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विश्व के सामने भारत की बिगड़ती छवि

श्याम सरन /  July 16, 2018

हाल के दिनों में घटी घटनाओं ने देश की जीवंत, बहुलतावादी और सफल लोकतंत्र की छवि को नुकसान पहुंचाया है। यह देश के लिए ही नहीं बल्कि दुनिया भर के संकटग्रस्त लोकतांत्रिक देशों के लिए भी एक झटका है। इस विषय पर बात करना आवश्यक है क्योंकि आम चुनावों में एक वर्ष से भी कम वक्त बचा है और हमारी राजनीतिक और सामाजिक बहस में ध्रुवीकरण और सांप्रदायिकता का मुद्दा उभार पर है।

इतना ही नहीं सोशल मीडिया पर सामग्री के नियंत्रणहीन और अत्यंत तेज प्रसार की वजह से इनका असर कई गुना बढ़ गया है। हम गर्व से कहते हैं कि हम सबसे अधिक सहिष्णु लोग हैं। हमारे यहां विविध आस्थाओं, संस्कृतियों, परंपराओं के लोग, विभिन्न जीवनशैलियों और भाषाओं को बोलने वाले लोग एक साथ रहते हैं। विविधता तो साझेदारी से फलती-फूलती है। परंतु अगर इसे लोगों को एक दूसरे से अलग करने का जरिया बना लिया जाए तो इसे जहर बनने में वक्त नहीं लगता। 

कोई भी व्यक्ति हिंदू-मुस्लिम विभाजन को आधार बनाकर अपनी सशक्त हिंदू पहचान स्थापित करने की कोशिश नहीं कर सकता। अगर एक बार किसी मामले में विभाजन की इस प्रक्रिया को वैधता प्रदान कर दी गई तो इसके बाद इसका सिलसिला शुरू हो जाएगा। आस्था के आधार पर, विभिन्न समुदायों के इतिहास के आधार पर और आहत पहचानों में अभिव्यक्त सामाजिक और आर्थिक समस्याओं में इसका प्रकटीकरण होने लगेगा। लोकतंत्र में हमेशा भिन्नता के लिए जगह होती है, यह लेनदेन की संस्कृति में पनपता है। यह केवल तभी संभव है जब चीजों को काले-सफेद के रूप में देखने के बजाय समझौतों और समन्वय की गुंजाइश हो। ध्रुवीकरण लोकतंत्र को कमजोर करता है। जबकि सांप्रदायिकता तो लोकतंत्र को ही असंभव बना देती है। 

हमें अक्सर पढ़े लिखे मध्यवर्गीय लोग भी यह कहते हुए नजर आते हैं कि मुस्लिम, ईसाई और अन्य गैर हिंदू भारत में रहने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन उन्हें 'हमारी शर्तों' पर रहना होगा। कहने का अर्थ यह कि उन्हें दोयम दर्जे की नागरिकता ग्रहण करने के लिए तैयार रहना चाहिए जो उन्हें बहुसंख्यक समुदाय की उदारता की वजह से हासिल हो। परंतु इसका अर्थ तो यह हुआ कि हम लोकतंत्र और देश के सभी नागरिकों के समान अधिकारों के सिद्घांत को ही ठुकरा देंगे। यह एक अधिनायकवादी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित करने वाली व्यवस्था होगी जो देश के लाखों-करोड़ों लोगों पर एक भेदभाव वाली व्यवस्था थोपेगी।

यह विधि के शासन के भी प्रतिकूल बात है। विधि का शासन देश के हर नागरिक के समान अधिकार पर केंद्रित है। आखिरकार अगर देश का कानून सभी समुदायों को समान दर्जा देता है तो हम या आप किसी एक समुदाय को श्रेष्ठï कैसे ठहरा सकते हैं? ऐसा करने के क्रम में समान अधिकारों की धारणा को त्यागना होगा और पिछले दिनों हमें ऐसा ही कुछ देखने को मिला जब देश के केंद्रीय मंत्रियों ने उन तत्त्वों के प्रति सहानुभूति और समर्थन जताया जिन्होंने अपने और पीडि़तों के बीच अंतर को आधार बनाते हुए उन्हें पीडि़त किया था। वे उन लोगों के साथ 'न्याय' कर रहे थे जिन्हें समाज में अपना स्थान नहीं पता था। यह काफी हद तक श्वेत अमेरिकियों द्वारा अश्वेतों की हत्या जैसा मामला था। 

