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फुटबॉल विश्व कप ने दिखाई बहु-सांस्कृतिक शक्ति

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  July 12, 2018

अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप जब अगले हफ्ते फुटबॉल विश्व कप के आयोजक देश रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन से मिलेंगे तो बातचीत के दौरान अपने छोटे बेटे बैरन के फुटबॉल प्रेम का शायद ही जिक्र करें। अगर उन्होंने बीते मंगलवार को विश्व कप के पहले सेमीफाइनल मैच को देखा होता तो उन्हें महज 90 मिनट में ही यह दिख गया होता कि खुली सीमाएं एवं भूमंडलीकरण से क्या कुछ हासिल हो सकता है? रूस में खेले जा रहे फीफा विश्व कप के मुकाबलों को सरसरी तौर पर देखने वालों को भी अब तक दो बातों का अहसास हो ही चुका होगा। पहला, यूरोपीय फुटबॉल का दुनिया के अन्य हिस्सों पर दबदबा और दूसरा, इस खेल की गतिशील बहुराष्ट्रीय एवं बहु-सांस्कृतिक प्रकृति। 

 
फुटबॉल के मैदान से निकले इस बहु-सांस्कृतिक संदेश से आनंदित होने वालों में फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रॉन से अधिक कोई नहीं है। बेल्जियम के खिलाफ फ्रांस को 1-0 से मिली शानदार जीत के बाद मैक्रॉन के दिल खोलकर खुशी मनाने की तस्वीरों ने दुनिया भर में बैठे 2 अरब से अधिक टेलीविजन दर्शकों को आह्लïादित कर दिया। खास बात यह है कि फ्रांस और बेल्जियम दोनों ही टीमों में कई खिलाड़ी ऐसे हैं जो गैर-यूरोपीय पृष्ठभूमि के हैं। फीफा विश्व कप का मुकाबला देखने के लिए 40 वर्षीय मैक्रॉन ने पेरिस के आसपास के कस्बों से सैकड़ों युवाओं को अपने आधिकारिक आवास एलिसी पैलेस में आमंत्रित किया था। मैक्रॉन ने युवाओं को अपने आवास पर फुटबॉल मैच देखने का न्योता देकर सदाशयता दिखाई। फ्रांसीसी टीम की युवा सनसनी किलियन एम्बापे की जड़ें कैमरून एवं अल्जीरिया से जुड़ी हुई हैं। वह पेरिस की तंग गलियों में खेलते हुए बड़े हुए हैं लेकिन इस विश्व कप में उन्होंने अपने शानदार खेल से सारी दुनिया का ध्यान आकृष्टï किया है। एम्बापे पेरिस सेंट जर्मेन क्लब की ओर से खेलते हैं जिसका मालिकाना हक कतर स्पोट्र्स इन्वेस्टमेंट्स के पास है। यह खेल कंपनी खाड़ी देश कतर के शासक परिवार की है। दिलचस्प बात यह है कि 2022 में होने वाले अगले फुटबॉल विश्व की मेजबानी कतर ही करने वाला है।
 
फ्रांस के आला दर्जे के क्लब टूर्नामेंट लीग-1 में शामिल छह टीमों का स्वामित्व विदेशियों के पास है। कतर के अलावा स्पेन, अमेरिका, रूस, पोलैंड और चीन के निवेशकों ने इन टीमों में बड़ी रकम लगाई हुई है। हालांकि विदेशी प्रवर्तकों वाली क्लब टीमों के मामले में लीग-1 अगुआ नहीं है। यह खिताब तो इंग्लिश प्रीमियर लीग (ईपीएल) को जाता है जिसकी 13 टीमों का स्वामित्व विदेशी प्रवर्तकों के पास है। इसी तरह इटली की फुटबॉल लीग 'सीरीज ए' में पांच टीमों का स्वामित्व विदेशी कंपनियों के पास है।
 
