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बरबाद न हो यह सत्र

संपादकीय /  July 17, 2018

संसद के बजट सत्र में जो कुछ हुआ, वह बुधवार को शुरू हो रहे मॉनसून सत्र में भी दोहराए जाने की आशंका मंडरा रही है। शुरुआती संकेत बताते हैं कि पिछले सत्र की तरह इस सत्र में भी सदन बाधित हो सकता है क्योंकि सरकार और विपक्षी दल राजनीतिक रूप से एक दूसरे पर बढ़त हासिल करने का प्रयास करेंगे। अगर ऐसा हुआ तो बहुत निराश करने वाली बात होगी।

बजट सत्र वर्ष 2000 के बाद का सबसे कमजोर संसदीय सत्र था। लोकसभा में उसके निर्धारित समय के 21 फीसदी के बराबर काम हुआ जबकि राज्यसभा का प्रदर्शन थोड़ा बेहतर रहा और उसमें 27 प्रतिशत काम हुआ।

हकीकत में सत्र के दूसरे हिस्से में लोकसभा अपने निर्धारित समय के केवल 4 फीसदी हिस्से में ही संचालित हुई जबकि राज्यसभा 10 प्रतिशत। इसका परिणाम यह हुआ कि साल के सबसे महत्त्वपूर्ण विधान यानी वित्त विधेयक को बिना किसी सार्वजनिक बहस के महज 18 मिनट में पारित कर दिया गया।

इसकी अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 99 केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों तथा 200 से अधिक संशोधनों की बजटीय मांग इससे जुड़ी रहती है। 

दोनों सदनों में गतिविधियां सुचारु रूप से चलें, यह सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है। परंतु संसद तो लगातार बाधित हो रही है। हर लोकसभा के साथ यह एक नया मानक बनता जा रहा है।

विपक्षी दल भी इस मामले में अपनी जवाबदेही से भाग नहीं सकते। इस बीच तेलुगू देशम पार्टी और वाईएसआर कांगे्रस एक बार फिर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के खिलाफ अविश्वास मत लाने के लिए प्रतिबद्घ है।

इससे पहले लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने तमाम तय मान्यताओं के विपरीत जाते हुए अविश्वास मत पर चर्चा को मंजूरी देने से इनकार कर दिया था। उन्होंने भी संभावित व्यवधान को देखते हुए ऐसा किया था।

हाल के दिनों में कई राज्यों में लोगों को जान से मारने की अनेक घटनाएं हुई हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि कांग्रेस मुस्लिम महिलाओं के साथ अनुचित व्यवहार कर रही है। इस बयान को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच वाद-विवाद शुरू हो चुका है।

यह बहस बहुत आसानी से संसद में नए व्यवधान की वजह बन सकती है और उसका विधायी कामकाज एक बार फिर ठप पड़ सकता है। 

कई अहम राजनीतिक और आर्थिक अध्यादेश और विधेयक लंबित हैं जिन पर चर्चा और मंजूरी की आवश्यकता है। तभी शासन कार्य सुचारु रूप से चल सकेगा। इनमें भगोड़ा आर्थिक अपराधी विधेयक, 2018, मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकार का संरक्षण) विधेयक, 2017 और ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया कानून (संशोधन) विधेयक, 2018 आदि प्रमुख हैं।

इसके अलावा भी कई प्रमुख कानून विभिन्न चरणों में हैं। मुद्दा यह है कि बहस के अभाव में इनमें से अधिकांश विधेयक बिना विधायी जवाबदेही के कानून में बदल जाएंगे।

उदाहरण के लिए आपराधिक विधि संशोधन विधेयक, 2018 की बात करते हैं। इस विधेयक के जरिये 12 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार करने वालों को मृत्यु दंड का देने का प्रावधान किया गया है।

इस विधेयक पर व्यापक बहस की आवश्यकता है क्योंकि कई तबके ऐसे हैं जिनका यह मानना है कि यह बलात्कार को रोकने के बजाय बलात्कार करने वालों को पीडि़त की हत्या करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है।

अगर संसद में गंभीर बहस नहीं होती है तो देश में ऐसे कानूनों की संख्या बढ़ती जाएगी जो विशिष्टï तर्क पर आधारित हों। सरकार और विपक्ष को इस दिखावे से दूरी बनानी चाहिए क्योंकि देश के संसदीय लोकतंत्र की प्रक्रिया को यूं स्थगित करने से किसी को कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है। 
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