लेकर भारतीय खासे आकर्षित थे। इमरान अपनी मां के नाम पर एक कैंसर अस्पताल बनाने में लगे हुए थे और राजनीति में भी कदम रख चुके थे। हालांकि इमरान का एजेंडा उदार और अक्सर दुविधा का शिकार नजर आता था।

 
नकवी ने पत्रिका से अविश्वास भरे लहजे में कहा, 'इमरान खान? आप इमरान खान का प्रोफाइल लिखवाना चाहते हैं? लेकिन वह तो निरा मूर्ख है।' लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है। इमरान ने अपनी छवि को पूरी तरह बदल दिया है। मौजमस्ती वाले अपने सोशलाइट अतीत को दफन करने में वह काफी हद तक सफल रहे हैं और एक ऐसे शख्स के तौर पर सामने आए हैं जो पाकिस्तान को भविष्य की ओर ले जाएगा। इमरान ने 'नया पाकिस्तान' बनाने को लेकर जो भी वादे किए हों लेकिन उन्हें चुनाव आयोग के सामने दायर उस अर्जी पर भी जवाब देना होगा जिसमें उनकी ही पार्टी के पूर्व सहयोगी अकबर एस बाबर ने गैरकानूनी तरीके से पार्टी फंड में 30 लाख डॉलर जमा करने की शिकायत की है। बाबर ने कहा है कि इमरान के दस्तखत से विदेश में पंजीकृत दो कंपनियों के जरिये यह रकम गैरकानूनी 'हुंडी' के जरिये पश्चिम एशिया से पार्टी फंड में जमा कराई गई है। लगता है कि यह रकम हवाला के जरिये 'पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ' (पीटीआई) के खाते में जमा कराई गई थी। 
 
गौर करने वाली बात यह है कि पिछले महीनों में पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान ने पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के खिलाफ न्यायपालिका की कार्यवाही में काफी तेजी दिखाई है लेकिन इमरान के खिलाफ चल रहे मामलों में वैसी सक्रियता नजर नहीं आई है। लेकिन अब यह पुरानी खबर हो चुकी है।  आज के समय में इमरान के सामने सबसे बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था के बेहतर प्रबंधन की है ताकि वह इसे दोबारा पटरी पर ला सकें। पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था की खराब हालत को दुनिया ने बहुत ही छिपाकर रखा हुआ है। पाकिस्तानी रुपये के लगातार होते अवमूल्यन और विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट के साथ ही बेलगाम होता जा रहा चालू खाता घाटा (करीब 12.5 अरब डॉलर) भी एक राष्ट्र के तौर पर पाकिस्तान के लिए बेचैनी और आत्म-सम्मान की क्षति का सबब है। हाल में ऐसी खबरें आई हैं कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर के निर्माण में लगे ठेकेदारों को दिए गए चेकों का फंड के अभाव में भुगतान नहीं हो सका। यह पाकिस्तान की खस्ता माली हालत को बयां करने के लिए काफी है। अगर यह मान लें कि अतिरिक्त बहुस्तरीय एवं द्विस्तरीय वित्तपोषण से इस आर्थिक संकट से निपटा जा सकता है तो उसके लिए भी पाकिस्तान को करीब 10 अरब डॉलर की जरूरत पड़ेगी। उसके लिए पाकिस्तान की नई सरकार के पास अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) से संपर्क साधने के अलावा कोई रास्ता नहीं रह जाएगा।
 
साफ है कि आईएमएफ से यह रकम शर्तों के साथ ही मिलेगी। पाकिस्तान का जीडीपी के बरअक्स कर राजस्व अनुपात फिलहाल 14 फीसदी है और उसकी केवल एक चौथाई आबादी ही कर दायरे में है (20.7 करोड़ की आबादी में से 5.6 करोड़ लोग ही कर चुकाते हैं)। ऐसे में कर सुधारों का लागू होना लाजिमी है। कर अनुपालन से बचने के चक्कर में पूंजी का पाकिस्तान से फौरी निकासी की आशंका दिख रही है। अगर ऐसा होता है तो निकट भविष्य में पाकिस्तान का आर्थिक संकट गहरा भी सकता है। आईएमएफ पाकिस्तान से सरकारी स्वामित्व वाली इकाइयों के पुनर्गठन एवं निजीकरण की भी मांग कर सकता है। पाकिस्तान इंटरनैशनल एयरलाइंस, पाकिस्तान स्टील मिल्स, पाकिस्तान रेलवे और स्थानीय बिजली वितरण कंपनियों के निजीकरण की बात रखी जा सकती है।
 
इमरान की सरकार में वित्त मंत्रालय का जिम्मा संभवत: असद उमर संभालेंगे। स्थानीय मीडिया के मुताबिक उमर पाकिस्तानी कॉर्पोरेट इतिहास के बेहद चर्चित मुख्य कार्याधिकारियों (सीईओ) में से एक रहे हैं। सबसे बड़ी पाकिस्तानी कंपनी एन्ग्रो कॉर्पोरेशन से सेवानिवृत्ति ले चुके उमर ने कनाडा में एक्सॉन के साथ भी काम किया है। वह सब कुछ छोड़कर पाकिस्तान लौट आए और राजनीति में हाथ आजमाने लगे। इमरान की पार्टी की ऊर्जा, औद्योगिक एवं दक्षता विकास नीतियों का खाका तैयार करने में उनकी अहम भूमिका रही है। इसके अलावा उमर ने पीटीआई की वृहद आर्थिक एवं गरीबी उन्मूलन नीतियों को भी बनाने में दो बार के सांसद जहांगीर खान तरीन के साथ मिलकर काम किया। पहले तरीन को ही वित्त मंत्रालय का सबसे तगड़ा दावेदार माना जा रहा था लेकिन लंदन की अपनी एक संपत्ति के बारे में जानकारी छिपाने के चलते उन्हें चुनाव लडऩे के अयोग्य करार दे दिया गया था।
 
उमर पाकिस्तान के आर्थिक संकट की सघनता का अहसास कराने के लिए दुनिया के सामने खुलकर अपनी बात रखने के पक्षधर हैं। वह चाहते हैं कि आईएमएफचौथे अध्याय में वर्णित प्रावधानों के मुताबिक पाकिस्तान के साथ संपर्क रखे ताकि अर्थव्यवस्था के बारे में सटीक जानकारी दुनिया के सामने रखी जाए और फिर इसे पटरी पर लाने के लिए जरूरी उपायों के बारे में बहुस्तरीय एजेंसियों से मदद ली जाए। हालांकि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और करीबी दोस्त के तौर पर उभरे चीन की उदार नजर के बीच पाकिस्तान एकदम गलत रास्ते पर जा भी नहीं सकता है। कौन कहता है कि पाकिस्तान एक लोकतंत्र नहीं है?
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