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कर्ज फंसने की असल वजह कुछ और ही

देवाशिष बसु /  July 25, 2018

बैंकों का कर्ज नहीं चुकाए जाने के वास्तविक कारण को लेकर जानबूझकर अनदेखी बरती जा रही है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं देवाशिष बसु

 
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में एक सरकारी बैंक से जुड़ा मामला दायर किया है। बैंक ने एक जमीन के बदले ऋण दिया था। कर्जदार को अल्पावधि का ऋण चाहिए था। उसे आने वाले विदेशी निवेश से आशा थी। उसे लगा था कि निवेश आने के बाद वह ऋण चुका देगा। बैंकरों को छोटे और मझोले कारोबारियों से ऐसे किस्से अक्सर सुनने को मिलते रहते हैं। ये धोखेबाज भी हो सकते हैं और सपने देखने वाले भी। बैंकरों से यही कामना होती है कि वे ऐसी कहानियों की अनदेखी करें और किसी भी तरह के ऋण के आवेदन पर विचार करते समय जोखिम का भलीभांति आकलन करें। 
 
इस मामले में बैंकर ने क्या किया? उसने ऋण दिया लेकिन जमीन की सही तरीके से जांच नहीं की। जैसी कि आशंका थी तीन महीने बाद जब भुगतान बकाया था तो कर्जदार डिफॉल्ट कर गया। बैंक ने जमीन को बेचकर पैसा वसूल करना चाहा लेकिन तब उसे पता चला कि वह जमीन विवादित थी। बैंकर और कर्जदार दोनों मिले हुए थे और उन्होंने योजनाबद्ध ढंग से इस काम को अंजाम दिया था। सीबीआई ने कर्जदार के खिलाफ मामला दर्ज किया लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि जो बैंकर अनदेखी करने और ठीक से जांच नहीं करने का दोषी था उसे आरोपित नहीं बनाया गया।
 
जब मुझे यह पता चला तो मैं काफी नाराज हुआ लेकिन मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। मुझे अचरज तो उन लोगों की अनदेखी पर होता है जो फंसे हुए कर्ज के संकट से निपटने और उसके प्रबंधन के काम में लगे हुए हैं। वे यह नहीं देख पा रहे हैं कि फंसे हुए कर्ज की बहुत बड़ी वजह तो एकदम उनकी नजरों के सामने है। वह है बैंक अधिकारियों द्वारा ऋण मंजूर करते समय किया जाने वाला भ्रष्टाचार। इसके बावजूद बैंक अधिकारियों को जवाबदेह बनाने के लिए कुछ नहीं किया गया। निश्चित तौर पर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और वित्त मंत्रालय के अधिकारियों, बैंकों की सतर्कता टीमों, केंद्रीय सतर्कता आयोग और बैंक चेयरमैनों आदि सभी ने फंसे हुए कर्ज की समस्या के लिए दो बाहरी कारकों को जवाबदेह ठहराया। पहला कारोबारी विफलताएं और दूसरा कमजोर दिवालिया कानून। जबकि हकीकत यह है कि बैंकों के पैसे की इस लूट के लिए अक्सर बैंकर जवाबदेह होते हैं।
 
आरबीआई के पूर्व गवर्नर डॉ. रघुराम राजन ने सन 2016 में सरकारी बैंकों के बारे में बोलते हुए फंसे हुए कर्ज के बारे में कहा था कि इस फंसे हुए कर्ज का काफी हिस्सा वर्ष 2007-08 में तैयार हुआ था। वह आर्थिक उछाल का दौर था। उन्होंने कहा कि ऐसे मौकों पर बैंक गलतियां कर बैठते हैं। यह भी सच है कि कई बार बैंक अपने प्रवर्तक के निवेश बैंक द्वारा तैयार परियोजना रिपोर्ट के आधार पर कर्ज दे देते हैं और अपने स्तर पर छानबीन नहीं करते। उन्होंने कहा कि एक प्रवर्तक ने उन्हें बताया था कि कैसे उस वक्त बैंक चेकबुक लहराते हुए उनसे पूछते थे कि उन्हें कितना पैसा चाहिए?
 