हालांकि यूरोपीय फुटबॉल टीमों में विदेशी स्वामित्व का मसला विवादास्पद बना हुआ है। मसलन, स्पेन में फुटबॉल क्लबों का स्वामित्व स्थानीय लोगों के ही पास है। स्पेनिश क्लब लियोनेल मेसी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो जैसे सितारों को मोटी फीस देने के लिए बिक्री एवं प्रायोजन के सौदों पर निर्भर रहते हैं। जर्मनी के फुटबॉल क्लबों में स्वामित्व के लिए सामान्यत: 50प्लस1 का नियम रखा गया है जिससे किसी भी एक कंपनी को प्रभुत्व बनाने का मौका नहीं मिल पाता है। लेकिन ईपीएल के साफ नजर आने वाले प्रभावों के चलते जर्मनी की लीग बुंदेसलीग के भीतर भी पुनर्विचार का सिलसिला शुरू हो गया है। पुराने दौर के लोग इंग्लिश फुटबॉल की परंपरागत संस्कृति की जगह रूसी कुलीनों, संदेह से भरे चीनी एवं एशियाई अरबपतियों, पारदर्शिता से कोसों दूर रहने वाले तेल कारोबारी और ढीठ अमेरिकी उद्योगपतियों को इन क्लबों का स्वामित्व सौंपने को लेकर एतराज जता सकते हैं। लेकिन ईपीएल के कारोबारी मॉडल की कामयाबी ने इसे यूरोप की सबसे धनी लीग बनाया है और आज दुनिया भर में इसकी सफलता को दोहराने की कोशिश की जा रही है। ईपीएल में खेल के स्तर का आकलन इसी से किया जा सकता है कि इस विश्व कप के अंतिम चरण में पहुंची टीमों के अधिकांश खिलाड़ी इंग्लिश प्रीमियर लीग में खेलते हैं।
 
ब्रेक्सिट के प्रावधानों को लागू किए जाने की संभावना के बीच बुंदेसलीग ने गत फरवरी में 50प्लस1 के स्वामित्व नियमों में शिथिलता लाने का विचार पेश किया था। इसके पीछे सोच यह है कि स्वामित्व नियमों को शिथिल करने से मोटी रकम रखने वाले खरीदार आकर्षित होंगे जिससे बेहद प्रतिभावान खिलाडिय़ों को जोड़ा जा सकेगा। कहा जा रहा है कि इंगलैंड आने वाले समय में यूरोपीय संघ या अन्य हिस्सों से आने वाले विदेशी फुटबॉलरों के लिए वर्क परमिट नियमों को सख्त कर सकता है। अगर ऐसा होता है तो इंग्लिश फुटबॉल क्लब स्थानीय खिलाडिय़ों को ही खरीदने के लिए मजबूर हो जाएंगे।
 
हालांकि ऐसा होना ब्रेक्सिट के बाकी दुष्परिणामों की ही तरह इंगलैंड का नुकसान ही होगा। वर्ष 1966 के बाद फुटबॉल विश्व कप में इंगलैंड के बहुत अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाने के लिए अक्सर ईपीएल में विदेशी खिलाडिय़ों के दबदबे को जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है। कोई भी टीम इससे इनकार नहीं करेगी कि हफ्ते-दर-हफ्ते ऊंचे दर्जे की अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पद्र्धा होने से उनकी क्षमताओं पर सान चढ़ाने में मदद मिली है। ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टरीजा मे विश्व कप के दूसरे सेमीफाइनल में क्रोएशिया के खिलाफ अपनी टीम को देखने के लिए शायद ही वक्त निकाल पाई होंगी। ट्रंप की तरह मंदबुद्धि नहीं दिखने वालीं टरीजा अगर अपनी टीम के प्रदर्शन में ब्रेक्सिट के व्यापक असर को न देख पाई हों तो आप अचरज ही कर सकते हैं।
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