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अगला आम चुनाव मोदी बनाम राहुल

शेखर गुप्ता /  07 22, 2018

गत शुक्रवार को संसद में विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर जो बहस हुई वह कई सवालों के जवाब देती है। पहली बात, क्या विपक्ष को 2019 के चुनाव को नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी बनने देना चाहिए या फिर वह लड़ाई राज्य दर राज्य लड़ी जाएगी? राहुल ने अब खुद इसे मोदी के साथ सीधा मुकाबला बना दिया है।

दूसरा, क्या भाजपा राहुल की चिंता करती है? सच तो यह है कि भाजपा ने कभी उनको गंभीरता से लिया ही नहीं है। राहुल की ओर से की गई सूटबूट वाली टिप्पणी ने जरूर मोदी सरकार की राजनीतिक अर्थव्यवस्था को बदल दिया। इस सत्र की शुरुआत में इसके और प्रमाण सामने आए। भाजपा यह कह सकती है कि आरटीआई अधिनियम में संशोधन की बात से पीछे हटने का राहुल के विरोध से कोई लेनादेना नहीं है परंतु लगता नहीं है कि इस बात से लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के अलावा कोई सहमत होगा।

इस बहस के बाद भाजपा की तरफ से इस बात पर कोई संशय नहीं रह जाएगा कि वह किस पर हमला करेगी। राहुल को नकारने की कोशिश शुरू भी हो चुकी है जबकि इसका अर्थ एकदम उलट है। अगर आप किसी से घृणा करते हैं या उसका तिरस्कार करते हैं तो आप उसकी अनदेखी करते हैं। 

 

तीसरी बात, क्या राहुल एक गंभीर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बनने के लिए जरूरी प्रतिबद्धता दिखा पाएंगे? भाजपा नहीं तो कम से कम अपने अनुयायियों के सामने उन्हें यह प्रतिबद्धता दिखानी होगी। शुकवार का उनका प्रदर्शन देखकर तो लगता है कि वह ऐसा कर सकते हैं।

राहुल संसद में महत्त्वपूर्ण नेता प्रतिपक्ष के रूप में उभरे हैं। उस संसद में जिसमें उनके दल के पास इतनी सीटें भी नहीं हैं कि उसे औपचारिक तौर पर नेता प्रतिपक्ष का पद मिल सके। इसके साथ ही राहुल ने अगले आम चुनाव के पहले मोदी विरोधी मोर्चे के नेतृत्व की भी दावेदारी ठोक दी है।

चौथा सवाल थोड़ी चतुराई की मांग करता है। क्या राहुल अब ‘पप्पू’ की छवि तोडऩे में कामयाब रहे हैं? अपने भाषण में उन्होंने कहा कि उन्हें पप्पू कहे जाने का बुरा नहीं लगता। परंतु उनकी पार्टी शायद यह मानना चाहेगी कि उन्हें बुरा लगता था। हम यही कहेंगे कि उन्हें बुरा नहीं लगता। हम राहुल को पप्पू से अलग करके देख सकते हैं लेकिन राहुल में से पप्पू को निकाल नहीं सकते। अगर ऐसा होता तो उन्होंने विजयी मुद्रा में आंख नहीं मारी होती।

भाषणों और उपदेशों से भरी हुई राजनीतिक दुनिया में थोड़ी धृष्टता बुरी नहीं है। ऐसे में थोड़ा लडक़पन दिखाना उतना भी बुरा नहीं। आखिरकार देश के अधिकांश मतदाता युवा हैं और वे निरंतर उपदेशों से ऊबे हुए हैं। इस बहस में कौन जीता, यह सवाल अब बेमानी हो चुका है। इसलिए क्योंकि मोदी एक बहुत अच्छे वक्ता हैं, जब वह आक्रामक बातें कर रहे हों तो और भी निखरकर सामने आते हैं। वैसे भी आगामी आम चुनाव में अब बहुत अधिक वक्त नहीं बचा है। ऐसे में बहस में जीत या हार का कोई मतलब नहीं है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अब उनके सामने प्रतिद्वंद्वी एकदम स्पष्ट है।

उनके समर्थक अब यह इल्जाम नहीं लगा सकते कि मोदी का मुकाबला एक धर्मनिरपेक्ष-उदारवादी खाप से है जिसके पास कोई वोट नहीं है, न ही उसका कुछ दांव पर लगा है लेकिन मीडिया के एक वर्ग में उनका दबदबा है। उनके प्रतिद्वंद्वियों ने अब अखाड़े में चुनौती उतार दी है और लड़ाई की तैयारी हो चुकी है। उनकी पार्टी कहेगी कि वह यही चाहते थे लेकिन राहुल ने जिस सफाई और आक्रामकता से अपनी बात कही है, उसने उन्हें चौंकाया जरूर होगा।

