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देश में फलता-फूलता डिजिटल भुगतान

नवीन सूर्या /  July 20, 2018

हमें यह समझना होगा कि भुगतान एक वाणिज्यिक प्रक्रिया है। इसे बैंकिंग के साथ जोड़कर नहीं देखा जा सकता। प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के लिए एकीकृत भुगतान संस्थान निर्मित किए जाएं। बता रहे हैं नवीन सूर्या

 
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने हाल ही में चेतावनी दी थी कि खुदरा भुगतान क्षेत्र के घाटे में जाने का जोखिम उत्पन्न हो गया है क्योंकि अधिकांश लेनदेन चुनिंदा डिजिटल बैंकिंग कंपनियों के माध्यम से ही किए जा रहे हैं। केंद्रीय बैंक ने कहा कि उसकी योजना इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की है ताकि देशव्यापी भुगतान मंच तैयार हो सकें और इस क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा दिया जा सके। आरबीआई ने अपने विचार विकास एवं नियामकीय नीतियों को लेकर अपने वक्तव्य में रखे जो जून के आरंभ में जारी किया गया। 
 
बहरहाल अब हालात वापस घूमफिरकर पुरानी स्थिति में आ गए हैं क्योंकि नकदी के इस्तेमाल के आदी भारतीयों ने दोबारा नकद लेनदेन का रुख कर लिया है।  नवंबर 2016 में जब सरकार ने नाटकीय अंदाज में अचानक नोटबंदी की घोषणा की और देश की 80 प्रतिशत मुद्रा को चलन से बाहर कर दिया था तब अचानक डिजिटल भुगतान को लेकर रुझान बढ़ा था। परंतु देश में यह सिलसिला लंबा नहीं चला। मार्च 2017 में जहां 13,352 अरब रुपये मूल्य की प्रचलित मुद्रा थी, वहीं जून 2018 के अंत में यह बढ़कर 19,574 अरब रुपये हो गई। नवंबर 2016 में नोटबंदी के बाद यह घटकर 9,383 अरब रुपये रह गई थी। जाहिर है देश के बाजारों में एक बार फिर नकदी का बोलबाला है। 
 
नोटबंदी के सबसे बड़े फायदों में से एक था प्वाइंट ऑफ सेल मशीनों की तादाद में इजाफा। केवल 12 महीने की अवधि में देश में इन मशीनों की संख्या में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई। अक्टूबर 2016 में देश में ऐसी 16 लाख मशीनें थीं जो 81 फीसदी बढ़कर सितंबर 2017 तक 29 लाख हो गईं।  डिजिटल भुगतान के मामले में भी ऐसी ही बढ़ोतरी देखने को मिली। नोटबंदी के बाद नई तकनीक की मदद से बाजार में डिजिटल लेनदेन में कई गुने का इजाफा देखने को मिला। फिनटेक कंपनियों और पारंपरिक बैंकों के बीच गठजोड़ सामने आए। आरबीआई के आंकड़े बताते हैं कि नोटबंदी के बाद डिजिटल भुगतान का वॉल्यूम 55 प्रतिशत वार्षिक की दर से बढ़ा। परंतु अब हालात खराब हो रहे हैं। वॉलेट लेनदेन में गिरावट आ रही है क्योंकि सख्त केवाईसी मानक ने उन पर अंकुश लगाया है। 40-45 फीसदी की गिरावट ने आगे की राह मुश्किल कर दी है। डेबिट कार्ड भुगतान ने क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल को पीछे छोड़ दिया था और नोटबंदी के बाद भुगतान के लिए इस्तेमाल किए गए कुल कार्ड में से 96 फीसदी डेबिट कार्ड थे। परंतु नोटबंदी का असर कम होने के बाद नकदी व्यवस्था में वापस आ गई। आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक इस वर्ष मार्च में 443 अरब रुपये के कारोबार के साथ क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल 15 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। जबकि डेबिट कार्ड का कारोबार 419 अरब रुपये ही रहा।
 