हर देश को अपनी ऐतिहासिक और वर्तमान उपलब्धियों पर गर्व होता है। ये बताती हैं कि हम कौन हैं और भारतीय होने का क्या अर्थ है। हमारे इतिहास में भी हिंसात्मक झड़पों की कमी नहीं है लेकिन उनको बार-बार दोहराने से एक मजबूत राष्ट्र नहीं बन सकता। जोखिम यह है कि हम अपने इतिहास को सांप्रदायिक बना सकते हैं, एक समुदाय दूसरे समुदाय के खिलाफ हो सकता है और सबके पास अपना इतिहास और अपने नायक होंगे। 

भारत की उपलब्धियों में गर्व करने लायक काफी कुछ है लेकिन हर बात को उचित ऐतिहासिक संदर्भ में पेश करना होगा। उन्होंने यकीनन मानव ज्ञान को समृद्ध करने में भूमिका निभाई है लेकिन उससे श्रेष्ठता का दावा तो सही साबित नहीं होता। दुख की बात है कि प्रभावशाली पदों पर बैठे लोगों में यह साफ नजर आ रहा है और यह देश की विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र की शीर्ष भूमिका को धक्का पहुंचा रहा है। देश के आधुनिक और डिजिटल भविष्य का निर्माण इस आधार पर नहीं किया जा सकता।

राजनीतिक लोकतंत्र की प्रगति सीधे तौर पर तार्किक विचारधारा से जुड़ी हुई है। यह हमारी विरासत का सबसे अहम घटक है। एक बात जो भारत को सदियों से दूसरों से अलग बनाती आई है वह है हमारी जिज्ञासु संस्कृति तथा सवाल पूछने और असहमत होने की काबिलियत। देश को एक आधुनिक और फलता-फूलता लोकतंत्र बनाने के लिए हमें एक बार फिर इन मूल्यों की आवश्यकता है। हां हमें अतीत से कई नकारात्मक और पुरातनपंथी सामाजिक व्यवहार मिले हैं लेकिन हमारा भविष्य उनको खत्म करके आगे बढऩे में ही है। राजनेताओं और राजनीतिक दलों ने अपने फायदे के लिए उन्हें बढ़ावा दिया है जबकि उनके खात्मे पर जोर दिया जाना चाहिए था।

यह सिलसिला कुछ समय से चल रहा है लेकिन अब इसे सामाजिक और राजनीतिक वैधता मिलती दिख रही है। सांप्रदायिक और जातीय पूर्वग्रह हमारे समाज में मौजूद रहे हैं लेकिन उन्हें खुलकर अभिव्यक्त नहीं किया जाता था। इन पर यकीन करने वाले लोग हमेशा से थे लेकिन उनको तवज्जो नहीं मिलती थी। अक्सर उन्हें तार्किक प्रतिरोध का सामना करना पड़ता था। अब इन प्रतिरोधों को हिंसा और धमकी के जरिये खामोश कर दिया जा रहा है।

हमारे देश की प्रतिष्ठा ने हमारे राजनयिकों के काम को बढ़ावा दिया है। हमने अपनी विविधता के साथ आर्थिक प्रगति की है। इस दौरान लोगों की व्यक्तिगत आजादी बरकरार रखी गई है। भारत ऐसा देश है जहां के लोगों का एक गौरवशाली और शालीन अतीत तो है ही, वे वैज्ञानिक चेतना से भी संपन्न हैं। कुछ तत्त्वों की वजह से हमारी प्रतिष्ठा को चोट पहुंच रही है लेकिन मेरा मानना है कि वे देश की वैचारिकी की मुख्यधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करते। परंतु दुनिया तो उन्हीं को सुनती है जो ऊंचा बोलते हैं और उन्हें देखती है जो हिंसा करते हैं। हमें देश के संविधान में निहित मूल्यों और सिद्धांतों पर जोर देते हुए एक प्रबुद्ध भारत की ओर सफर जारी रखना होगा। केवल तभी हम दुनिया के सामने गुण संपन्न विश्वगुरु के रूप में आ सकेंगे।
(लेखक पूर्व विदेश सचिव और सीपीआर के वरिष्ठ फेलो हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।) 
Keyword: democratic, pluralism, polarization, media,
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