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स्वच्छ भारत मिशन में मोर्चा फतह जंग बाकी

परमेश्वरन अय्यर /  July 26, 2018

हम स्वच्छ भारत मिशन के अंतिम वर्ष में प्रवेश करने जा रहे हैं। ऐसे में कुछ बातों की चर्चा और उन पर नजर डालने का वक्त है। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं परमेश्वरन अय्यर

 
किसी एक मोर्चे पर जीत हासिल करना हमेशा युद्घ में जीत हासिल करने की तुलना में आसान होता है। स्वच्छ भारत मिशन की बात करें तो देश को खुले में शौच से मुक्त करने की लड़ाई एकदम सही दिशा में बढ़ रही है। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता का दायरा अक्टूबर 2014 में इस मिशन की शुरुआत के वक्त के 39 प्रतिशत से बढ़कर आज 87 प्रतिशत हो गया है। खुले में शौच को समाप्त करने की दिशा में हम मोर्चा फतह करते हुए नजर आ रहे हैं लेकिन इसे स्थायी बनाए रखने की जंग अभी भी शुरुआती स्तर पर है। 
 
तय समय में पूरा किए जाने वाले अधिकांश अभियानों के साथ काफी उत्साह जुड़ा होता है लेकिन समय के साथ उनका प्रभाव भी समाप्त होता नजर आता है। बहरहाल स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण के लक्ष्य कुछ अलहदा नजर आते हैं। पहले के स्वच्छता अभियानों के विपरीत यह अपनी उपलब्धियों को लंबे समय तक कायम रखने का हिमायती है। अक्टूबर 2019 तक देश को पूरी तरह खुले में शौच से मुक्त बनाना इसका प्रमुख लक्ष्य है लेकिन इसकी एक योजना यह भी है वर्ष 2014 से 2019 के बीच लोगों के व्यवहार में जो बदलाव लाया गया है उसे आने वाले समय में बरकरार रखा जाए। 
 
खुले में शौच करने वालों की संख्या में भारी कमी आई है और अब 55 करोड़ से घटकर 15 करोड़ से भी कम रह गई है। यह अपने आप में बड़ी सफलता है लेकिन अंतिम लक्ष्य तब पूरा होगा जब खुले में शौच को लेकर ग्रामीण भारत के रुख को स्थायी रूप से बदला जा सके।  मिशन ने बहुत तेज गति से प्रगति की है। करीब 4 लाख गांव और 400 जिलों को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया जा चुका है। 13 राज्यों और 5 केंद्र शासित प्रदेशों ने भी खुले में शौच से मुक्त का दर्जा हासिल कर लिया है। हाल ही में आई राष्ट्रीय सालाना ग्रामीण स्वच्छता सर्वेक्षण (एनएआरएसएस) की रिपोर्ट इस बात की पुष्टिï करती है कि स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण यह सुनिश्चित करने में कामयाब रहा है कि कम से कम हर घर में शौचालय हो और लोग उसका इस्तेमाल करें। शौचालयों का इस्तेमाल 93.40 फीसदी तक बढ़ गया है।  एनएआरएसएस विश्व बैंक की एक परियोजना से संबंधित है। सर्वेक्षण में इस बात की भी दोबारा पुष्टिï की गई है कि खुले में शौच मुक्त गांवों में से 95.6 फीसदी का दर्जा बरकरार है।
 
खुले में शौच मुक्ति के अभियान को ध्यान में रखते हुए अब इस कार्यक्रम में पूरा जोर इस अभियान को स्थायित्व प्रदान करना है। खुले में शौच मुक्ति के स्थायित्व को अब अपने आप में एक उप मिशन का रूप दे दिया गया है। पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय ने हाल ही में राज्यों को इस संबंध में दिशानिर्देश जारी किए हैं। इन दिशानिर्देश की मदद से निरंतर ऐसी पहल की जा सकती हैं जो उन गांवों में व्यवहारगत बदलाव के लिए काम कर सकती हैं जिन्हें खुले में शौच से मुक्त घोषित किया जा चुका है। इन दिशानिर्देश में कहा गया है कि राज्यों को खुले में शौच से मुक्त घोषित करने के बाद उन्हें स्थायित्व प्रदान करने की योजना बनाने के दौरान कई उपायों को ध्यान में रखने की बात कही गई है। इनमें मानव संसाधन को बरकरार रखने, क्षमता निर्माण की गतिविधियों से लेकर सहभागिता बढ़ाने की नीति अपनाने तथा स्थायित्व के लिए निजी निवेश जुटाने जैसी बातें शामिल हैं।
 
