बिजनेस स्टैंडर्ड - उत्सर्जन में कटौती और उसकी लागत
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उत्सर्जन में कटौती और उसकी लागत

अरुणाभ घोष और कार्तिक गणेशन /  July 27, 2018

ताप बिजली घरों से होने वाले उत्सर्जन में कमी लाने के लिए जरूरी प्रणाली को लागू करने की लागत करीब 750 अरब रुपये तक आ सकती है। जानकारी दे रहे हैं अरुणाभ घोष और कार्तिक गणेशन 

 
ताप बिजली घरों के लिए नए उत्सर्जन मानक दिसंबर 2015 में अधिसूचित किए गए। संयंत्रों को दिसंबर 2017 तक इन मानकों का अनुपालन करना था लेकिन वे इसमें विफल रहे। बहरहाल दो वर्ष की आनाकानी के बाद बिजली संयंत्रों के पास अब एक बार फिर यह अवसर है कि वे पांच साल में इसका अनुपालन करें। यह अवधि सन 2022 में समाप्त होगी। परंतु इस क्रियान्वयन की राह एकदम अस्पष्टï है।  हवा की गुणवत्ता का मसला अब केवल मौसमी नहीं रह गया है। न ही वह अब केवल पर्यावरणविदों की चिंता का विषय है। जन स्वास्थ्य पर एक गंभीर जोखिम मंडरा रहा है। इसका स्वास्थ्य सुविधाओं पर होने वाले निजी और सरकारी दोनों तरह के खर्च पर बुरा असर पड़ेगा। देश के शहर निवेश की दृष्टिï से कम आकर्षक रह जाएंगे और दीर्घावधि की उत्पादकता प्रभावित होगी क्योंकि आम जन अस्वस्थ होंगे। 
 
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने दिसंबर 2017 में एक आदेश जारी किया था जिसमें छोटे कणों पर केंद्रित स्थिर विद्युत अवक्षेपक (ईएसपी) और फ्लू-गैस डिसल्फ्यूरिसेशन (एफजीडी) इकाइयों में सल्फर ऑक्साइड का उत्सर्जन कम करने की योजना के क्रियान्वयन का पूरा खाका है। बिजली संयंत्रों से होने वाले उत्सर्जन में वास्तविक कमी इस बात पर निर्भर करती है कि संयंत्र चलाने वाले बाद में लगने वाले पुर्जों में कितना निवेश करते हैं या नहीं, नियामक पूरी लागत का समायोजन करता है कि नहीं, इकाइयां उच्च टैरिफ चुकाती हैं नहीं और क्या इन इकाइयों के लिए बड़ी सरकारी खरीद से इस बढ़ोतरी का तेजी से समायोजन किया जा सकता है।
 
इनके क्रियान्वयन की कुल लागत करीब 750 अरब रुपये तक हो सकती है। अगर संदर्भ की बात करें तो फिलहाल विद्युत इकाइयों को परिचालन में सालाना करीब 700 अरब रुपये का नुकसान होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि या तो उपभोक्ताओं को सब्सिडी दी जाती है या फिर राजनीतिक दबाव में मुफ्त बिजली दी जाती है। इन पुर्जों को लगाने और इनके परिचालन का व्यय कोयला संचालित बिजली स्टेशनों से खरीदी जाने वाली बिजली के दाम 90 पैसे प्रति किलोवॉट घंटा तक बढ़ा सकता है। इससे मौजूदा औसत सरकारी खरीद लागत में 20 फीसदी का इजाफा होगा। अगर इकाइयां बिजली आपूर्ति की लागत वसूल कर पाने में नाकाम रहती हैं तो वे शायद ही संयंत्र में सुधार के कारणा बढ़ी हुई लागत को वसूल कर पाएं। संयंत्र चलाने वालों की चिंता यह है कि अगर इकाइयां चुकता नहीं कर सकीं तो उनका पूंजी निवेश फंस सकता है। 
 