डिजिटल भुगतान 
 
सवाल यह है कि हम पटरी पर वापसी कैसे करें? सबसे पहले कुछ बुनियादी बातें। हमें डिजिटल भुगतान को आरबीआई की नियामकीय निगरानी में स्वतंत्र रूप से देखना होगा। मौजूदा मॉडल के अधीन पारंपरिक बैंकिंग पर बहुत अधिक बोझ है। जबकि बैंकिंग तंत्र फंसे हुए कर्ज समेत अपनी ही समस्याओं के तले जूझ रहा है।  मौजूदा गैर बैंकिंग कंपनियां देश के डिजिटल लेनदेन में बमुश्किल 1-2 फीसदी का योगदान करती हैं। शेष 98 फीसदी कारोबार बैंकिंग के तहत होता है और इस पर भी चुनिंदा बैंकों का कब्जा है। एक तरह से देखा जाए तो बैंकिंग तंत्र के भीतर भी भुगतान का लोकतंत्रीकरण नहीं हुआ है। इसलिए इस बात की सख्त जरूरत है कि अधिक से अधिक बैंक और डिजिटल गैर बैंकिंग कंपनियां लेनदेन की भूमिका अपनाएं। देश की 1.3 अरब की आबादी में केवल 12 प्रतिशत लोग ही डिजिटल लेनदेन कर रहे हैं। बैंकिंग और डिजिटल लेनदेन के समान नियमन की व्यवस्था में खामी है। देश डिजिटलीकरण की एक अहम पहल से चूक रहा है क्योंकि हम 90 फीसदी नकद लेनदेन को डिजिटल करने का एक बड़ा अवसर गंवा रहे हैं। हमें बेहतर नियमन के साथ-साथ इस क्षेत्र में और कारोबारियों की भी जरूरत है। 
 
बैंकिंग व्यवस्था से इतर केवल चंद ऐसे संस्थान हैं जो बाजार की जरूरतों को पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं। विडंबना यह है कि इस बड़े अवसर के बावजूद बाजार का आकार मौजूदा कारोबारियों के लिए अव्यवहार्य है और इसके बावजूद सरकार नई प्रतिस्पर्धा आमंत्रित कर रही है।  बाजार संभावनाओं की बात करें तो भुगतान को अलग तरीके से देखना होगा। हमें यह समझना होगा कि भुगतान एक वाणिज्यिक गतिविधि है और इसे बैंकिंग से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। इससे इतर कम मूल्य के डिजिटल लेनदेन को नकद लेनदेन के समकक्ष माना जाना चाहिए। इससे इस क्षेत्र का राजस्व नुकसान कम करने में मदद मिलेगी। 
 
इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आरबीआई को एक नया संस्थागत ढांचा बनाना होगा। भुगतान उद्योग को एक विशेषज्ञ संस्थान की आवश्यकता है जो डिजिटलीकरण के राष्टï्रीय लक्ष्य को हासिल करने में हमारी मदद कर सके। इस ढांचे को एकीकृत भुगतान सेवा मॉडल की आवश्यकता है। यह बैंकिंग या गैर बैंकिंग किसी भी क्षेत्र से आ सकती है। इससे प्रतिस्पर्धा के लिए एक नई पौध तैयार होगी। यह संस्थान अगर पूरा ध्यान डिजिटल भुगतान पर लगाए तो बेहतर होगा। इसे एकीकृत क्षमता के साथ काम करना चाहिए और स्थानीय और वैश्विक लेनदेन का काम संभालना चाहिए। 
 
अगर ऐसा हो सका तो हम एक स्थायी सेवायोग्य कारोबारी मॉडल तैयार कर सकेंगे। इससे वृद्घि को गति मिलेगी और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। साथ ही विश्वस्तरीय डिजिटलीकरण की शुरुआत भी हो सकेगी।  समय की मांग यही है कि हम जटिलताओं से परे जाकर प्रक्रिया को सहज बनाएं ताकि नए प्रतिभागी भी इसमें हिस्सेदार बन सकें। आरबीआई ने प्रतिस्पर्धा बढ़ाने पर जोर दिया है। इस अवसर का लाभ लेकर एक नया नियामकीय ढांचा तैयार किया जाना चाहिए जो इस क्षेत्र में नए कारोबारियों को लाए और वृद्घि का एक नया द्वार खुल सके। 
 
(लेखक पेमेंट काउंसिल ऑफ इंडिया के मानद चेयरमैन हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।) 
Keyword: digital india, economy, payment, RBI,,
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