बिजनेस स्टैंडर्ड - जोखिम में है वृहद स्थिरता की स्थिति
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जोखिम में है वृहद स्थिरता की स्थिति

शंकर आचार्य /  July 18, 2018

देश की वृहद आर्थिक स्थिति इन दिनों जोखिम में नजर आ रही है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं शंकर आचार्य

 
कुछ माह पहले वर्ष 2018 के आरंभ में देश की वृहद अर्थव्यवस्था अच्छी स्थिति में नजर आ रही थी। विश्व अर्थव्यवस्था भी पूरे एक दशक की सबसे तेज गति से वृद्धि कर रही थी। हमारी आर्थिक वृद्धि भी नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के क्रियान्वयन के दोहरे झटके से उबरकर ठीकठाक ढंग से आगे बढ़ रही थी, मुद्रास्फीति की दर 5 फीसदी से नीचे थी, राजकोषीय रुझान भी ठीक थे और पूंजीगत आवक चालू खाते के घाटे की तुलना में बेहतर होने के कारण भुगतान संतुलन भी प्रबंधन के स्तर पर था।
 
पिछले छह महीनों में यह सबकुछ बदल गया है। तेल कीमतों में इजाफा तथा अमेरिका, यूरोपीय संघ और चीन के बीच गंभीर कारोबारी युद्ध की आशंका ने वैश्विक उत्पादन और कारोबार में वृद्घि की संभावनाओं को सीमित किया है। इससे भारत समेत उभरते बाजारों में पूंजी की आवक भी प्रभावित हुई है। निवेशकों को अमेरिका में निवेश सुरक्षित नजर आ रहा है। रुपये का तेजी से अवमूल्यन हुआ है और वित्त वर्ष 2018-19 की पहली तिमाही में 9 अरब डॉलर की पोर्टफोलियो पूंजी देश से बाहर चली गई। इसका दोतिहाई हिस्सा डेट में और बाकी इक्विटी में था। मुद्रास्फीति बढ़ रही है, राजकोषीय स्थिति भी तनाव में नजर आ रही है और ब्याज दरों में इजाफा हुआ है। भुगतान संतुलन दबाव में आ चुका है।
 
आखिर हो क्या रहा है? अधिकांश टीकाकार विपरीत बाहरी कारकों पर निर्भर हैं। मेरी दृष्टिï में देश की वृहद अर्थव्यवस्था में मध्यम अवधि की कमजोरी की भी इसमें अहम भूमिका है। हाल के वर्षों में ऐसी दो बड़ी कमजोरी हैं देश के सरकारी बैंकों का गहरा और लंबा खिंचता संकट और विदेशी व्यापार में भारी कमी। इस कमी के लिए भी देश के वाणिज्यिक निर्यात में आया ठहराव जिम्मेदार है। यह भुगतान संतुलन में सबसे अधिक विदेशी विनिमय अर्जित करने वाला क्षेत्र रहा है। दोनों समस्याओं की जड़ पिछली सरकार के कार्यकाल में निहित है लेकिन मौजूदा सरकार को भी इससे जूझना पड़ा है।
 
वाणिज्यिक बैंकों के फंसे हुए कर्ज की समस्या, खासतौर पर सरकारी बैंकों की समस्या के मामले में सरकार और आरबीआई ने इन परिसंपत्तियों को चिह्निïत करने की गति तेज कर दी है। सरकारी बैंकों को पूंजी भी मुहैया कराई गई है और ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता प्रस्तुत की गई है ताकि निस्तारण और वसूली की प्रक्रिया तेज की जा सके। गत सप्ताह सरकार द्वारा स्वीकृत सुनील मेहता पैनल की अनुशंसाओं में सरकारी बैंकों में निस्तारण प्रक्रिया को गतिशील बनाने के लिए पंचकोणीय रुख की बात कही गई। हालांकि इसके प्रभाव का आकलन अभी होना है। आशंका तो यह भी है कि यह आईबीसी की प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है। 
 
इन पहलों के बावजूद आरबीआई की जून 2018 की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में कहा गया है कि बैंकों के सकल एनपीए अनुपात में इजाफा हो सकता है और यह 11.6 फीसदी से बढ़कर 12.2 फीसदी हो सकता है। 11 सरकारी बैंकों के लिए यह अनुपात 21 फीसदी से बढ़कर 22.3 फीसदी हो सकता है। यह सब आरबीआई का अनुमान है जो आमतौर पर आशावादी माना जाता रहा है।  लब्बोलुआब यह कि बैंकिंग व्यवस्था अगले 2-3 साल तक दिक्कत में रहेगी। ऋण वृद्घि सीमित रहेगी और समर्थन व पुनर्पूंजीकरण का राजकोषीय बोझ बढ़ता जाएगा। सरकारी बॉन्ड को लेकर बैंकों की मांग कमजोर रहेगी और ब्याज दरों पर दबाव बनेगा। 
 
