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गायब रेल इंजनों का दिलचस्प किस्सा

विवेक देवरॉय /  July 23, 2018

पटियाला स्टेट मोनोरेल ट्रेनवेज (पीएसएमटी) के बारे में हमें जो भी जानकारी है उसका काफी हिस्सा चार्ल्स विलियम बॉवेल्स (1878-1966) की देन है। उस वक्त पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह थे। उन शुरुआती वर्षों में और 20वीं सदी के अधिकांश वक्त के दौरान मोनोरेल में रुचि जरूर दिखाई गई लेकिन योजना कभी गति नहीं पकड़ सकी। पारंपरिक मोनोरेल व्यवस्था में ट्रेन एक पटरी पर संतुलन साधकर चलती है। डब्ल्यू.जे. इविंग ने इविंग सिस्टम नामक प्रणाली विकसित की। इसमें एक एकल दोहरे उभार वाले पहिये के अलावा एक छोटा पहिया होता था जो संतुलन कायम करने का काम करता था।

मोनोरेल एक सडक़ के साथ-साथ चलती थी और यह छोटा पहिया सडक़ पर स्थित रहता था। दिलचस्प है कि इस व्यवस्था के इस्तेमाल के दो ही आधिकारिक उदाहरण मिलते हैं और दोनों का ताल्लुक भारत से है। पीएसएमटी के अलावा मन्नार के निकट कुंडाला घाटी में एक पौधरोपण कंपनी ने सन 1902 से 1908 तक इविंग सिस्टम का इस्तेमाल किया। बहरहाल पीएसएमटी के उलट कुंडाला घाटी रेलवे कभी जानवरों द्वारा खींचने से आगे नहीं बढ़ पाई। यहां भाप इंजन का प्रयोग नहीं हुआ। पीएसएमटी ने शुरू में इंजन के बजाय खच्चरों का इस्तेमाल किया। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि पटियाला राज्य की सेना में बहुत बड़ी तादाद में खच्चर थे जिनका इस्तेमाल आसानी से किया जा सकता था। इन खच्चरों को रखना पड़ता था क्योंकि ब्रिटिश सेना को उनकी जरूरत पड़ सकती थी। अलग-अलग जगह इन खच्चरों का आंकड़ा अलग-अलग मिल सकता है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि क्या कभी-कभी इन खच्चरों की मदद में बैल भी लगाए जाते थे? सन 1909 तक चार भाप इंजन आए। इन्हें ओरेंस्टाइन ऐंड कॉपेल (बर्लिन) की ओर से मंगाया गया था। 


चार्ल्स लियम बॉवेल्स एक सिविल और मैकेनिकल इंजीनियर थे। जानकारी के मुताबिक उनका जन्म सन 1878 में हुआ था। मैंने सन 1922 की एक सूची देखी जिसमें यह जिक्र था कि कौन कहां किस पद पर है? इस सूची के बारे में मेरा मानना है कि यह सही होगी। उसमें उनका जन्म का वर्ष सन 1879 और निधन का वर्ष 1966 दिया हुआ था। परंतु लगता है उनका निधन सन 1965 में हुआ था। सामान्य तौर पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक बॉवेल्स  बंगाल नागपुर रेलवे (बीएनआर) के प्रभारी इंजीनियर थे और बीएनआर के लिए वर्कशॉप, घर, स्कूल, अस्पताल, हथियार भंडार, जेल आदि का निर्माण करते थे।

बीएनआर के लिए ट्रैक बिछाने के दौरान उन्होंने इविंग सिस्टम के साथ प्रयोग किया। परंतु मैंने जो दस्तावेज खंगाले उनसे यह लगता नहीं कि वह बीएनआर के कर्मचारी थे। इसके बजाय उससे यह संकेत मिलता है कि वह एक अन्य इंजीनियरिंग कंपनी मार्शलैंड, प्राइस ऐंड कंपनी तथा ऐसी ही अन्य कंपनियों के कर्मचारी रहे थे। इनका काम तत्कालीन बंबई, बड़ौदा और सेंट्रल इंडिया रेलवे, बीएनआर (खडग़पुर) और सैन्य कार्य विभाग  के लिए सलाहकार की भूमिका निभाना था। प्रथम विश्वयुद्घ के दौरान वह सेना के साथ काम कर चुके थे। नटवर सिंह की पुस्तक द मैग्निफिशेंट महाराजा (भूपिंदर सिंह पर केंद्रित) में बॉवेल्स का जिक्र मिलता है हालांकि नटवर सिंह उनके पहले नाम को लेकर भ्रमित नजर आते हैं। 

