बिजनेस स्टैंडर्ड - उभरते बाजारों के लिए संकट का दौर
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उभरते बाजारों के लिए संकट का दौर

आकाश प्रकाश /  July 12, 2018

मजबूत होता डॉलर, बढ़ती ब्याज दरें, नकदी की कमी और तेल कीमतों में उछाल, ये सारी बातें मिलकर उभरते बाजारों के लिए खराब हालात पैदा कर रही हैं। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं आकाश प्रकाश 

 
उभरते बाजारों की परिसंपत्तियों की बात करें तो इस वर्ष अब तक का वक्त उनके लिए कठिन रहा है। बात चाहे मुद्रा की हो, दरों की या इक्विटी की, कई उभरते बाजार दबाव में हैं। ब्राजील, तुर्की और चीन के शेयर बाजार 15 से 20 फीसदी तक नीचे हैं। उभरते बाजार की मुद्रा की बात करें तो चीन की मुद्रा रेनमिनबी समेत सभी मुद्राएं दबाव में हैं। यहां तक कि भारत में मुख्य शेयर सूचकांक में भले ही गिरावट नहीं नजर आ रही हो लेकिन थोड़ा गहराई में जाने पर आपको नुकसान साफ नजर आएगा। मिड कैप सूचकांकों की बात करें तो वे डॉलर में 20 फीसदी तक नीचे हैं। कई शेयर 30 फीसदी या उससे अधिक गिर चुके हैं। तमाम फंड और पीएमएस अच्छे प्रदर्शन का दबाव महसूस कर रहे हैं क्योंकि मिडकैप इक्विटी काफी हद तक जोखिम में है। उभरते बाजार की परिसंपत्ति को लेकर रुझान अब बदलने लगा है और साप्ताहिक आधार पर पूंजी बाहर जा रही है। 
 
एक दूसरे से जुड़े हुए भय भी अब सामने आने लगे हैं। आखिर किस बात ने उभरते बाजारों की परिसंपत्ति पर इस कदर दबाव बनाया है? इसके तीन प्रमुख जरिये हैं। पहला, डॉलर का बढ़ता मूल्य दूसरा बढ़ती ब्याज दरें तथा नकदी की कमी और तीसरा तेल कीमतों में इजाफा। जब ये तीनों कारक मिल जाएं तो उभरते बाजारों के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकते हैं। आइए इनमें से प्रत्येक पर नजर डालते हैं। तेल कीमतें कम होने का नाम ही नहीं ले रही हैं। ब्रेंट क्रूड के दाम 75 से 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास टिके हुए हैं। मुझे डर है कि तेल कीमतों में यहां से और इजाफा हो सकता है। ओपेक ने तेल उत्पादन में इतना इजाफा नहीं किया है कि वेनेजुएला में मची अफरातफरी की भरपाई की जा सके। नवंबर से ईरान का तेल भी उपलब्ध नहीं होगा। दिलचस्प बात है कि तेल कीमतों में इजाफे के बावजूद तेल सेवा सूचकांक में शायद ही बदलाव आया हो। सामान्य तौर पर तेल कीमतों के दोगुना होने पर तो इस क्षेत्र के शेयरों की कीमत बढऩी चाहिए थी। तेल कीमतों में इजाफे के बीच उनकी भागीदारी का न होना यह दिखाता है कि तेल कंपनियों ने खुदाई, तेल उत्खनन और संबंधित क्षेत्रों में कम निवेश किया है। सभी बड़ी कंपनियां पूंजीगत व्यय बढ़ाने के बजाय प्रतिफल, लाभांश और पुनर्खरीद की बात कर रही हैं। वैश्विक स्तर पर तेल की मांग में 15 लाख बैरल रोजाना की दर से इजाफा हो रहा है। ऐसे में आपूर्ति एक चुनौती है। उधर अमेरिकी शेल गैस कंपनियों का खनन चालू है। नए निवेश की कमी से आपूर्ति पर असर पड़ेगा।
 