देश में बाहरी भुगतान की स्थिति भी बीते कुछ वर्ष में खराब हुई है। जीडीपी के अनुपात के रूप में वस्तु व्यापार घाटा वर्ष 2017-18 में 6.2 फीसदी बढ़ा है। जबकि आयात में बढ़ोतरी हुई तथा निर्यात 14 साल में पहली बार 12 फीसदी के नीचे आ गया। आश्चर्य की बात है कि डॉलर के संदर्भ में देश के निर्यात का मूल्य वर्ष 2017-18 में 2011-12 से मामूली कम रहा। हालिया रुझान के लिए अकेले तेल क्षेत्र को भी उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है। जीडीपी के 3.4 फीसदी के साथ गैर तेल कारोबार का घाटा वर्ष 2017-18 में सन 2012-13 के बाद के उच्चतम स्तर पर है। वर्ष 2017-18 में गैर तेल निर्यात का अनुपात 10.2 फीसदी रहा जो 15 साल में सबसे कम है। काफी संभावना है सरकार और आरबीआई ने जनवरी 2014 से जनवरी 2018 तक रुपये की वास्तविक विनिमय दर में 20 फीसदी तक का इजाफा हुआ। इसने देश के व्यापारिक प्रदर्शन को खराब करने में अहम भूमिका निभाई।
 
शुद्घ 'अदृश्य अनुपात' में भी लगातार गिरावट आई और यह वर्ष 2013-14 के 6.2 फीसदी से गिरकर 2017-18 में 4.3 फीसदी रह गया। यह एकदम वैसा ही है जैसी गिरावट सॉफ्टवेयर निर्यात और निजी स्थानांतरण (विदेश से आने वाला धन) के रूप में दो प्रमुख निर्यात में देखने को मिली। इनका निर्यात 7.1 फीसदी से घटकर 5.2 फीसदी पर आ गया। इन रुझानों के साथ आश्चर्य नहीं कि चालू खाते का घाटा वर्ष 2017-18 में बढ़कर 1.9 फीसदी हो गया। वर्ष 2018-19 में यह बढ़कर 2.5 से 3.0 फीसदी हो सकता है। 
 
मध्यम अवधि की इन अनसुलझी वृहद कमजोरियों को अगर मौजूदा विपरीत बाहरी परिस्थितियों मसलन बढ़ती तेल कीमतों, कारोबारी जंग और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नकदी की तंगी से जोड़कर देखा जाए तो ये सब देश की वृहद आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर रहे हैं। अनुमान लगाया जा सकता है कि रुपये की विनिमय दर, मुद्रास्फीति और ब्याज दर तीनों दबाव का विषय हैं। ये सभी कठिन वक्त का संकेत दे रहे हैं। सवाल यह है कि क्या किया जाना चाहिए? आदर्श स्थिति में तो हमें चार साल में रुपये की विनिमय दर इतनी नहीं बढऩे देनी थी। हमें जल्दी कदम उठाना था और बैंकिंग संकट को समय पर पहचानना और हल करना था। अब हम क्या कर सकते हैं? मेरी राय में कुछ बातें  हैं, हालांकि चुनावी वर्ष में उनमें से कुछ का क्रियान्वयन मुश्किल हो सकता है: 
 
रुपये को बाजार के हिसाब से अवमूल्यित होने देना चाहिए। आरबीआई अस्थिरता के हिसाब से कुछ हस्तक्षेप कर सकता है। 
 
निर्यातकों को जीएसटी रिफंड की गति बढ़ाई जाए। 
 
केंद्र और राज्य सरकारों को राजकोषीय विवेक का इस्तमाल करना चाहिए। हाल के दिनों में फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी और राज्यों की कर्ज माफी जैसे कदम उठाए गए। उनसे लगता है कि राजकोषीय घाटा लक्ष्य से ऊंचा होगा। सरकार को अपनी उधारी बढ़ानी होगी और इससे ब्याज दर बढ़ेगी।
 
आईबीसी की दोहरी बैलेंस शीट की समस्या को हल करने को लेकर डटे रहने की जरूरत है। 
 
ऐसे नीतिगत कदम न उठाए जाएं जिनका बचाव करना मुश्किल हो। मसलन आईडीबीआई बैंकों की खरीद के लिए एलआईसी की मदद लेना। ऐसा इसलिए क्योंकि वृहद आर्थिक स्थिरता के दबाव में होने पर सरकारी की नीतिगत विश्वसनीयता भी दांव पर होती है। 
 
Keyword: economy, GST, वस्तु एवं सेवा कर जीएसटी,
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