वह लिखते हैं, ‘महाराजा ने महत्त्वपूर्ण विभागों के प्रमुख के रूप में कई यूरोपियन को बुलाया। कर्नल चेस्टर बॉवेल्स मुख्य इंजीनियर थे जो बाद में महाराजा के खासमखास बन गए। उनकी पत्नी निहायत खूबसूरत थीं। इस बात ने भी कर्नल के अधिकार क्षेत्र के विस्तार में मदद की।’ बॉवेल्स केवल पीएसएमटी के नहीं बल्कि पटियाला राज्य के इंजीनियर थे। 

लापता इंजनों का मामला 
पीएसएमटी के दो ट्रैक ऐसे थे जो आपस में जुड़े हुए नहीं थे। पहला सन 1907 में सरहिंद/सरहिंद बस्सी से खुला और आगे चलकर सरहिंद-मोरिंडा मार्ग बना। इस मार्ग पर यात्री और मालवहन दोनों होता था। यह मार्ग उत्तर-पश्चिम रेलवे के पारंपरिक रेल मार्ग के लगभग समांतर ही चला। 

इसलिए 24 किलोमीटर लंबा यह ट्रैक कभी रोपड़ तक नहीं बढ़ सका। ऐसा करना अनावश्यक माना गया। बॉवेल्स के कागजात हमें बताते हैं कि इस मार्ग पर सन 1908 में ही हर महीने 20,000 यात्रियों का आवागमन था। इसके अलावा माल ढुलाई अलग होती थी। बहरहाल इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता है कि यहां कभी इंजन का इस्तेमाल किया गया हो। यहां हमेशा खच्चरों और बैलों का इस्तेमाल किया गया। 56 किलोमीटर लंबा दूसरा मार्ग पटियाला से सुनाम तक था। इस मार्ग पर इंजन का इस्तेमाल किया जाता था। अजीब बात है कि इस मार्ग पर आवागमन कभी गति नहीं पकड़ सका। संयोग से ये दोनों रेल मार्ग मार्सलैंड, प्राइस ऐंड कंपनी ने बिछाए थे। इनके रखरखाव का काम भी कंपनी के पास था। बाद में ऑटोमोबाइल के आगमन और प्रतिस्पर्धा ने पीएसएमटी को खत्म कर दिया। 

पीएसएमटी को सन 1927 में आधिकारिक रूप से बंद कर दिया गया। पटियाला-सुनम मार्ग सन 1914 में बंद हो गया था। सन 1938 में भूपिंदर सिंह का निधन हो गया और बॉवेल्स लंदन चले गए। जिस समय भूपिंदर सिंह का निधन हुआ बॉवेल्स लंदन में छुट्टिïयां बिता रहे थे और वह कभी वापस नहीं आए। जॉन डे के अलावा हर कोई पीएसएमटी के बारे में भूल गया। जॉन डे ने रेलवे पर एक किताब लिखी और अधिक जानकारी के लिए वह बॉवेल्स से संपर्क में रहते थे। सन 1962 में उन्होंने पीएसएमटी पर एक आलेख लिखा। वह आलेख हमें माइकल सैटो तक ले जाता है जिन्होंने रे डेसमंड के साथ मिलकर रेलवेज ऑफ द राज नामक पुस्तक लिखी। 

सैटो ने जॉन डे और एंबलर के सुरागों पर आगे काम किया। एंबलर को पीएसएमटी के अवशेष पटियाला के एक कबाड़ में मिले थे। सन 1969-70 में सैटो ने पाया कि ये अभी भी वहां थे। उन्होंने उनके पुनर्निर्माण काम शुरू किया (पता चला कि यह कोई कबाडख़ाना नहीं बल्कि खुद पीएसएमटी के इस्तेमाल की जगह थी)। अब उसे राष्ट्रीय रेल संग्रहालय में रखा गया है। सन 1976 में उसे अमृतसर वर्कशॉप में दोबारा पुराने रूप में ढाला गया। 

रेल संग्रहालय में एक कोच भी था, हालांकि वह मूल कोच नहीं था। यह एक निजी जांच सलून था जिसका इस्तेमाल बॉवेल्स करते थे। मूल ढांचे के भीतर अमृतसर वर्कशॉप ने काम किया है। मूल कोच में केन की कुर्सियां थीं। उनकी जगह लकड़ी की सीट लगाई गई हैं। इंजन को दोबारा काम आने की स्थिति में पहुंचा दिया गया है। 100 साल बाद इस पर सवारी करना एक दिलचस्प अनुभव है। दूसरा इंजन अमृतसर की वर्कशॉप में रखा है। शेष दो इंजनों के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं है। 
(लेखक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: पीएसएमटी, rail, चार्ल्स विलियम बॉवेल्स, डब्ल्यू.जे. इविंग, मोनोरेल, कुंडाला घाटी, भाप इंजन,
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