बिजनेस स्टैंडर्ड - सेवानिवृत्ति से पहले कई काम!
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सेवानिवृत्ति से पहले कई काम!

एम जे एंटनी /  07 22, 2018

2 अक्टूबर को सेवानिवृत्त होंगे न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा
 सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के हालिया फैसले ऐसे संकेत देते हैं कि उनका झुकाव उदार पक्ष की तरफ हो गया है लेकिन मौजूदा वक्त में भारी-भरकम कानूनी और प्रशासनिक एजेंडा उनकी सबसे बड़ी चुनौती बनता दिख रहा है

बिजनेस स्टैंडर्ड सेवानिवृत्ति से पहले कई काम! उच्चतम न्यायालय के लिए अगले दो महीने न्यायिक और प्रशासनिक रूप से बेहद अहम हैं। सभी पत्ते मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के पास हैं जो 2 अक्टूबर को सेवानिवृत्त होंगे। कानूनी पेशेवरों और पूरे देश की नजर इस बात पर लगी हैं कि वह इस अभूतपूर्व स्थिति से किस तरह निपटते हैं। 

न्यायमूर्ति मिश्रा पांच न्यायाधीशों के संविधान पीठ की अगुआई कर रहे हैं जो लोगों के अधिकारों और पूरे समाज से जुड़े कई अहम मसलों पर फैसले दे चुका है। निजता से संबंधित फैसले में लोगों के इस बहुमूल्य अधिकार पर जोर दिया गया है। इस फैसले ने इस क्षेत्र में नए आधार तैयार किए हैं और सरकार के हस्तक्षेप के मानकों को स्पष्टï किया है। पीठ ने समलैंगिकों (एलजीबीटी समुदाय) के अधिकारों पर फैसला सुरक्षित रखा है और सभी संकेत इस ओर इशारा करते हैं कि देश को निजी व्यवहार पर पाबंदी लगाने वाले अंग्रेजों के जमाने के कानून से मुक्ति मिल जाएगी।

न्यायपालिका के मोर्चे पर और भी बहुत कुछ होने वाला है। न्यायूमर्ति मिश्रा की अगुआई वाले पीठ ने अब मशहूर सबरीमला मंदिर में युवा महिलाओं के प्रवेश के अधिकार का मामला अपने हाथ में लिया है। सबरीमला मंदिर के देवता ब्रह्मïचारी हैं और वहां रजस्वला महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। एक अन्य पेचीदा मामला यह है कि क्या सहमति से विवाहेतर संबंध बनाना अपराध है? भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) को भी अंग्रेजों के जमाने का अवशेष माना जाता है। 

इन मुद्दों के समाज के लिए कई गहरे मायने हैं लेकिन मिश्रा पीठ के समक्ष कई राजनीतिक सवाल भी हैं। इनमें यह सवाल भी शामिल है कि क्या कोई सजायाफ्ता व्यक्ति सांसद या विधायक बन सकता है। पीठ ने दिल्ली सरकार और दिल्ली के उपराज्यपाल के बीच अधिकारों को लेकर एक व्यापक फैसला दिया है। इसमें कहा गया है कि निर्वाचित सरकार के पास उपराज्यपाल की सहमति के बिना खुद फैसले लेने का अधिकार है। हालांकि कई पूरक विषयों पर अब भी फैसला होना बाकी है। इनमें यह सवाल भी शामिल है कि नौकरशाही पर किसका नियंत्रण है। 

मिश्रा पीठ अब भी अयोध्या मामले की सुनवाई कर रही है। हालांकि रोजाना सुनवाई के बजाय यह केवल शुक्रवार को हो रही है। इस मामले में चीजें बहुत आगे नहीं बढ़ी हैं क्योंकि पहला सवाल अपनी जगह बरकरार है कि इस्लाम में नमाज के लिए मस्जिद जरूरी है या नहीं। अभी इस बात पर बहस चल रही है कि इसे संविधान पीठ के हवाले किया जाए या नहीं। इसलिए भूमि के मालिकाना हक और उस पर नया पूजा स्थल बनाने का अधिकार के सवाल पर आम चुनावों या न्यायमूर्ति मिश्रा के सेवानिवृत्त होने के बाद ही बहस होगी।

मुख्य न्यायाधीश ने अपने हाल के फैसलों में साबित किया है कि वह उदार पक्ष के साथ खड़े हैं या कम से कम उनका झुकाव उस ओर हो गया है। जब वह मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश थे, तभी से सिनेमाघरों और अन्य स्थानों में राष्टï्रगान गाए जाने की वकालत कर रहे थे। उच्चतम न्यायालय में भी शुरुआत में उनका यह रुख कायम रहा लेकिन धीरे-धीरे उन्हें महसूस हुआ कि राष्टï्रवाद को लोगों पर थोपा नहीं जा सकता है।

उनकी पीठ ने अपने आदेश की धार कुंद की और आखिरकार गेंद संसद के पाले में डाल दी। लगता है कि मुख्य न्यायाधीश अपनी गलतियों को सुधारना चाहते हैं क्योंकि वह दूसरे पाले में चले गए हैं और उन्होंने ऐसे फैसले दिए हैं जो उन्हें जाने माने न्यायविदों की जमात में शामिल कर देंगे। 

