बिजनेस स्टैंडर्ड - वैज्ञानिक सोच और राजनीतिक बहस
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वैज्ञानिक सोच और राजनीतिक बहस

नितिन देसाई /  July 24, 2018

समाज में वैज्ञानिक सोच-समझ पैदा करना अत्यंत आवश्यक है। तभी हम अपना मनचाहा भविष्य निर्मित कर पाएंगे। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं नितिन देसाई

 
हजारों वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों और छात्रों ने अगस्त 2017 और अप्रैल 2018 में देश भर में विज्ञान मार्च का आयोजन किया। एक वैश्विक आंदोलन से प्रभावित ये प्रदर्शन हमारी राजनीतिक बहस में विज्ञान की घटती प्रतिष्ठा के विरोध का जरिया भी थे। इस वर्ष प्रदर्शन का आयोजन 14 अप्रैल को किया गया। उस दिन बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की जयंती भी होती है। ये कदम उचित हैं क्योंकि वैज्ञानिक चेतना के प्रसार से समाज में हिंसा और दमन का कारण बनने वाले गलत विश्वासों का प्रतिरोध करने में मदद मिलेगी।
 
राजनीतिक वर्ग के लोगों द्वारा गलत बातों को स्वर देने के कई उदाहरण हमारे आसपास मौजूद हैं। हम एक डिजिटल क्रांति के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रहे हैं। फिर भी हमारे एक नेता का कहना है कि महाभारत काल में भी इंटरनेट और उपग्रह आधारित संचार मौजूद था। उनके मुताबिक अगर ऐसा नहीं होता तो संजय कैसे धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र का पूरा ब्योरा दे पाते? यानी इंटरनेट भी था और उपग्रह तकनीक भी मौजूद थी। हमें चिकित्सा शोध की अत्यंत आवश्यकता है लेकिन सत्ताधारी दल के कुछ नेताओं का मानना है कि गाय का गोबर और गोमूत्र कैंसर तक ठीक कर सकते हैं। कोई कहता है कि गाय ऑक्सीजन छोड़ती है तो एक और नेता कहता है कि कर्ण का जन्म मां के गर्भ से नहीं हुआ, यानी उस वक्त भी जीन विज्ञान मौजूद था। एक बयान यह भी है कि हम भगवान गणेश की पूजा करते हैं। जरूर उस वक्त भी कोई प्लास्टिक सर्जन होगा जिसने मनुष्य के शरीर पर हाथी का सर लगाकर प्लास्टिक सर्जरी की शुरुआत की होगी।
 
हमारा देश एक महत्त्वाकांक्षी परमाणु कार्यक्रम के साथ आगे बढ़ रहा है और एक राजनेता हमें बताते हैं कि महर्षि कणाद ने प्राचीन काल में ही परमाणु परीक्षण किया था। उनके अनुसार हजारों वर्ष पुराने एक ऋषि की मान्यता थी कि परमाणु को नष्ट नहीं किया जा सकता। विज्ञान के मूलभूत सिद्धांतों के बारे में भी हमारे नेताओं के विचार ऐसे ही दिलचस्प हैं। मिसाल के तौर पर, 'डार्विन का सिद्धांत गलत था क्योंकि किसी ने बंदर को मनुष्य में बदलते नहीं देखा। यह भी सुनने को मिला कि ज्योतिषशास्त्र सबसे बड़ा विज्ञान है, बल्कि वह विज्ञान से भी ऊंचा है।'
 
ऐसा भी नहीं है कि ऐसे बयान यदाकदा दिए जाते हों। वैज्ञानिकों ने प्रधानमंत्री को जो ज्ञापन भेजा है उसमें आरोप लगाया गया है कि बिना किसी परीक्षण के अवैज्ञानिक विचारों को स्कूली किताबों और पाठ्यक्रम में शामिल किया जा रहा है। ऐसा एक उदाहरण एक स्कूली किताब में देखने को मिलता है जिसमें कहा गया  है, 'भारतीय ऋषि अपनी योग विद्या का इस्तेमाल करके दिव्यदृष्टि प्राप्त करते थे। इसमें दो राय नहीं है कि टेलीविजन का आविष्कार इसी से जुड़ा हुआ है।' यहां तक कि विज्ञान से जुड़ी बैठकों में भी समस्याएं सामने आईं। सन 2015 की भारतीय विज्ञान कांग्रेस में प्रस्तुत एक पर्चे में दलील दी गई कि वैदिक काल में वैमानिकी के बारे में आधुनिक वैज्ञानिकों से अधिक ज्ञान था और उस वक्त भी विमान बनाए जाते थे जिनका इस्तेमाल अंतरग्रहीय यात्राओं में होता था। उनका आकार बहुत बड़ा था और उन्हें दाएं, बाएं और यहां तक कि पीछे भी उड़ाया जा सकता था जबकि आधुनिक विमान केवल आगे की ओर उड़ते हैं। 
 
