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कागजी वादा!

संपादकीय /  July 25, 2018

सरकार द्वारा खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में 'ऐतिहासिक' वृद्घि कर उसे चुकता उत्पादन लागत से 50 प्रतिशत ऊंचा करने की घोषणा के तीन सप्ताह बाद भी नई कीमतें कागजों पर ही हैं। उनके प्रवर्तन की दिशा में पेशकदमी अभी बाकी है। सरकार ने साफ तौर पर इसे किसान हितैषी कदम कहा है लेकिन बाजार ने इसे लेकर ठंडी प्रतिक्रिया दी क्योंकि कीमतों में किसी तरह की हलचल नजर नहीं आई। आमतौर पर एमएसपी में इजाफे के बाद जो मुद्रास्फीतिक रुझान नजर आता था वह इस बार नदारद है। प्रमुख कृषि मंडियों से आए आंकड़ों से संकेत मिलता है कि जिन 14 जिंसों की कीमत बढ़ाई गई उनमें से 12 अभी भी एमएसपी से काफी निचले स्तर पर कारोबार कर रही हैं। यह गिरावट आधिकारिक एमएसपी से 30 फीसदी तक है। कुछ जिंस मसलन खरीफ की तीन प्रमुख दालें उड़द, तुअर और मूंग की कीमतें अपने-अपने एमएसपी से 34 से 42 फीसदी तक नीचे हैं। केवल कपास और तिल ही दो ऐसी जिंस हैं जिनकी कीमत नए समर्थन मूल्य से ऊपर है। अगर इसे संकेत माना जाए तो फसल कटाई के बाद के सत्र में जब नई उपज मंडियों में आएगी तो कीमतों में और अधिक गिरावट आ सकती है। किसानों को इससे और अधिक नुकसान होगा। 

 
नए एमएसपी की कीमतों को प्रभावी बनाने के लिए इसके साथ-साथ उन योजनाओं की घोषणा करनी चाहिए थी जिनकी मदद से यह कीमत किसानों तक पहुंच सके। इसमें दो राय नहीं कि सरकार काफी लंबे समय से नीति आयोग के साथ इस बात पर विमर्श कर रही थी कि कैसे एमएसपी आपूर्ति की व्यवस्था को बेहतर बनाया जाए। परंतु अभी भी ऐसा कोई संकेत नहीं है कि ऐसी व्यवस्था कब लागू होगी। हरित क्रांति के बाद से ही सरकार समर्थित खुली खरीद की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। यह अधिकांश उपजों के किसानों तक पहुंचने में नाकाम है। केवल चावल, गेहूं, कपास और एक हद तक दलहन की खेती करने वालों को इसका लाभ मिल पा रहा है। यह लाभ भी केवल चुनिंदा राज्यों में मिल रहा है जहां यह व्यवस्था कारगर है। इसे एमएसपी निर्धारण वाली तमाम अन्य फसलों तक विस्तारित करना और देश के सभी हिस्सों में लागू करना अव्यावहारिक है क्योंकि जरूरी बुनियादी ढांचा मौजूद नहीं है। अगर सरकार इसका अतिरिक्त आर्थिक बोझ वहन करने को तैयार भी हो जाए तो भी इसमें समस्या आनी तय है। इस व्यवस्था की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसमें अनाज का भारी भंडार एकत्रित हो जाता है जिसे बाद में बेचना मुश्किल हो जाता है। इतना ही नहीं इस बार सरकार ने कीमतों में जो इजाफा किया है वह जाहिर तौर पर राज्यों के अहम विधानसभा चुनाव और 2019 के आरंभ में होने वाले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर उठाया गया है। अवांछित स्टॉक को निपटाने के लिए सरकार निर्यात पर रोक लगा सकती है। 
 
ऐसे में यह बात स्पष्ट है कि अगर किसानों की आय बढ़ाने के लिए उन्हें फसल की अच्छी कीमत दिलवानी है तो उसके लिए कोई ऐसी प्रणाली विकसित करनी होगी कि बाजार में भौतिक हस्तक्षेप नहीं किया जाए। ऐसी व्यवस्था के जो मॉडल फिलहाल उपलब्ध हैं उनमें से एक है मध्य प्रदेश तथा कुछ अन्य राज्यों में अपनाई जा रही भावांतर भुगतान योजना और दूसरी तेलंगाना की तरह किसानों को प्रत्यक्ष नकद समर्थन। यह बात सच है कि इन दोनों योजनाओं में से भी कोई खामी रहित नहीं है लेकिन मध्य प्रदेश के मॉडल को अगर बेहतर बनाया जाए तो वह एक ऐसी किसान समर्थक मूल्य समर्थन योजना के रूप में सामने आ सकता है जो बाजार में हस्तक्षेप किए बिना समस्या को हल कर सकती है।
Keyword: agri, farmer, crop, MSP, एमएसपी,
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