पिछले सप्ताह उन्होंने भीड़ द्वारा लोगों को पीट-पीटकर मारने के नए खतरे से निपटने के लिए कई दिशानिर्देश जारी किए। हालांकि उन्होंने इस बारे में कानून पारित करने की जिम्मेदारी सरकार पर छोड़ दी। उन्होंने खरीदारों को समय पर फ्लैट नहीं देने वाले बिल्डरों के खिलाफ भी सख्त अंतरिम आदेश दिए। साथ ही संविधान पीठ के एक फैसले में ‘लिविंग विल’ का विचार भी रखा जिसमें लाइलाज बीमारी से ग्रसित कोई व्यक्ति अपने रिश्तेदारों से कह सकता है कि उसकी दर्दभरी जिंदगी को कृत्रिम तरीकों से आगे न बढ़ाया जाए। 

प्रशासनिक मोर्चे पर भी न्यायमूर्ति मिश्रा जिस तरह की कड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं वैसी इससे पहले किसी भी मुख्य न्यायाधीश को नहीं झेलनी पड़ी। उनके चार वरिष्ठïतम सहयोगियों की प्रेस कॉन्फ्रेंस और यह चेतावनी अब भी कानों में गूंज रही है कि न्यायपालिका खतरे में है। उनका आरोप था कि मुख्य न्यायाधीश अपेक्षित परिणाम पाने के लिए संवेदनशील मामलों को कुछ खास न्यायाधीशों को दे रहे हैं। उनका कहना था कि सोहराबुद्दीन मामले की सुनवाई कर रहे सीबीआई के विशेष न्यायाधीश बी एच लोया की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत का मामला भी शामिल है। आखिरकार मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले को अपनी पीठ में ले लिया और न्यायाधीश की मौत की जांच की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दिया। इसी तरह लखनऊ मेडिकल घोटाले में उनकी भूमिका पर सवाल उठाने वाली याचिकाओं को भी खारिज कर दिया गया। इस मामले में एक कॉलेज को बुनियादी ढांचा नहीं होने के बावजूद मंजूरी दी गई थी। 

दीपक मिश्रा पीठ ने अपने एक फैसले में कहा कि मुख्य न्यायाधीश ही वरिष्ठतम न्यायाधीश है और विभिन्न पीठों को मुकदमे आवंटित करना उसका विशेषाधिकार है। इस फैसले की आलोचना हुई क्योंकि खुद को पीठ से अलग करने के बजाय वह खुद की अपनी शक्तियों के बारे में फैसला कर रहे थे। दो अन्य फैसलों में भी इस बात पर जोर दिया गया जिससे इस संदेश के लिए कोई जगह नहीं रह गई कि न्यायपालिका में कौन सर्वोपरि है। 

इन घटनाओं से महाभियोग प्रस्ताव की अभूतपूर्व स्थिति पैदा हो गई। हालांकि इस प्रस्ताव को वापस ले लिया गया और न्यायपालिका की छवि को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ। न्यायमूर्ति मिश्रा के कार्यकाल में अब भी कई अहम मुद्दे मुंह बाए खड़े हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए नए कॉलेजियम का गठन किया जाना है क्योंकि उनके चिर प्रतिद्वंद्वी न्यायमूर्ति जस्ती चेलमेश्वर सेवानिवृत्त हो चुके हैं। न्यायमूर्ति चेलमेश्वर की अगुआई में ही न्यायाधीशों ने प्रेस कांफ्रेंस की थी। मुख्य न्यायाधीश ने इसे गठित करने में कोई तत्परता नहीं दिखाई है, हालांकि ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद न्यायालय 2 जुलाई को खुला है। कॉलेजियम के गठन में देरी से न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रभावित हो रही है। 

उच्चतम न्यायालय में अब भी 10 न्यायाधीशों की कमी बरकरार है और लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इस बात को भी लेकर अटकलें चल रही हैं कि मुख्य न्यायाधीश दूसरे वरिष्ठïतम न्यायाधीश और न्यायमूर्ति चेलमेश्वर की प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल न्यायमूर्ति रंजन गोगोई को अगला मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश करेंगे या नहीं। मुख्य न्यायाधीश की अगुआई वाले कॉलेजियम और सरकार के बीच रिश्तों में असहजता के कारण यह संकट गहरा गया है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के एम जोसेफ को प्रोन्नत कर उच्चतम न्यायालय में भेजने के मामले से गतिरोध बढ़ गया है। कॉलेजियम ने उनके नाम की सिफारिश की थी लेकिन सरकार ने इसका विरोध किया। सरकार पर आरोप लगाया गया कि वह न्यायमूर्ति जोसेफ से बदला ले रही है क्योंकि उन्होंने उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के खिलाफ फैसला दिया था। 

मुख्य न्यायाधीश के पास समय बहुत कम है। आधार मामले ने साढ़े चार महीने में 38 दिन ले लिए। अब उन्होंने विभिन्न मामलों में सुनवाई की रफ्तार बढ़ाई है और एलजीबीटी मामले की सुनवाई केवल चार दिन में पूरी हो गई। न्यायाधीशों को न केवल मामलों की सुनवाई करनी पड़ती है बल्कि फैसले भी लिखने पड़ते हैं। मुख्य न्यायाधीश के पास बहुत न्यायिक और प्रशासनिक काम होता है, इसलिए देश को यह उम्मीद करनी चाहिए कि जल्दबाजी के कारण न्याय प्रभावित नहीं होगा।

Keyword: उच्चतम न्यायालय, मुख्य न्यायाधीश, दीपक मिश्रा, सबरीमला मंदिर, आईपीसी,
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