राजन ने प्रचुर प्रमाणों के साथ यह बात सामने रखी कि खरबों रुपये के ऐसे कर्ज के मामलों में सरकार और बैंकरों की बहुत अधिक भूमिका नहीं होती। भ्रष्टाचार और मिलीभगत वास्तविक वजह होती है। सरकारी बैंकों के कर्मचारी भी सरकारी कर्मचारी होते हैं जिनके पास ऋण देने के लिए कोई खास प्रोत्साहन नहीं होता। व्यावहारिक तौर पर देखें तो वे संदिग्ध नजर आने वाले प्रस्तावों को नकारने के लिए सबसे बेहतर स्थिति में रहते हैं। ऐसे में आखिर ऐसा क्यों हुआ कि बैंक अधिकारी चेकबुक लेकर प्रवर्तकों के पीछे-पीछे घूमते रहे? अगर हम देखना चाहें तो इसका सीधा जवाब है बैंकरों और कारोबारियों के बीच का गठजोड़। इससे भी बुरी बात यह हुई कि राजन ने सार्वजनिक रूप से उनका बचाव किया और कहा कि बैंकरों के सर पर हमेशा सतर्कता जांच की तलवार लटकती रहती है इसलिए वे निर्णय लेने में असमर्थ रहते हैं। उन्होंने इस बात की अनदेखी कर दी कि बैंकों की सरासर गलती निकलने पर भी कुछ ही बैंक अधिकारियों को इसकी कीमत चुकानी पड़ी है। सरकारी बैंक इसके गवाह हैं।
 
भारी भरकम फंसे हुए कर्ज का दूसरा बचाव कमजोर दिवालिया कानूनों के रूप में सामने आता है। यह अपने आप में पर्याप्त हास्यास्पद बात है। बीते तीन दशकों के दौरान नीति निर्माताओं ने फंसे हुए कर्ज से निपटने के अनेक उपाय किए होंगे, इसके बावजूद यह बचाव सामने रखा जाता है। भारतीय स्टेट बैंक की पूर्व चेयरपर्सन अरुंधती भट्टाचार्य ने कहा था कि हमें नियामकीय व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता है।  उन्होंने यह भी कहा था कि हमें देनदारी चूकने वालों के खिलाफ कड़े कानूनों और एक समुचित दिवालिया कानून की आवश्यकता है ताकि फंसे हुए कर्ज का सही तरीके से निस्तारण किया जा सके। परंतु दिवालिया कानून तो तब प्रभावी होता है जब कर्ज फंसे हुए कर्ज में बदल चुका हो। उसके पहले इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। अगर भ्रष्ट बैंकर बच निकलते हैं तो दिवालिया कानून का औचित्य ही क्या रह जाएगा? 
 
निश्चित तौर पर नया ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया कानून (आईबीसी) हमें यह बताने में कामयाब रहा है कि भ्रष्ट बैंकिंग की जड़ें कितनी गहरी और व्यापक हैं। सरकारी बैंकों की ऋण प्रक्रिया के बारे में जानकारी रखने वाला कोई भी व्यक्ति यह जानता होगा कि अगर आपको वास्तव में ऋण चाहिए तो बैंकर ऐसी शर्तें थोपेगा जो आपको माननी ही होंगी। इसमें कुछ महंगी बीमा योजनाएं खरीदने की शर्त भी शामिल है। इसके बावजूद आलोक इंडस्ट्रीज, भूषण स्टील, भूषण पॉवर, मोनेट इस्पात आदि के मामले में बैंक 70 से 90 फीसदी तक के कर्ज के बरअक्स जमानत नहीं रख सके। इस विषय पर व्यापक चर्चा करने के बजाय हम खुश हैं कि आईबीसी हमारे अतीत के पाप धोने का काम कर रहा है। जबकि इस प्रक्रिया से 20 फीसदी से भी कम राशि वापस मिल रही है। हकीकत तो यह है कि आईबीसी ने दिखाया है कि सरकारी बैंक बिना किसी को जवाबदेह बनाए अरबों रुपये की राशि बट्टे खाते में डाल सकते हैं। जिन लोगों ने बैंकों को लूटा, न तो उन पर दबाव बनाया जा रहा है, न ही वे कुछ चुकता कर रहे हैं। यह जानबूझकर आंखें मूंदने का दिलचस्प और असाधारण उदाहरण है।
Keyword: bank, loan, debt, RBI, NPA, CBI,
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