बिजनेस स्टैंडर्ड - असली रक्षा घोटाला
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Monday, August 20, 2018 11:57 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

असली रक्षा घोटाला

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  July 27, 2018

कांग्रेस यह प्रयास कर रही है कि 36 राफेल विमानों के सौदे को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए बोफोर्स मामले की तरह बना दे। वह चाहती है कि जिस तरह राजीव गांधी बोफोर्स मामले के शिकार हो गए थे, उसी तरह नरेंद्र मोदी इस बार राफेल मामले में घिर जाएं। परंतु लगता नहीं है कि ऐसा हो पाएगा। इसकी वजह यह प्रश्न नहीं है कि इस मामले में रिश्वत का लेनदेन हुआ या नहीं। दरअसल इस किस्म के लगभग हर सौदे में अलग-अलग स्तरों पर रिश्वत का लेनदेन होता है। यह बात हर कोई जानता है। ऐसे मामलों में निर्णायक तथ्य जुटा पाना मुश्किल होता है। राफेल मामले में भी रिश्वत का कोई सबूत नहीं है। 

 
दोनों मामलों में एक अंतर यह है कि बोफोर्स स्कैंडल की शुरुआत एक स्वीडिश रेडियो प्रसारण से हुई थी और राजीव सरकार ने इससे निपटने में बहुत अधिक घबराहट दिखाई। यह मामला केवल भारत ही नहीं बल्कि स्वीडन में भी स्कैंडल में तब्दील हो गया और वहां भी अभियोजन की प्रक्रिया शुरू हो गई। बिना इसके और मीडिया की तहकीकात के रिश्वत की राशि और लाभ पाने वाले लोगों के नाम कभी सामने नहीं आते। फ्रांस में ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा है।  राफेल मामले में सारा हो-हल्ला भारत तक ही सीमित है। यहां यह स्थापित करने की कोशिश की जा रही है कि मोदी और उनकी सरकार ने जिस सौदे पर हस्ताक्षर किए उसमें प्रत्येक विमान के लिए उस राशि से कहीं अधिक कीमत चुकाई गई है जो पिछली कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने बातचीत में तय की थी। परंतु ऐसे जटिल हथियार सौदों के मामले में तुलना करना असंभव है। इनका विवादरहित होना भी बहुत मुश्किल है। 
 
इस बीच काफी वक्त बीत चुका है और मुद्रास्फीति भी एक पहलू है। विमानों की तादाद अलग है, अनुबंध की प्रकृति भी अलग है। पहले केवल खरीद का सौदा था जबकि अब खरीदने और बनाने की बात है। खरीद के बाद रखरखाव की शर्तें और गारंटी अलग है। अगर मान भी लिया जाए कि रिश्वत का लेनदेन हुआ तो भी उसे साबित करना बहुत मुश्किल होगा।  ऐसे में यह समझना मुश्किल है कि सरकार कीमतों को गोपनीय रखने पर क्यों तुली है? कीमतें सार्वजनिक करने में कोई हर्ज नहीं है। खासतौर पर इसलिए कि मोटे आंकड़े हमारे सामने पहले से मौजूद हैं। बात यह है कि अगर सरकार लागत के ब्योरों के बारे में पारदर्शिता बरतती तो भी इस सौदे के बारे में अधिकतर जानकारी को गोपनीय रखना होता और उचित तुलनात्मक आकलन की राह में यह बात भी आड़े आती। 
 
इस बीच एक तथ्य यह भी है कि देश में रक्षा खरीद को लेकर जो कुछ हो रहा है वह सबके सामने है। देश में 126 लड़ाकू विमानों की जरूरत सन 2001 में सामने आई थी लेकिन विमान निर्माताओं से प्रस्ताव 2007 में मंगाए गए। सन 2012 में राफेल का चयन किया गया लेकिन रिपोर्टों के अनुसार वास्तविक लागत प्रारंभिक लागत से दोगुनी हो गई। मोलभाव में दो साल और बीत गए और तब सरकार बदल गई। उसके एक साल बाद और प्रस्ताव आमंत्रित करने के आठ साल बाद मोदी ने द्विपक्षीय सौदा किया। यह सौदा मूल सात में से दो दस्तों के लिए था। बिना किसी स्पष्टïीकरण के वायु सेना के पांच अतिरिक्त दस्तों की जरूरत को दबा दिया गया। 
 
स्वाभाविक सी बात है कि वायुसेना के पास विमानों की कमी बनी हुई है। यानी पिछले चयन के एक दशक बाद उसी तरह के विमानों के लिए वही प्रक्रिया फिर शुरू होनी है। संभव है बोलीकर्ता भी वही हों। अगर देश भाग्यशाली हुआ तो पांच साल में ऑर्डर जारी होगा और उसके कुछ वर्ष बाद विमान मिलने लगेंगे। यानी करीब 2025 तक।  यह इकलौता उदाहरण नहीं है। सन 1999 में सरकार ने पारंपरिक पनडुब्बियों का ऑर्डर देने का निर्णय किया। 2012 तक छह पनडुब्बियां प्रचलन में आनी थीं और बाकी उसके बाद। अब तक यानी 2018 तक केवल एक पनडुब्बी परिचालन में है। सेना को भी बोफोर्स के बाद पहली हावित्जर तोप के लिए 30 साल प्रतीक्षा करनी पड़ी। इसमें कुछ भी गुप्त नहीं है। मीडिया में इस बारे में लेख आते रहे हैं लेकिन रक्षा खरीद प्रणाली एकदम पंगु और बदलाव में अक्षम नजर आ रही है। संसद सरकार को इस मुद्दे पर जवाबदेह क्यों नहीं ठहराती?
Keyword: defense, military, aircraft, BJP, congress,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या आरबीआई को मिलनी चाहिए थी नामित निदेशकों को हटाने की अनुमति?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.