तेल कीमतों में बढ़ोतरी से नकदी की स्थिति पर असर पड़ेगा। इन्वेंटरी की फंडिंग के लिए कार्यशील पूंजी की आवश्यकता है। इसकी जरूरत में अरबों डॉलर का इजाफा हुआ है। इससे वैश्विक वृद्धि में भी कमी आएगी और वित्तीय परिस्थितियां तंग होंगी। अमेरिका पेट्रोलियम के क्षेत्र में करीब-करीब आत्मनिर्भर है। ऐसे में तेल कीमतों में इजाफा डॉलर के लिए भी असंतुलन पैदा करने वाला होगा। अगर हमारा सामना एक और संकट से नहीं होता तो ब्याज दरों में भी इजाफा देखने को मिलेगा। ऐसी स्थिति में अमेरिकी डॉलर की परिसंपत्तियों के लिए माहौल सुरक्षित रहेगा। अमेरिका में बेरोजगारी दर 3.75 प्रतिशत है जो पूर्ण रोजगार सीमा से नीचे है। यानी पहली बार अमेरिका में ऐसी स्थिति हो सकती है जहां रोजगार की तादाद, रोजगार चाहने वालों से अधिक हो। अमेरिका में निजी क्षेत्र का रोजगार लागत सूचकांक 4 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। ये तमाम प्रमाण बताते हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था एकदम उछाल पर है। टं्रप द्वारा प्रस्तावित कर कटौती और राजकोषीय विस्तार से वृद्घि को और गति मिलेगी। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व को दरों में इजाफा जारी रखना होगा ताकि अर्थव्यवस्था को राहत मिले। ब्याज दरें साफ तौर पर ऊपर की ओर हैं। अमेरिका में सख्त मौद्रिक स्थिति और उभरते बाजारों के घटते परिसंपत्ति मूल्य में सीधा संबंध है। 
 
डॉलर की बात करें तो उसमें इस वर्ष पहले ही 6-7 फीसदी की बढ़ोतरी हो चुकी है। हालांकि सालाना आधार पर अभी इसमें तेजी नहीं आई है। इस सीमित वृद्घि ने भी अर्जेन्टीना, ब्राजील, तुर्की और दक्षिण अफ्रीका में तनाव पैदा कर दिया है। मजबूत डॉलर हमेशा जिंस कीमतों और उभरते बाजारों के लिए नकारात्मक रहा है। चूंकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था जी-7 के अन्य देशों से अधिक मजबूत है इसलिए शायद फेड अन्य केंद्रीय बैंकों की तुलना में सख्ती की गति बढ़ाएगा। उभरते बाजारों की कमजोरी और बढ़ती कीमतें अमेरिका को गति प्रदान करेंगी। मुझे नहीं लगता कि अब आगे डॉलर में कोई कमजोरी आएगी। 
 
हमें वैश्विक कारोबारी जंग के जोखिम को भी ध्यान में रखना होगा। उभरती परिसंपत्तियां वैश्विक कारोबार और वैश्वीकरण में  महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं। ये दोनों उलटी दिशा में जाते नजर आ रहे हैं। चीन का भी ध्यान रखना होगा। उसकी अर्थव्यवस्था में धीमापन आ रहा है। क्या वह दोबारा प्रोत्साहन पैकेज जारी करेगा या आर्थिक मंदी को बरदाश्त करके वित्तीय स्थिरता को तवज्जो देगा? उभरते बाजारों की कमजोरी के पिछले दौर में चीन ने वृद्घि को बचाने के लिए अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन दिया था। इस प्रोत्साहन ने चीन की अर्थव्यवस्था और उभरते बाजार दोनों को बचाया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि चीन की अर्थव्यवस्था का आकार बहुत बड़ा है और वहां कच्चे माल की खपत बहुत अधिक है। इस बार नए प्रोत्साहन पैकेज को लेकर संशय है। चीन के नीति निर्माता अपने वित्तीय तंत्र को स्थिर बनाने के लिए धीमी वृद्घि को अपनाने को तैयार नजर आ रहे हैं। अगर यह सच हुआ तो उभरते बाजारों के हाथ से वह सुरक्षा भी निकल जाएगी जिसका लाभ वे पिछले पूरे दशक के दौरान उठाते आए हैं। 
 
उपरोक्त बातों को देखें तो लगता है कि उभरते बाजारों को फिलहाल चुनौती मिलती रहेगी। जब तक वृहद स्तर पर माहौल नहीं बदलता है और उपरोक्त तीन तरह के दबाव में तब्दीली नहीं आती है तब तक दबाव बरकरार रहेगा।  हालांकि भारत का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रह सकता है। तेल कीमतों को लेकर जोखिम के बावजूद ऐसा हो सकता है क्योंकि जिंस कीमतों में गिरावट से उसका ज्यादा जोखिम नहीं जुड़ा हुआ है। भारत ने पिछले दो साल में बड़े उभरते बाजारों की तुलना में अपेक्षाकृत कमतर प्रदर्शन किया है। विदेशी पूंजी देश से बाहर अवश्य जा रही है लेकिन मजबूत घरेलू आवक उसकी काफी हद तक भरपाई कर सकती है। परंतु वर्ष के उत्तराद्र्घ में चुनावों को लेकर जो अनिश्चितता का माहौल है वही केंद्र में रहने वाला है। भारत के मामले में निवेशक व्यापक आयवृद्घि का इंतजार करना पसंद करेंगे। इसकी अनुपस्थिति में बाजार तेजी नहीं पकड़ सकता। बेहतरी के लिए यह आवश्यक है कि देश का कॉर्पोरेट जगत बेहतर प्रदर्शन करे।
Keyword: economy, dollar, rupees, रुपये, गिरावट,
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