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म्युनिसिपल बॉन्ड बाजार के लिए जरूरी व्यापक सुधार

श्यामल मजूमदार /  July 13, 2018

धन जुटाने के लिए म्युनिसिपल बॉन्ड एक बढिय़ा जरिया हो सकते हैं लेकिन इस दिशा में दिक्कतें कम नहीं हैं। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं श्यामल मजूमदार

 
बाजार में म्युनिसिपल बॉन्ड की वापसी एक स्वागतयोग्य कदम है। मध्य प्रदेश पिछले दिनों नैशनल स्टॉक एक्सचेंज पर अपने म्युनिसिपल बॉन्ड को सूचीबद्ध कराने वाला पहला राज्य बना। इंदौर नगर निगम की तरफ से जारी किए गए इन बॉन्ड के प्रति बाजार की प्रतिक्रिया अच्छी रही। बॉन्ड खरीद के लिए 1.26 गुना अधिक आवेदन मिले जिससे इंदौर नगर निगम को 140 करोड़ रुपये मिल गए। इससे उत्साहित मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने यह ऐलान किया कि ग्वालियर, भोपाल और जबलपुर शहरों के निगम भी इसी राह पर चलते हुए  200-200 करोड़ रुपये के बॉन्ड जारी करेंगे।
 
मध्य प्रदेश की वाणिज्यिक राजधानी कहे जाने वाले इंदौर की तरफ से जारी 10 साल की परिपक्वता अवधि के इस बॉन्ड में 9.25 फीसदी ब्याज की पेशकश की गई थी। ऐसे संकेत हैं कि देश के अन्य हिस्सों में भी कुछ नगर निगम जल्द ही दस्तक देंगे ताकि अपनी ढांचागत विकास गतिविधियों के लिए फंड जुटाया जा सके।  बैंकों से धन जुटाने की सुस्त रफ्तार को देखते हुए म्युनिसिपल बॉन्ड एक बढिय़ा जरिया होगा। मूडीज का भी कहना है कि बहुल-बॉन्ड बाजार सशक्त होने से स्थानीय निकायों की पूंजी का विश्वसनीय प्रवाह हासिल करने की क्षमता में सुधार होगा और उधारी में उनकी जवाबदेही भी बढ़ेगी। शहरी स्थानीय निकायों में उधारी जुटाने का प्रत्यक्ष एवं अधिक पारदर्शी मॉडल अपनाने से केंद्र सरकार स्थानीय निकायों को दिए जाने वाले कर्ज की बेहतर निगरानी भी कर सकेगा।
 
सवाल यह है कि क्या ऐसा हो पाएगा? भारत के म्युनिसिपल बॉन्ड बाजार के बारे में व्याप्त निराशावाद की एक वजह यह है कि ऐसे बॉन्ड जून 2017 के बाद से करीब बंद ही हो गए हैं। पिछले साल जून में पुणे ने म्युनिसिपल बॉन्ड के जरिये धन जुटाया था। उसके बाद हैदराबाद ही इकलौता ऐसा नगर निगम रहा है जिसने फरवरी 2018 में अपने बॉन्ड के जरिये 200 करोड़ रुपये जुटाए थे।  असल में भारत में अभी तक 14 शहरी निकायों की तरफ से केवल 30 म्युनिसिपल बॉन्ड ही जारी किए गए हैं और इस दौरान केवल 1,500 करोड़ रुपये ही जुटाए जा सके हैं। 
 
इसकी कई वजहें रही हैं। बुनियादी वजह नगर निकाय सुधारों के अमल की धीमी गति रही है। इसके चलते भारत में शहरों के नवीनीकरण की महत्त्वाकांक्षी योजनाएं कमजोर वित्त व्यवस्था की रेतीली जमीन पर ही बनाई जाती रही हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में सभी नगर निगमों की कुल राजस्व प्राप्तियां 1.5 लाख करोड़ रुपये से भी कम रहने का अनुमान है। ऐसी स्थिति में नगर निकाय राज्य और केंद्र से मिलने वाले अनुदानों पर अधिक आश्रित होते जा रहे हैं। मसलन, बेंगलूरु नगर निगम कुल निर्मित क्षेत्र के केवल एक चौथाई पर ही करारोपण करता है जबकि सूरत केवल 11 फीसदी इमारतों से ही संपत्ति कर की वसूली कर पाता है। 
 