अतीत गौरव बुरी बात नहीं है। अतीत में हम कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर चुके हैं। आर्यभट्टï, ब्रह्मïगुप्ता और भास्कर, सुश्रुत और चरक इसके उदाहरण हैं। मिस्र, मेसोपोटेमिया और ग्रीस के साथ प्राचीन संपर्क तथा मध्य काल में अरब विद्वानों के साथ जुड़ाव ने हमें और उन्हें दोनों को समृद्घ किया।  परंतु मौजूदा राजनीतिक बहस इन उपलब्धियों पर बात करने के बजाय ऐसे दावों पर बात करती है जो संभवत: मिथक हैं। यहां भ्रम की स्थिति बनती है। अगस्त 2017 में कई वैज्ञानिकों ने अपनी अपील में कहा था, 'हम प्राचीन भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की महान उपलब्धियों से प्रेरित हो सकते हैं लेकिन हम देख रहे हैं कि उच्च पदस्थ लोगों द्वारा अप्रमाणित और अवैज्ञानिक विचारों को प्रश्रय दिया जा रहा है जो विवादों को जन्म दे रहा है।'
 
अतीत को यूं अश्लील तरीके से प्रस्तुत करना न केवल विज्ञान को क्षति है बल्कि हमारे इतिहास पर भी हमला है। उससे भी बुरी बात यह है कि भीड़ के मन में पूर्वग्रह भरने और हत्याओं को वैधता प्रदान करता है। यह हमारे वेदों और समृद्घ विरासत को भी खराब कर रहा है। प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय समाज दर्शन, धर्म आदि को लेकर अत्यंत सहिष्णु था। चार्वाक की भौतिकवादी परंपरा इसका हिस्सा रही है। उसे लोकायत के नाम से भी जाना जाता है और वह जनमानस में काफी लोकप्रिय रही है। 14वीं सदी में माधवाचार्य ने सर्व दर्शन संग्रह की रचना की। यह रचना स्पष्टï बताती है कि वह तार्किकता और अनुभवजन्य रुख के साथ आधुनिक विज्ञान के कितनी करीब है। 
 
ज्ञान का अग्रिम मोर्चा भविष्य के हाथों में है जो अज्ञात है, न कि अतीत में। हमें भविष्य के उसी मोर्चे पर पहुंचना है। परंतु हमारी इस तलाश को विश्वसनीय बनाने के लिए राजनेताओं को विज्ञान के बारे में गलत बातें करना बंद करना होगा। उससे भी अहम बात यह है कि हमें कुछ बातों की पहचान करनी होगी: 
 
ज्ञान आधारित समाज में वैज्ञानिक सोच और तार्किक मूल्य का होना जरूरी है। उसे विज्ञान पर विश्वास होना चाहिए और हर विश्वास का एक ठोस प्रमाण होना चाहिए। अंधविश्वास और नीम हकीमी हो सकते हैं लेकिन उसे लोगों का विचलित व्यवहार ही माना जाना चाहिए। 
 
ज्ञान आधारित समाज को नि:शुल्क जांच को बढ़ावा देना चाहिए और असहमति को लेकर सहिष्णु होना चाहिए। दुनिया को देखने का उसका नजरिया शंकालु होना चाहिए। उसे बौद्घिकों को लेकर खासतौर पर सहिष्णु होना चाहिए। वे अगर गलत भी हों तो भी वे हमारे ज्ञान को बढ़ाने में मददगार साबित होते हैं। 
 
ज्ञान आधारित समाज में दुनिया को लेकर जिज्ञासा होनी चाहिए। सहिष्णुता केवल इस बात पर केंद्रित नहीं होनी चाहिए कि सच हमारे अलावा कहीं और भी हो सकता है बल्कि इसका संबंध विचारों और आस्थाओं के अनछुए पहलुओं से भी होना चाहिए। 
 
ज्ञान आधारित समाज में इस बात के लिए समय और संसाधन होने चाहिए कि ताकि नए विचारों का पीछा किया जा सके। 
 
ज्ञान आधारित समाज को ज्ञान की साझेदारी में यकीन करना चाहिए जहां अन्य लोग भी उसी राह पर आगे बढ़ रहे हों। 
 
समाज में इस वैज्ञानिक सोच की स्थापना जरूरी है। उसी के आधार पर हम ऐसा भविष्य बना पाएंगे जैसा हम चाहते हैं। उसी के दम पर हम व्यापक प्रसार कर चुकी सामाजिक हिंसा का भी मुकाबला कर सकेंगे।
Keyword: education, digital, science,,
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