बिजनेस स्टैंडर्ड - दो फॉर्म 16 हों तो आयकर रिटर्न दाखिल करना पेचीदा
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दो फॉर्म 16 हों तो आयकर रिटर्न दाखिल करना पेचीदा

तिनेश भसीन /  July 15, 2018

अगर आपने पिछले वित्त वर्ष में नौकरी बदली है तो आपके लिए आयकर रिटर्न दाखिल करना कुछ पेचीदा हो सकता है। जब दो संस्थाओं में नौकरी की है तो आपके पास फॉर्म 16 भी दो ही होंगे। एक फॉर्म 16 उस संस्था से मिला होगा, जहां आप पहले नौकरी करते थे और दूसरा फॉर्म 16 उस संस्था से मिला होगा, जहां आपने नई नौकरी शुरू की है।  इस मामले में दिक्कत यह होती है कि अक्सर नए नियोक्ता कर्मचारी का फॉर्म 16 तैयार करते समय यह ध्यान नहीं रखते कि पुरानी संस्था से उसे कितनी आय हुई थी और वहां कितना कर काटा जा चुका है। ऐसे में सारा सिरदर्द कर्मचारी यानी आप के मत्थे आ जाता है। आपको रिटर्न दाखिल करने से पहले दोनों फॉर्म 16 एक साथ रखने होंगे, दोनों का मिलान करना होगा, कुल आय निकालनी होगी। देखना होगा कि उस आय में से आपको कितनी कर छूट मिलती है, उसके बाद कितना कर बनता है, कितना कर वसूला जा चुका है और कुछ बकाया तो नहीं रह गया है।

 
हरेक नियोक्ता अपने कर्मचारियों को फॉर्म 16 होता है। फॉर्म 16 में उस कर्मचारी का पूरा वित्तीय ब्योरा होता है। उसमें पूरे वित्त वर्ष के दौरान कर्मचारी को कंपनी से हुई आय का ब्योरा तो होता ही है, यह भी बताया जाता है कि कर्मचारी का स्रोत से कितना कर काटा गया और उसने कितनी कर छूट के लिए दावा किया है। अगर नया नियोक्ता यह नहीं देखता है कि पुराने नियोक्ता ने इन्हीं मदों में क्या-क्या लिख रखा है या कितना कर काटा है तो कर्मचारी पर कर की देनदारी बन सकती है। उस सूरत में कर्मचारी को खुद दोनों फॉर्म 16 की बारीकियों में जाना पड़ेगा और खुद ही हिसाब-किताब लगाना होगा कि उसकी कितनी कर देनदारी बनती है। इसी तरह अगर नए नियोक्ता ने यह नहीं देखा है कि आयकर अधिनियम की धारा 80 सी के तहत मिलने वाली छूट के एवज में कर्मचारी पिछले नियोक्ता से कितनी कर छूट ले चुका है तो कर्मचारी को एक ही मद में दो बार कर छूट मिल सकती है। 
 
उस स्थिति में रिटर्न दाखिल करते समय कर्मचारी यानी आप को ही दोनों फॉर्म 16 का मिलान करना होगा और देखना होगा कि आपको आखिर में कितना कर चुकाना है। जब एक से ज्यादा फॉर्म 16 होते हैं तो अच्छा तो यही होता है कि करदाता दोनों को सामने रखकर आय का संशोधित यानी एकदम नया लेखाजोखा तैयार करे। एचऐंडआर ब्लॉक इंडिया के कर अनुसंधान प्रमुख चेतन चंडक की सलाह है, 'ऐसा करना जरूरी है क्योंकि हो सकता है कि आपका नया नियोक्ता केवल उसी वेतन को ध्यान में रखकर चल रहा हो, जो उसने आपको दिया है और ऐसे में हो सकता है कि वह कर भी उसी हिसाब से कम काट रहा हो। अगर केवल नए वेतन का खयाल रखा गया होगा तो आपका कर स्लैब भी बदल सकता है।' मान लीजिए किसी व्यक्ति को हर महीने 50,000 रुपये बतौर वेतन मिलते हैं। वित्त वर्ष के पहले छह महीने तक उस संस्था में काम करने के बाद वह नई जगह नौकरी कर लेता है, जहां उसे हर महीने 60,000 रुपये का वेतन मिलता है। अब पहला नियोक्ता कुल 3 लाख रुपये के भुगतान को ही उसकी सालाना आय मानेगा और उसी पर कर काट लेगा। इसी तरह दूसरा नियोक्ता उसे दिए गए 3.60 लाख रुपये को सालाना वेतन मानकर कर काटेगा। चूंकि 3 लाख रुपये और 3.60 लाख रुपये की आय अन्य कर छूट के बाद बहुत कम रह जाएगी, इसलिए हो सकता है कि उस पर आयकर काटा ही नहीं जाए। मगर उस वयक्ति को पता होना चाहिए कि उसकी कुल सालाना आय 6.60 लाख रुपये रही है, जिसकी वजह से वह व्यक्ति 20 फीसदी आयकर कटौती की श्रेणी में आ जाता है और उसी के हिसाब से उसकी कर देनदारी भी बनेगी।
 