अध्ययनों से पता चला है कि नगर निकायों की वित्तीय संरचना में 'अपने राजस्व' की अहमियत कम हुई है, ऐसा नहीं है कि निकायों के केवल अपने राजस्व का हिस्सा घटा है बल्कि अन्य राजस्व घटकों की तुलना में उनकी वृद्धिï दर में भी गिरावट आई है। इसका नतीजा यह हुआ है कि विभिन्न राज्यों में निकायों को अलग राजकोषीय पहचान बनाए रखने में भी काफी जोखिम का सामना करना पड़ रहा है। निकायों के अपने साधनों से जुटाए राजस्व का मजबूत होना कर्ज जुटाने की अर्हता की एक पूर्व-शर्त है। ऐसे में निकायों के पास स्थानीय करों के संग्रह, उपभोग शुल्क और स्टांप शुल्क जैसे मुश्किल नीतिगत मुद्दों से जूझने के सिवाय कोई रास्ता नहीं रह जाता है। बॉन्ड निवेशक उस समय तक शहरों में अपने पैसे लगाने से बचना चाहेंगे जब तक उनकी राजस्व स्थिति को लेकर वे आश्वस्त नहीं हो जाते हैं।
 
म्युनिसिपल बॉन्ड के लिए आगे की राह निश्चित रूप से कठिन रहेगी। मसलन, क्रिसिल ने बॉन्ड जारी कर पाने की शहरों की तैयारी परखने के सिलसिले में 14 राज्यों में 94 शहरों की क्रेडिट रेटिंग की। उनमें से केवल 55 शहरों को ही निवेश के अनुकूल रेटिंग मिली जबकि बाकी शहर निवेश स्तर से नीचे पाए गए। यह रेटिंग शहरों का सामाजिक एवं आर्थिक विवरण, परिचालन सक्षमता, नीतिगत ढांचा और तात्कालिक वित्तीय आंकड़ों जैसे कई मानदंडों के आधार पर दी गई। मूडीज का कहना है कि यह राजस्व मोर्चे पर निगमों के प्रदर्शन, कर्ज और आकस्मिक देनदारियों के बारे में सीमित जानकारी मुहैया होने का परिणाम है। इस सूची में कमजोर शासन को भी जोड़ लीजिए। आखिरकार, निवेशकों को आश्वस्त होने की जरूरत है कि म्युनिसिपल बॉन्ड का भुगतान करने के लिए निकायों के पास समुचित राजस्व प्रवाह होगा।
 
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने वर्ष 2015 में इस तरह के बॉन्ड जारी करने से जुड़े नियमों को शिथिल किया था लेकिन वित्तीय आंकड़ों की समयबद्ध जानकारी को अनिवार्य भी कर दिया था। यह प्रावधान इसलिए अहम है कि अधिकांश नगर निगम अपने खाते को सार्वजनिक नहीं करते हैं। लेकिन इन नियमों का धीमा अनुपालन न्यूनतम खुलासा मापदंडों का पालन करने में पेश आने वाली अहम चुनौतियों को परिलक्षित करता है। इस प्रावधान को अनिवार्य किए जाने से निवेशक जानकारी संबंधी अवरोधों से निजात पा सकते हैं। अगर शहरी निकाय बॉन्ड नहीं जारी करते हैं तो भी वे कम-से-कम राजकोषीय अनुशासन ला सकेंगे। 
 
खराब रेटिंग वाले नगर निगमों को संयोजित वित्त के माध्यम से बॉन्ड बाजार से जोड़ा जा सकता है। संयोजित वित्त का मतलब है कि खराब रेटिंग वाले कई निकाय एक साथ मिलकर एक बॉन्ड जारी करें और सामूहिक रूप से जुटाए राजस्व से उनका भुगतान करें। निवेशकों को इस बात से राहत महसूस हो सकती है कि राजस्व के कई स्रोत हैं। इन सभी बातों को अंजाम देने के लिए शहरी निकायों को नेताओं के चंगुल से आजाद कराने की जरूरत है। सीधे जनता ही अपने शहर का मेयर चुने और उसका कार्यकाल पांच साल के लिए तय कर दिया जाए तो ऐसा हो सकता है। ऐसा मेयर शहरी प्रशासन का निर्विवाद नेता होगा, निगम पार्षदों के समर्थन का मोहताज नहीं।
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