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कंपनियों को राहत

संपादकीय /  July 18, 2018

कंपनी मामलों के मंत्रालय (एमसीए) के सचिव की अध्यक्षता में एक 10 सदस्यीय समिति का गठन किए जाने की घोषणा की गई है। यह समिति कंपनी अधिनियम 2013 में किए गए दंडात्मक प्रावधानों की समीक्षा की जरूरत की पड़ताल करेगी। मंत्रालय ने साफ कहा है कि यह कदम उन गड़बडिय़ों को गैर-आपराधिक बनाने के लिए उठाया गया है जिन्हें अब तक आपराधिक माना जाता रहा है। इन गड़बडिय़ों के लिए किसी फौजदारी अदालत में सुनवाई की जरूरत नहीं रह जाएगी और महज जुर्माना देकर उनका निपटारा किया जा सकेगा। कहा जा रहा है कि इससे निचली अदालतों को 'अधिक गंभीर किस्म' के अपराधों पर ध्यान देने का मौका मिलेगा। निजी क्षेत्र की नामचीन हस्तियों से भरी इस समिति को एक आंतरिक निर्णयन व्यवस्था के बारे में विस्तृत  रूपरेखा तैयार करने को भी कहा गया है। इस व्यवस्था में जुर्माना मंत्रालय की एमसीए21 प्रणाली के तहत इस तरह समायोजित किया जाएगा कि विवेकाधीन निर्णयों को न्यूनतम किया जा सके।

 
ये सभी उद्देश्य बहुमूल्य हैं और मंत्रालय की इसके लिए सराहना की जानी चाहिए। यह कदम कारोबार जगत पर भारतीय राज्य के दबाव को कम कर पाने में महत्त्वपूर्ण हो सकता है। जब तक यह समिति विवेकाधीन फैसलों को न्यूनतम करने और प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के सिद्धांत पर चलती है तब तक यह मानने की समुचित वजह है कि इन विचार-विमर्शों से निकलने वाला नतीजा मौजूदा कानून में बड़ा बदलाव लाएगा। कंपनी अधिनियम 2013 में संशोधन से संबंधित होने के नाते निश्चित रूप से इसे संसद की मंजूरी लेनी होगी लेकिन यह उम्मीद की जानी चाहिए कि इस तरह के मुखर बदलावों को दोनों पक्षों का समर्थन मिलेगा और सदनों में गतिरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा। दीवानी किस्म वाली गड़बडिय़ों को भी भारत में अक्सर आपराधिक करार दिया जाता रहा है। यह प्रवृत्ति कई तीव्र संवेगों की उपज है। पहला, निजी क्षेत्र के बारे में संदेह का अंतर्निहित भाव होने से कानून का मसौदा तैयार करने वाले यह मान लेते हैं कि दूसरे दंडात्मक प्रावधान नाकाफी साबित होंगे। दूसरा, भारत कई मायनों में एक कमजोर राज्य है। 
 
कानूनों के अनुपालन में शिथिलता और बिखराव रहता है। कानूनों के अनुपालन में कमजोर रह जाने की भरपाई करने के लिए सजा की मात्रा को बढ़ाने की चाह पैदा होती है। इसके चलते समुचित दंड के सख्त अनुपालन की जगह भारी दंड के मनमाने अनुपालन की स्थिति पैदा होती है जो भारत में कारोबार का जोखिम बढ़ाने के साथ कारोबारी सुगमता पर नकारात्मक प्रभाव भी डालता है। इसके अलावा जब किसी कानूनी गड़बड़ी को आपराधिक बना दिया जाता है तो उसे गैर-आपराधिक करार देना राजनीतिक तौर पर काफी मुश्किल हो जाता है। मसलन, चेक का बाउंस होना निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स ऐक्ट की धारा 138 के तहत अब भी एक आपराधिक कृत्य है। हालांकि उच्चतम न्यायालय यह कह चुका है कि निचली अदालतों के समक्ष लंबित मामलों में 20 फीसदी से भी अधिक मामले चेक बाउंस के हैं। 
 
यह उम्मीद की जाती है कि कंपनी मामलों के मंत्रालय की तरफ से शुरू की गई पहल को अन्य क्षेत्रों में भी दोहराया जाएगा और राज्य सरकारें भी इसका अनुसरण करेंगी। कई सामाजिक मामलों को भी गैर-आपराधिक घोषित किए जाने की जरूरत है। ऐसे मामलों में समलैंगिकता के अलावा आत्महत्या का प्रयास और भिक्षावृत्ति भी शामिल हैं। इसके अलावा आपराधिक मानहानि के प्रावधानों को भी खत्म करने की वाजिब वजहें हैं। आज के समय में आपराधिक मानहानि प्रावधान विरोधियों को प्रताडि़त करने का माध्यम भर रह गया है। कंपनी जगत से संबंधित कुछ गड़बडिय़ों को गैर-आपराधिक घोषित करने की योजना इस दिशा में उठाया हुआ पहला बढिय़ा कदम है लेकिन इसके साथ दूसरे प्रगतिशील कदम भी उठाए जाने चाहिए।
Keyword: company, MCA,,
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