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गडकरी के आत्मविश्वास की वजह है कुछ खास

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  July 13, 2018

केंद्रीय सड़क एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी भारतीय जनता पार्टी के उन दो नेताओं में से एक हैं जिन्होंने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के समर्थन में अपनी आवाज बुलंद की। दूसरे नेता गृहमंत्री राजनाथ सिंह हैं। सुषमा पर भाजपा के समर्थक हमलावर हो गए थे क्योंकि पासपोर्ट का आवेदन करने वाले एक हिंदू-मुस्लिम जोड़े से असहज और शर्मिंदा करने वाले प्रश्न पूछे जाने पर उन्होंने दखल दिया था और संबंधित पासपोर्ट अधिकारी का तबादला कर दिया गया था।  अधिकारी ने तन्वी सेठ नामक महिला से उसके निकाहनामे में लिखे नाम के बारे में सवाल पूछे। उसने यह भी पूछा कि उन्होंने मोहम्मद अनस सिद्दीकी नामक व्यक्ति से शादी क्यों की और क्यों उनके पासपोर्ट में उनके विवाहोपरांत नाम का जिक्र नहीं है। 

 
एक बात तो यह है कि पासपोर्ट प्राप्त करने के लिए निकाहनामा की कोई आवश्यकता नहीं होती है और दूसरी यह कि एक स्त्री ऐसा कोई भी नाम रख सकती है जिसके दस्तावेजी प्रमाण उसके पास हों। खबरों के मुताबिक अधिकारी ने महिला से परेशान करने वाले सवाल किए। जब सेठ ने अपनी परेशानी को लेकर सुषमा को ट्वीट किया तो उस समय सफर पर होने के बावजूद उन्होंने तुरंत कदम उठाया। गडकरी ने इस मामले में सुषमा का पक्ष लिया लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर अपनी मंत्री के खिलाफ की जा रही गाली गलौज या उनके अपमान पर कोई टिप्पणी नहीं की। वह भी तब जबकि उन्होंने एकदम उचित कदम उठाया था। 
 
गडकरी ने ऐसा क्यों किया होगा? क्या इस बात का संबंध इस बात से भी है कि उनका नाम इन दिनों सुर्खियों में है। कहा जा रहा है कि अगर वर्ष 2019 के आम चुनाव में भाजपा को कम सीटें मिलती हैं तो वह प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं।  गडकरी नागपुर के रहने वाले हैं जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का मुख्यालय भी है। वह महाराष्ट्र विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष रह चुके हैं। उन्हें वोट जुटाने की क्षमता के लिए नहीं जाना जाता है, हालांकि सन 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने नागपुर से कांग्रेस के विलास मुत्तेमवार को भारी मतों से पराजित किया था। इससे पहले भाजपा को नागपुर से केवल एक बार सन 1996 में जीत मिली थी जब बनवारीलाल पुरोहित ने बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष एस के वानखेड़े की बेटी और कांग्रेस उम्मीदवार कुंदा विजयकर को पराजित किया था। विजयकर हैं। पुरोहित मूल रूप से कांग्रेस से ही ताल्लुक रखते थे और इस सीट से पहले कांग्रेस के सांसद रह चुके थे। इसके अलावा भाजपा ने इस क्षेत्र की सभी विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की। एक सीट मौजूदा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की भी थी। 
 
गडकरी ने करियर की शुरुआत लोक निर्माण विभाग के छोटे से ठेकेदार के रूप में की। आगे चलकर उन्होंने कई कंपनियां स्थापित कीं। महाराष्ट्र के जनजातीय इलाकों में सड़क बनाते हुए उन्होंने उनके जीवन को करीब से देखा और वह यह स्वीकार कर चुके हैं कि उन्हें नक्सलियों से लगाव रहा है। उस वक्त सरकार के साथ उनका अनुभव सही नहीं था। दुनिया को देखने का उनका नजरिया उसी से संचालित हुआ। अगर आप एक अफसरशाह हैं और वह मंत्री हैं तो उन्हें न कहना जोखिम भरा होता है क्योंकि अपने अनुभव से वह जानते हैं कि अफसरशाही कितने गतिरोध पैदा कर सकती है। 
 
एक ठेकेदार और कारोबारी के रूप में अपने करियर के दौरान ही उन्होंने महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में सहकारिता की जटिल दुनिया को करीब से देखा। आमतौर पर ये सोसाइटी पूंजी की कमी से दो चार रहती थीं। यही वजह थी कि वहां सहकारिता का प्रयोग परवान नहीं चढ़ पा रहा था। गडकरी ने इस क्षेत्र में सहकारिता की शुरुआत की। वह पूर्ति नामक कंपनी समूह के अध्यक्ष हैं। यह कंपनी निर्माण और फर्नीचर तथा खुदरा सुपर बाजार के क्षेत्र में काम करती है।  सन 1995 में गडकरी लोक निर्माण विभाग के मंत्री बने। उन्होंने टै्रफिक सर्वे की शुरुआत के जरिये बीओटी (बिल्ड ऑपरेट ट्रांसफर) परियोजनाओं में वैज्ञानिक प्रणाली लागू की, आंतरिक प्रतिफल दर निकाली, और टोल नाकों की रियायत की अवधि तय की। उन्होंने महाराष्ट्र सरकार से तत्कालीन नियमों में बदलाव कराए और शंकाओं के बीच एक नई टोल नीति तैयार की। 
 
सन 2002 में जब उन्हें निर्विरोध उच्च सदन के लिए चुना गया तो कई लोगों के दिल जले। उन्हें इस बात पर गर्व था कि उन्होंने विपक्ष में कई मित्र बनाए। इनमें ठाकरे के धड़े के लोग और कांग्रेस नेता विलासराव देशमुख भी शामिल थे। परंतु महाराष्ट्र भाजपा का एक हिस्सा मानता था कि उन्होंने राजनीतिक समझौते किए हैं। वे कहते कि उन्होंने अवसर मिलने पर भी तत्कालीन सरकार को दबोचने का पर्याप्त उत्साह नहीं दिखाया। यह भी कहा गया कि इसी के चलते 2002 में किसी ने उनका विरोध नहीं किया। चाहे जो भी बात हो लेकिन गडकरी को ऐसा राजनेता माना जाता है जिसे विकास और राजनीति के संबंधों की समझ है। भाजपा अध्यक्ष के रूप में उनका कार्यकाल भ्रष्टïाचार के आरोपों के चलते सीमित रहा। हालांकि वे आरोप कभी साबित नहीं हुए। इनमें से अधिकांश आरोप उनकी पार्टी के साथियों की ही देन थे। जब उन्हें सड़क मंत्रालय सौंपा गया तो उन्होंने जिस उत्साह और गति से काम किया उसका मुकाबला कम ही मंत्री कर सकते हैं। उन्हें बेहतरीन प्रदर्शन वाला मंत्री माना जाता है।  ये तमाम बातें गडकरी को यह आत्मविश्वास प्रदान करती हैं कि वह सही बात के लिए बोलें। इस बात के लिए उनका समर्थन बनता है।
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