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सैन्य सुधार पर पिछड़ गई मोदी सरकार

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  July 15, 2018

हर व्यक्ति कुछ गलतियां करता है लेकिन जानबूझकर दिखाई गई निष्क्रियता के लिए यह दलील नहीं इस्तेमाल की जा सकती। उपलब्ध अवसर को गंवाना एक बड़ी चूक है। मोदी सरकार देश के सैन्य और रक्षा ढांचे में बुनियादी सुधार लाने का अवसर गंवा रही है। देश में 30 साल बाद किसी सरकार को पूर्ण बहुमत मिला, उसके पास एक मजबूत नेता है जिसकी छवि सेना के साथ मित्रवत होने की है। अवसर था कि वह दशकों से लंबित इन सुधारों को अंजाम देते लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पिछली सरकारों को दोष देने का कोई अर्थ नहीं है। उनके पास न तो बहुमत था, न समय और न ही राजनीतिक पूंजी थी। बीते 30 सालों में किसी सरकार के पास ये तीनों चीजें एक साथ नहीं थीं। यही वजह है कि मोदी सरकार से इतनी अपेक्षा की जा रही थी। शासन के किसी अन्य क्षेत्र में यह सरकार इस तरह विफल नहीं रही जैसे कि रक्षा क्षेत्र में।

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इस सरकार के पास यह अवसर था कि वह दुनिया की चौथी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति में क्रांतिकारी बदलाव लाती और उसे एक आधुनिक सेना में तब्दील करती। परंतु हमारी सेना आज भी एकदम आधारभूत इन्फैंट्री राइफल और सैनिकों के लिए अच्छे जूतों की जद्दोजहद में लगी है। वायु सेना की बात करें तो उसके उन जगुआर विमानों को उन्नत किया जा रहा है जो 40 वर्ष पहले वायु सेना में शामिल किए गए थे। सैन्य उपकरणों की कमी महत्त्वपूर्ण है लेकिन उससे बड़ा नुकसान है ढांचागत सुधारों के अवसर को गंवा दिया जाना। चीन ने भारत से एक उलझाऊ प्रश्न करके इस बात को अत्यंत क्रूरतापूर्वक रेखांकित किया। उसने कहा: हमें पता है हमारी ओर से हॉटलाइन पर कौन होगा, यकीनन पूर्व से पश्चिम और मध्य तक एक ही व्यक्ति यानी हमारा थिएटर कमांडर होगा। आपकी ओर से उसका समकक्ष कौन होगा?
 
इसे समझिए। भारत का सामना करने वाले हर सैन्य बल के लिए एक कमांडर नियुक्त किया है। इन सभी बलों के कमांडर एक ही व्यक्ति और एक ही मुख्यालय को रिपोर्ट करते हैं। वहीं दूसरी ओर भारत के मामले में काफी वैविध्य है। 21वीं सदी में ऐसा होना एक तरह की सैन्य शर्मिंदगी है। अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम-भूटान क्षेत्र में पूर्वी सैन्य कमांडर प्रभारी हैं। उत्तराखंड में केंद्रीय सैन्य कमांडर। हिमाचल-तिब्बत सीमा का प्रभार पश्चिमी सैन्य कमांडर के पास और कश्मीर तथा लद्दाख का प्रभार उत्तरी सैन्य कमांडर के पास है। जाहिर सी बात है इनके अलावा वायु सेना और नौसेना भी हैं। 
 
जाहिर है कम से कम आठ तीन सितारा कमांडर एक चीनी कमांडर से मुकाबिल होंगे। आधुनिक सेनाएं ऐसे नहीं चलतीं। यह तो सन 1962 की याद दिलाने वाली शैली है। यही वजह है कि पिछले दिनों द प्रिंट के सुरजन दत्ता ने रिपोर्ट की कि हॉटलाइन का मसला प्रोटोकॉल में उलझ गया है। चीनी थिएटर कमांडर से बात कौन करेगा क्योंकि 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा पर दिक्कतें पैदा होती रहती हैं। भारत की ओर से अगर यह सैन्य मुख्यालय स्थित सैन्य महानिदेशक हैं तो दोनों सेनाओं के बीच प्रोटोकॉल समानता का मसला उलझ जाता है। क्या हमारी पूरी सेना का डीजीएमओ चीन के एक थिएटर कमांडर से बात करेगा? मामला केवल प्रोटोकॉल का नहीं है और यह कोई मजाक भी नहीं। आधुनिक युद्घकला पूरी तरह गति, क्रियान्वयन, गतिशीलता, लड़ाकू क्षमता और एकीकृत कदमों से संबंधित है। हमारा आधारभूत सैन्य ढांचा ब्रिटिश से विरासत में मिला ढांचा है। इसमें क्षेत्रीय कमांड की भूमिका है। मैं हकीकत से तब दोचार हुआ जब मेरी बातचीत पूर्व नौसेना प्रमुख और बेहतरीन सैन्य समझ वाले एडमिरल अरुण प्रकाश से हुई। उन्होंने बताया कि कैसे अगर डोकलाम में कोई समस्या हुई तो पांच सैन्य कमांड इसमें शामिल होंगी। जबकि चीन की सेना एक कमांड से संचालित होती है। क्या हम ऐसी अराजकता बरदाश्त करने की स्थिति में हैं? खासकर अब जबकि युद्घ अपेक्षाकृत छोटे और तीखे हो सकते हैं?
 