कुछ राज्यों ने अपने स्तर पर उपयोजनाएं प्रस्तुत की हैं ताकि खुले में शौच मुक्ति को स्थायित्व प्रदान किया जा सके। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र को हाल ही में खुले में शौच से मुक्त प्रदेश घोषित किया गया है। राज्य ने संत गाडगे बाबा स्वच्छता अभियान नामक पुरस्कार योजना की शुरुआत की है। इसका सीधा संबंध शौचालयों के निरंतर प्रयोग से है। इसमें खुले में शौच की निगरानी, स्वच्छता को लेकर आम घरों की सहभागिता में वृद्घि और व्यक्तिगत साफ-सफाई की स्थिति में सुधार आदि शामिल हैं। 
 
खुले में शौच मुक्ति को स्थायित्व देने का एक अहम पहलू यह सुनिश्चित करना भी है कि शौचालय अच्छी गुणवत्ता और डिजाइन के हों। राज्यों को शौचालय निर्माण में गुणवत्ता और बेहतर डिजाइन अपनाने की सलाह के साथ-साथ स्वच्छाग्रहियों की मदद से लोगों के व्यवहार में बदलाव को लेकर निरंतर अभियान चालने की बात भी कही गई है। गुणवत्ता की निगरानी के लिए भी अधिक सीधी प्रक्रिया अपनाई गई। पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के अधिकारियों और सलाहकारों की टीम महीने में कम से कम दोबार जमीनी दौरे करती है ताकि गुणवत्ता और व्यवहारगत बदलाव का आकलन किया जा सके। 28 महीने तक पद पर रहने के दौरान मैंने भी विभिन्न राज्यों में 110 यात्राएं कीं।
 
पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश ने कुछ वर्ष पहले अपने दम पर स्वच्छता क्रांति की और पूरे देश को खुले में शौच मुक्त घोषित किया गया। बहरहाल, आज बांग्लादेश के सामने इसे स्थायी रखने की भारी चुनौती है। एकल पिट वाले कई शौचालय नाकाम हो चुके हैं। यह हमारे लिए भी एक बड़ा सबक है। हमारे यहां देश के अधिकांश हिस्सों में स्वच्छ भारत मिशन में दो पिट वाली शौचालय तकनीक अपनाई जा रही है। फिर भी बांग्लादेश का सबक हमें याद दिलाता है कि निर्माण की गुणवत्ता की निरंतर निगरानी करनी आवश्यक है।
 
उससे भी अहम बात यह है कि लोगों के व्यवहार में आने वाले बदलाव और शौचालय इस्तेमाल करने की हालिया विकसित आदत को स्थायी बनाए रखा जाए। पुराने व्यवहार का दोहराव न हो यह सुनिश्चित करने के लिए हमें निरंतर प्रयास करने होंगे। स्थानीय समुदायों और सरकारों को व्यवहार में स्थायी बदलाव को प्रोत्साहित करने वाले कदम उठाने होंगे।  इस वर्ष 2 अक्टूबर को स्वच्छ भारत मिशन की चौथी वर्षगांठ होगी। इस अवसर पर देश में स्वच्छता को लेकर नीतिगत स्तर का एक बड़ा आयोजन होने वाला है। दुनिया के करीब 80 देशों के स्वच्छता मामलों के मंत्री, वैश्विक स्वच्छता विशेषज्ञ, बहुपक्षीय और द्विपक्षीय एजेंसियों के शीर्ष प्रतिनिधि, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परोपकारी तथा स्वच्छता कार्यकर्ता इस अवसर पर दिल्ली में आयोजित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय स्वच्छता सम्मेलन में हिस्सा लेंगे।  सम्मेलन में स्वच्छ भारत अभियान-ग्रामीण को लेकर भारत का अनुभव साझा किया जाएगा। इसके अलावा हमें अन्य देशों के अनुभवों से भी सीखने को मिलेगा। हम स्वच्छ भारत मिशन के अंतिम वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। ऐसे में यह अहम है। 
 
(लेखक केंद्रीय पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय में सचिव हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)
Keyword: clean india, swatch bharat abhiyan, स्वच्छ भारत मिशन,
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