कर देनदारी आंकने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि वित्त वर्ष के दौरान जहां भी नौकरियां की गई हैं, उन सभी से हुई आय को एक साथ जोड़ दिया जाए। अब इसमें से तमाम तरह के भत्ते मसलन आवास किराया भत्ता और यात्रा भत्ता आदि को काट दिया जाए क्योंकि इनमें आयकर पर छूट मिलती है। इसमें यह देखना जरूरी होता है कि छूट का दावा कहीं दो बार तो नहीं कर दिया गया है। उसके बाद देखिए कि करदाता किस आयकर स्लैब में आ रहा है और उसी स्लैब के हिसाब से उसके आयकर की गणना कर ली जाए। अब दोनों फॉर्म 16 देखकर पता लगाया जाए कि नियोक्ताओं ने वित्त वर्ष के दौरान कुल कितना आयकर काटा है। पिछली गणना में जो आयकर आया है, उसमें से काटा गया आयकर घटा दिया जाए। अब जो आंकड़ा बचेगा, वही करदाता की बाकी देनदारी होगी।
 
टैक्समैन डॉट कॉम में महाप्रबंधक नवीन वाधवा कहते हैं, 'इस पूरी कवायद के लिए अपनी सैलरी स्लिप का इस्तेमाल भूलकर भी न करें क्योंकि हो सकता है कि उसमें विभिन्न प्रकार की कर छूट और कर कटौती का जिक्र ही नहीं हो। नियोक्ताओं के लिए फॉर्म 16 देना भी जरूरी होता है। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो उनके कर्मचारी कर विभाग के पास शिकायत कर सकते हैं।' अगर आप आयकर की वेबसाइट पर जाकर ई-फाइलिंग के जरिये खुद ही अपना रिटर्न दाखिल करने की योजना बना रहे हैं तो सबसे पहले आपको देखना होगा कि आपके लिए सही आयकर रिटर्न फॉर्म कौन सा है। सही फॉर्म चुनिए, उसमें अपने नाम और पते जैसे सामान्य ब्योरे को भी गलती किए बगैर भरिए। उसके बाद आपसे आपकी आय का ब्योरा मांगा जाएगा। वहां वेतन से हुई समूची आय लिख दीजिए। उसमें दोनों कंपनियों से मिला वेतन भरिए और दोनों कंपनियों का जिक्र भी कीजिए। इसके बाद बताइए कि आपने धारा 80 सी के तहत और दूसरे किस-किस मद में कर छूट का दावा किया है। जैसे ही आप इसे भरेंगे, आयकर वेबसाइट खुद-ब-खुद गणना कर बता देगी कि आपका कितना आयकर बनता है।
 
इसके बाद आप अगले पेज पर पहुंचेंगे, जहां लिखा होगा कि आपके वेतन में से स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) के रूप में कितना कर काटा जा चुका है। यदि नए नियोक्ता द्वारा काटे गए टीडीएस का ब्योरा इसमें नहीं है तो आपके पास उसे जोडऩे का विकल्प मौजूद होगा। सब जुडऩे के बाद आपके सामने कुल काटे गए कर का आंकड़ा होगा। यदि यह सही आंकड़ा है तो आपको इसका सत्यापन करना होगा। उसके साथ ही यह भी दिया होगा कि आपको कर की कितनी रकम बतौर रिफंड वापस मिलनी है या आपको कितना बकाया कर और चुकाना है। अंत में आप फॉर्म 26 एएस का इस्तेमाल करें ताकि आप जान सकें कि आपका हिसाब-किताब आयकर रिकॉर्ड के मुताबिक है या नहीं। 
 
अगर आपको यह प्रक्रिया बहुत झंझट भरी या उबाऊ लग रही है तो आप ऑनलाइन कर रिटर्न दाखिल कराने वाली वेबसाइट की सेवा भी ले सकती हैं। अगर कई फॉर्म 16 होते हैं तो ये वेबसाइट खुद ही उनकी तुलना कर लेती हैं और बता देती हैं कि कुल कितना कर बनता है।
Keyword: ITR, form 16, income tax, CBDT, आयकर विभाग कराधान,
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