प्रधानमंत्री पर किए गए तेज हमले के दौरान राहुल बार-बार कहते रहे कि डरो मत। उसके बाद अचानक वह प्रधानमंत्री को गले लगाने जा पहुंचे। उन्होंने अपने ताकतवर प्रतिद्वंद्वी के साथ लड़ाई में उसी के हथियार इस्तेमाल करने का जोखिम उठाया है। भाषण देने की कला, गले लगना इसके उदाहरण हैं। राजनीति में अगर आप यह शैली अपनाते हैं तो आपके लिए आत्मघाती हो सकता है। याद रखिए कि आप जिस स्कूल के विद्यार्थी हैं मोदी और भाजपा उसके डीन हैं। लेकिन सुर्खियां बटोरने की लड़ाई में जोखिम तो उठाना पड़ता है। राहुल ने 14 साल के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा जोखिम मोदी से सीधी लड़ाई मोल लेकर लिया है।

राहुल के समर्थकों को थोड़ा ठहरकर सोचने की जरूरत है। हो सकता है उन्होंने कुछ लड़ाइयां जीती हों लेकिन राजनीतिक वास्तविकताएं उन्हें मोदी के लिए कोई गंभीर चुनौती नहीं बनातीं। उनके नेतृत्व में पार्टी को कोई चुनावी जीत नहीं मिली है। उनकी चुनावी रैलियों में लोगों का उत्साह बढ़ा है लेकिन वह मोदी या कई राज्यों के नेताओं के आसपास भी नहीं पहुंच सके हैं। ममता बनर्जी, मायावती, अखिलेश यादव, लालू प्रसाद, तेजस्वी यादव, नवीन पटनायक और तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव में यह क्षमता उनसे अधिक है। कर्नाटक को छोड़ दिया जाए तो केवल एक-डेढ़ बड़े राज्यों में उनकी पार्टी का शासन है। वह संसाधनों की कमी से जूझ रही है। आशंका है कि चुनाव प्रचार शुरू होने तक उनके अधिकांश पार्टी सदस्य और परिवार के लोग अदालतों के चक्कर लगाते और भ्रष्टाचार के आरोपों के जवाब देते नजर आएंगे। सन 2019 में वह एक ऐसी टीम के रूप में मैदान में उतरेंगे जो पहली पारी में 230 (44 बनाम 270) रनों से पीछे हो। हमने अतीत में हवा के रुख में इतना बड़ा बदलाव नहीं देखा। 

असल बात यह नहीं है कि एक नए राहुल का उदय हुआ है। उन्हें अभी लंबी दूरी तय करनी है। उनकी प्रतिबद्धता और उनके फोकस को लेकर संदेह रहे हैं। वह अक्सर गायब हो जाते हैं या छुट्टी पर चले जाते हैं। उनकी छवि अजीबोगरीब व्यवहार की बन गई है। उनकी पार्टी के लोग कभी उनसे यह कहने का साहस नहीं जुटा पाएंगे लेकिन चिंतित रहते हैं और उनके मन में यह सवाल उठता है कि उनके बॉस हमेशा उनके साथ रहेंगे भी या नहीं। अब उन सवालों के जवाब काफी हद तक स्पष्ट हो चुके हैं, हालांकि आगे ऐसे और प्रमाणों की आवश्यकता होगी।

उनकी काम करने की शैली अपनी मां से एकदम जुदा है। अब तक उन्होंने और उनकी पार्टी ने वाजपेयी के बाद की भाजपा के प्रति अवमानना और शत्रुता का भाव रखा है। मोदी के साथ लगभग अस्पृश्य का सा व्यवहार किया गया। यह सब मोदी को रास आया क्योंकि वह एक विकट योद्धा हैं। सोनिया गांधी ने मोदी को मौत का सौदागर कहा। इसके जवाब में मोदी ने जर्सी गाय और बछड़ा जैसी बातें कहीं। अब राहुल ने जाकर उन्हें गले लगाया। उन्होंने कहा कि वह उन्हें प्यार करते हैं। शायद ही कोई उनकी बात पर यकीन करेगा फिर भी राजनीति में कटाक्ष को गाली गलौज या अस्पृश्यता से तो कम ही बुरा माना जाता है।

इसी तरह कर्नाटक में छोटे साझेदार जनता दल सेक्युलर को गद्दी सौंपकर भी उन्होंने अपनी पार्टी परंपरा के प्रतिकूल आचरण किया। वह मोदी के गले लगकर यह कह सकते हैं कि वह उनसे प्यार करते हैं लेकिन उनकी राजनीति स्पष्ट हो चुकी है: उन्हें मोदी के अलावा कोई भी मंजूर है।

चुनावी साल में यह प्रतिस्पर्धी राजनीति को कितना प्रभावित करेगा यह तो देखने वाली बात होगी। परंतु अब काफी कुछ स्पष्ट हो गया है। आशा की जा सकती है कि इस जीवंत संसदीय शुरुआत के बाद यह सत्र कहीं अधिक उत्पादक साबित होगा। राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम के लिए चुनाव प्रचार शुरू होने के पहले कई विधायी काम किए जाने हैं।

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