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दो दशक के निचले स्तर पर दलहन आयात!

रॉयटर्स / मुंबई July 18, 2018

विश्व के सबसे बड़े खरीदार भारत का दलहन आयात गिरकर दो दशकों के सबसे निचले स्तर पर जा सकता है। कीमतों को सहारा देने के लिए सरकार द्वारा आयात शुल्क में बढ़ोतरी करने और विदेशी खरीद सीमित करने के बाद ऐसा हो सकता है। इसका असर वैश्विक आपूर्तिकर्ताओं की योजनाओं पर भी पड़ रहा है। आयात में यह गिरावट मटर और मसूर जैसी दालों के दामों में इजाफा करने के सरकारी प्रयासों को दर्शाती है। ऐसा इसलिए किया गया ताकि खाद्य सब्सिडी योजनाओं के तहत किसानों को होने वाला भुगतान कम किया जा सके। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और रूस में भारतीय मांग पर निर्भर रहने वाले किसान दालों की खेती में कमी कर सकते हैं और आयात में आई इस रुकावट की प्रतिक्रिया स्वरूप अन्य बाजारों की तलाश जारी रख सकते हैं।
 
इंडियन पल्सेज ऐंड ग्रेन्स एसोसिएशन के वाइस चेयरमैन बिमल कोठारी ने रॉयटर्स को बताया कि अप्रैल में शुरू होने वाले वित्त वर्ष 2018-19 केदौरान भारत का दलहन आयात लगभग 80 प्रतिशत गिरकर 12 लाख टन रह सकता है, जो 2000-01 के बाद से सबसे कम स्तर है। कोठारी ने कहा कि मात्रात्मक प्रतिबंध और ऊंचा आयात शुल्क विदेशी आवक को प्रभावी रूप से रोक रहा है। भारत कुछ दालों पर आयात शुल्क में 50 प्रतिशत तक का इजाफा कर चुका है और पीली मटर, हरे चने तथा छोले जैसी अन्य दलहन का कोटा निर्धारित कर दिया गया है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश ने वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान तीन अरब डॉलर मूल्य की 56.8 लाख टन दालों का आयात किया, जो एक साल पहले की तुलना 15 प्रतिशत कम लेकिन 2000-01 के 3,50,000 टन से अधिक रहा। दलहन आयात में बढ़ोतरी के साथ ही स्थानीय उत्पादन में इजाफे हुआ। भारत ने जून में समाप्त होने वाले फसल वर्ष 2017-18 में 2.451 करोड़ दलहन उत्पादन किया जो एक दशक पहले की तुलना में लगभग दोगुना रहा।
 
दलहन के तीन व्यापारियों ने कहा कि आपूर्ति में इस अधिकता की वजह से पीली मटर के दामों में गिरावट आई। लागत और ढुलाई के आधार पर इसके दाम गिरकर 285 डॉलर प्रति टन पर आ गए, जबकि एक साल पहले ये दाम 330 डॉलर और 2016 में 475 डॅालर थे।   भारत के दलहन आयात में पीली मटर का योगदान एक-तिहाई से भी अधिक रहता है। ग्रीष्मकाल में बोई जाने वाली दालों के सबसे बड़े उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में एक दाल मिल मालिक नितिन कलंत्री ने कहा कि स्थानीय बाजारों में दलहन के दाम सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से 30 प्रतिशत तक नीचे चल रहे हैं जिससे सरकार पर किसानों से खरीद का दबाव बन रहा है। उन्होंने कहा कि आयात रोककर सरकार कीमतें एमएसपी के स्तर के पास ले जाने की कोशिश कर रही है। इससे महंगी सरकारी खरीद कम करने में मदद मिलेगी।
 
भारत अलग-अलग फसलों पर व्यय नहीं करता है लेकिन वित्त वर्ष 2018-19 में सभी फसलों के लिए खाद्य सब्सिडी व्यय 1.69 लाख करोड़ रुपये रहेगा। मीडिया से बात करने की अनुमति न होने की वजह से अपनी पहचान उजागर न करते हुए एक सरकारी अधिकारी ने कहा कि सरकार की प्राथमिकता पिछले साल खरीदे गए दलहन स्टॉक का निपटान करना है। अगर सस्ता आयात जारी रहता है तो यह संभव नहीं है। अधिकारी ने कहा कि पिछले साल सरकारी एजेंसियों ने करीब 20 लाख टन दलहन खरीद की थी। हमें नई फसल खरीदने के लिए जगह की जरूर है।
 
निर्यातकों में खलबली
 
वित्त वर्ष 2016-17 में भारत के 66,00,000 टन के रिकॉर्ड दलहन आयात ने कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के किसानों को अपनी दलहन खेती में विस्तार के लिए प्रेरित किया था लेकिन पिछले साल आयात में कमी आने से इसमें भी कमी आई है।  स्टैटिस्टिक्स कनाडा के अनुसार भारत के सबसे बड़े दलहन आपूर्तिकर्ता - कनाडा में किसानों ने 2018 में मसूर की खेती में 14.5 प्रतिशत तक और मटर की खेती में 12 प्रतिशत तक की कमी की है। कनाडा के निर्यातक चीन को और अधिक मटर और अन्य फलियों की खेप भेज रहे हैं। 
 
वह अमेरिका द्वारा सोयाबीन पर ऊंचा शुल्क लगाए जाने के बाद इसका उपयोग सूअर को खिलाए जाने वाले आहार सोया खाद्य के विकल्प के रूप में करता है। ऑस्ट्रेलिया के आपूर्तिकर्ताओं को भारतीय मांग में तुरंत सुधार की उम्मीद नहीं है और वे अन्य एशियाई देशों को अधिक खेप भेजने का प्रयास कर रहे हैं।
Keyword: agri, farmer, pulses, दलहन आयात,
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