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि कैसे भारतीय सेना अब 19 कमांड में विभाजित हैं। इनमें से किन्हीं भी दो का उद्देश्य एक नहीं है और न ही वे एक साथ स्थापित हैं। सेना का कोई विद्यार्थी भी इस अतार्किकता पर ठहर कर सोचेगा।  कुछ उदाहरण लेते हैं। कोलकाता स्थित पूर्वी सैन्य कमांड चीन, बांग्लादेश, भूटान और म्यांमार की सीमा संभाल रही है। इसके अलावा पूर्वोत्तर के अशांत इलाके भी उसी के हवाले हैं। पूर्वी वायु सेना कमांड जिसे उसके साथ तालमेल रख कर काम करना चाहिए, वह ऐसी जगह पर है जहां कभी हवाई पट्टïी नहीं रही न ही होगी। यह इलाका है ऊपरी शिलॉन्ग का खूबसूरत हराभरा क्षेत्र। कोलकाता और शिलॉन्ग के बीच उड़ान भरने के लिए बांग्लादेश के आकाश पर उडऩा जरूरी है। इसे कोलकाता के बजाय शिलॉन्ग में क्यों रखा गया है? वहीं पूर्वी नौसैनिक कमांड भी दक्षिण में विशाखापत्तनम में है।
 
पूर्वी क्षेत्र का उदाहरण चौंकाने वाला हो सकता है लेकिन यह कोई विसंगति नहीं है। पश्चिमी सैन्य कमांड चंडीगढ़ के करीब चंडी मंदिर में स्थित है जबकि उसकी सहयोगी पश्चिमी वायुसेना कमा दिल्ली में है। ऐसा क्यों है? वायुसेना प्रमुख का मुख्यालय और उसकी सबसे बड़ी कमांड एक ही शहर में पांच मील की दूरी पर क्यों हैं, इसका जवाब भी शायद ब्रिटिशों से ही पूछना होगा? मैं यकीन से कह सकता हूं कि सेना, नौसेना और वायुसेना की कमांड ने एक दूसरे के मुख्यालयों के अधिकारियों से मेलजोल रखा होगा लेकिन वह कमांडरों के एक साथ मिलकर काम करने का मुकाबला नहीं कर सकती। पूरी सूची का जिक्र करने का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि बार-बार यही दोहराव नजर आएगा। दक्षिणी सैन्य कमांड पुणे में है जबकि उसका परिचालन क्षेत्र गुजरात-राजस्थान के उस रेतीले इलाके में है जो पाकिस्तान से लगा हुआ है। उसके साथ काम करने वाली वायुसेना की दक्षिणी-पश्चिमी कमांड गांधीनगर में है। दक्षिणी वायुसैनिक कमांड तिरुवनंतपुरम में है लेकिन उसका दायरा पूरे प्रायद्वीपीय क्षेत्र में है। सेना की दक्षिण-पश्चिमी कमांड जयपुर में है और उसकी अनुपूरक वायुसेना दिल्ली (पश्चिम) और गांधीनगर (दक्षिण-पश्चिम) में है। कभी-कभी तो इलाहाबाद स्थित मध्य कमांड भी काम आती है। अगर आप पूरी सूची देखेंगे तो आप पाएंगे कि कोई दो कमांड एक साथ या एक उद्देश्य के लिए तैनात नहीं हैं। अंडमान में स्थित तीनों सेनाओं की कमांड ऐसी है या फिर दिल्ली मुख्यालय की एकीकृत कमांड। 
 
इन सब बातों के बीच ही पहले से ही क्षमता से परे काम कर रही पूर्व सैन्य कमांड के अधीन माउंटेन स्ट्राइक कोर के गठन की योजना बनाई गई और अब उसे स्थगित कर दिया गया है। यह अच्छी बात है कि द प्रिंट के खुलासे के बाद रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले सप्ताह संवाददाता सम्मेलन आयोजित किया और कहा कि निर्णय सेना पर छोड़ दिया गया है। अगर ऐसा है तो मेरा मानना है कि सेना प्रमुख ने हिम्मत और समझदारी दिखाई है और बेतुके विस्तार के बजाय समझदारीपूर्वक मजदूरी हासिल करने को तवज्जो दी है। मूल ढांचागत मसलों को लेकर उनकी प्रतिक्रिया और अहम है। 
 
उन्होंने कहा कि सरकार संयुक्त थिएटर कमांड के विचार के पक्ष में है। हमने इससे पहले ऐसा कब सुना था? पिछली सरकारों के पास ऐसा करने के लिए जरूरी राजनीतिक पूंजी नहीं थी लेकिन मोदी सरकार को चार साल के दौरान किसने रोका?  थिएटर कमांड आधारित पुनर्गठन और संयुक्तीकरण प्रधानमंत्री के दिल के बहुत करीब हैं। जैसा कि अब रक्षा मंत्री भी कह रही हैं कि यह बहुत अच्छा विचार है। परंतु सरकार ने इसमें अब तक अनावश्यक देरी की। मंत्री का कहना है कि इसमें समय लग रहा है क्योंकि सरकार छोटे लक्ष्य निर्धारित करके आगे बढऩा पसंद करती है। ऐसे में यह काम चार साल पहले शुरू हो जाना चाहिए था। आंतरिक थिंक टैंक स्थापित कर कार्यान्वयन आरंभ कर देना था। आखिर देश की सेना की इन समस्याओं के बारे में जानकारी तो पहले से थी। विरोधी अब कह सकते हैं कि मोदी सरकार ने ढेर सारे वादे किए लेकिन अवसर गंवा दिया। सरकार उस क्रिकेट टीम की तरह व्यवहार कर रही है जिसने पावर प्ले गंवा दिया और आखिरी ओवरों में हड़बड़ाई हुई है।
Keyword: defense, military, aircraft, BJP,,
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