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सरकार नई, नीति वही

संपादकीय /  July 26, 2018

पाकिस्तान की नैशनल असेंबली के चुनाव में सब कुछ उम्मीद के मुताबिक हुआ। यानी हिंसा, धोखाधड़ी का आरोप और इमरान खान की तहरीक ए इंसाफ (पीटीआई) का सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना। खान का प्रधानमंत्री बनना तय है। पाकिस्तान के 70 वर्ष के इतिहास में यह दूसरा मौका है जब देश में शांतिपूर्ण और असैन्य तरीके से सत्ता का हस्तांतरण हुआ है। खान अपने देश की राजनीति में 20 वर्ष से अधिक वक्त से सक्रिय हैं लेकिन शुरुआती 15 वर्ष तक तो वह हाशिये पर ही रहे। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उनकी भ्रष्टïाचार विरोधी और उदार इस्लाम की राजनीति उनकी सुर्खियों में बनी रहने वाली निजी जिंदगी से मेल नहीं खाती थी। वर्ष 2011 में हालात बदले। लाहौर में उनके कार्यक्रम में आई भीड़ ने उनके विरोधियों को चौंका दिया। एक लोकप्रिय खिलाड़ी और पठान, पहचान और विरासत की राजनीति से मुक्त उनकी छवि ने उनके पक्ष में काम किया। वह देश के दो अन्य परिवारवादी दलों के सामने एकदम अलग नजर आए। एक बड़ा मोड़ 2013 में आया जब चुनाव में कमजोर प्रदर्शन के बाद उदारवाद कम होने लगा और दुनिया भर की खुफिया एजेंसियों ने तत्काल पाकिस्तान सैन्य और खुफिया तंत्र के साथ उनकी करीबी पर ध्यान दिया। 

 
प्रधानमंत्री बनते ही खान के सामने पहली चुनौती होगी पाकिस्तान को सामाजिक और आर्थिक स्थिरता प्रदान करना। वित्त वर्ष 2018 में देश की अर्थव्यवस्था बमुश्किल एक फीसदी विकसित हुई। उसका चालू खाते का घाटा उसके जीडीपी के 5.7 फीसदी के बराबर है। निर्यात में नाम मात्र का इजाफा हुआ है और पाकिस्तानी रुपये के मूल्य में 18 फीसदी की गिरावट आई है। ऐसे में इस घाटे की भरपाई होना मुश्किल है। इस बीच पिछले पांच वर्ष में विदेशी कर्ज 76 फीसदी बढ़कर 92 अरब डॉलर हो चुका है जो जीडीपी के 30 फीसदी के बराबर है। यह स्थिति तब है जबकि देश चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के निर्माण के ऋण का पुनर्भुगतान करने के लिए संघर्ष कर रहा है। माना जा रहा था कि इस गलियारे के बनने के बाद पाकिस्तान की आर्थिक तस्वीर बदल जाएगी। तमाम संकेतक इस बात की ओर इशारा करते हैं कि पाकिस्तान सन 1980 के दशक के बाद से 13वीं बार बेल आउट के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की शरण में जाएगा। यह स्पष्टï नहीं है कि खान इन बातों से परिचित हैं या नहीं। जिन पत्रकारों ने आर्थिक पहलुओं को लेकर उन पर सवाल उठाए थे उनके मुताबिक वह विस्तृत ब्योरों में काम नहीं करते। उनकी पार्टी का एजेंडा पश्चिमी शैली के लोककल्याण का है जिसका बोझ अर्थव्यवस्था फिलहाल नहीं उठा सकती। 
 
एक प्रश्न यह है कि क्या भारत को यह उम्मीद करनी चाहिए कि खान के प्रधानमंत्री बनने के बाद रिश्तों में कुछ बदलाव आएगा? यह सच है कि खान के ऑक्सफर्ड और क्रिकेट के दिनों से भारत में उनके कई मित्र हैं लेकिन यह मानना ठीक नहीं होगा कि उनके प्रधानमंत्री बनने से भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में कोई बड़ा बदलाव आएगा।  बीते पांच साल में उनकी रूढि़वादिता बढ़ी है। उनके वक्तव्यों में पैगंबर की प्रधानता मुखर हुई है और ईशनिंदा कानून को समर्थन बताता है कि वह सेना और आईएसआई की भारत विरोधी और जिहाद समर्थक सोच पर चलेंगे, भले ही इस बीच देश अमेरिका से हटकर चीन पर निर्भर हो रहा हो। इस उम्मीद की कोई बड़ी वजह नहीं कि दोनों देशों के रिश्ते सुधरेंगे। खान का चुनाव भारत के प्रति पाकिस्तानी नीति में कोई बदलाव नहीं लाएगा। वह सेना से ही संचालित रहेगी। भारत के लिए बेहतर होगा कि वह पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री के साथ रिश्तों को लेकर खुलापन रखे।
Keyword: pakistan, election, Imran Khan, पाकिस्तान आम चुनाव,
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