यही वजह है कि एफजीडी में नए कलपुर्जे लगाने का काम सन 2020 से 2022 के बीच अधिसूचित है। वहीं ईएसपी के लिए 2018 से 2019 तक का समय तय किया गया है। ये संयंत्र अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करने वाले हैं। हालिया जांच से पता चला है कि क्रियान्वयन में आगे देरी हो सकती है। यह क्षेत्र पहले ही वित्तीय संकट में है और इस पैमाने पर निवेश जुटाना इसके लिए मुश्किल भरा हो सकता है।  यह भी स्पष्टï है कि अगर इन मानकों का क्रियान्वयन नहीं किया गया तो समाज की सेहत पर पडऩे वाले असर की लागत, क्रियान्वयन की लागत को पार कर जाएगी। बिजली मंत्रालय कह चुका है कि लागत को उपभोक्ताओं पर डाला जाए लेकिन फिर भी उनका निर्धारण मामला दर मामला करना होगा। 
 
एक चुनौती यह भी है कि भारत ने सभी संयंत्रों के लिए समान मानक तय करने का रुख रखा है। अमेरिका ने सन 1970 और सन 1980 के दशक में अम्लीय वर्षा से निपटने के लिए एक व्यापक व्यवस्था अपनाई जिसमें सल्फर ऑक्साइड का उत्सर्जन सीमित किया गया और उसका कारोबार किया गया।  राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों में उत्सर्जन निगरानी की कमजोर व्यवस्था के चलते भारत में ऐसी व्यवस्था लागू करने में बहुत लंबा समय लग सकता है। अगर एक बार निगरानी का समुचित तंत्र बन गया तो उत्सर्जन मानकों का विस्तार और क्रियान्वयन अन्य क्षेत्रों में भी हो सकता है। खासतौर पर औद्योगिक उत्सर्जन के मामलों में। इस बीच क्षमता की यह कमी उत्सर्जन मानकों और हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करती रहेगी। 
 
अगर पहला बेहतर रुख समस्या भरा है तो क्या हम इसे और किफायती तरीके से अंजाम दे सकते हैं? मौजूदा योजना हमें क्या बताती है? एक अवसर तो यह है कि उत्सर्जन नियंत्रण के क्रियान्वयन को बिजली संयंत्रों की बढ़ती किफायत के अनुरूप रखा जाए और भविष्य की बिजली व्यवस्था की जरूरतों को ध्यान में रखा जाए।  देश में कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों की औसत किफायत औसतन 32 फीसदी है। जबकि वैश्विक औसत 37 फीसदी का है। विकसित देशों में यह स्तर 40 फीसदी से अधिक है। 10 साल से अधिक पुराने संयंत्र कमजोर प्रदर्शन कर रहे हैं।
 
इस बीच नवीकरणीय ऊर्जा की बढ़ती हिस्सेदारी के बीच अपेक्षाकृत अधिक लचीली विद्युत व्यवस्था की आवश्यकता होगी। फिलहाल केवल एनटीपीसी के संयंत्र ही लचीलेपन की पेशकश कर रहे हैं। सन 2022 तक यह जरूरत दोगुनी हो सकती है। ऐसे में कुछ पुराने संयंत्रों का नवीनीकरण और आधुनिकीकरण किया जा सकता है ताकि उन्हें सक्षम बनाया जा सके। बदले में लागत बचाने वाली उत्सर्जन नियंत्रण व्यवस्था को नए संयंत्रों में स्थापित किया जा सकता है। ऐसा करने से लागत भी बचेगी और समय भी। 
 
बिजली संयंत्रों से होने वाले उत्सर्जन में कमी लानी ही होगी लेकिन इस प्रक्रिया में क्रियान्वयन बहुत अहम है। देश के बिजली क्षेत्र की राजनीतिक अर्थव्यवस्था की मांग है कि हम लागत बचाने वाले तरीके तलाश करें। बजाय ऐसे मानक लागू करने के जिन्हें पूरा कर पाना ही मुश्किल हो, हमें ऐसे तरीके तलाश करने होंगे कि कैसे संयंत्र को किफायती बनाने की अनुपूरक योजनाओं पर काम किया जाए। जब देश की राजधानी और पूरे देश का जन स्वास्थ्य खतरे में हो तो धैर्य से काम लेना संभव नहीं है। हमारे पास समय कम है। 
 
(गणेशन शोधार्थी हैं और घोष काउंसिल ऑन एनर्जी, एन्वॉयरनमेंट ऐंड वॉटर के सीईओ हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।) 
Keyword: power, electric, plant,,
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