बिजनेस स्टैंडर्ड - नियामक के दिखावे और असली चेहरे पर अदालती नजर
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, September 21, 2018 09:34 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

नियामक के दिखावे और असली चेहरे पर अदालती नजर

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  July 09, 2018

अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की तरफ से लगाए गए यात्रा प्रतिबंध को सही ठहराने का जो फैसला सुनाया है उससे भारत में भी नियामकीय प्रक्रियाओं से जुड़ा एक प्रमुख सवाल सामने आता है। सवाल है कि एक न्यायाधीश को किसी आदेश या कानून पर विचार करते समय क्या अनिवार्यत: केवल लिखित शब्दों पर ही ध्यान देना चाहिए और दूसरे सभी अवयवों को नजरअंदाज कर देना चाहिए? सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आमूलचूल परिवर्तन लाने वाला है और कई दशकों तक इसकी चर्चा होती रहेगी। विवाद के केंद्र में यह था कि क्या ट्रंप का यात्रा प्रतिबंध लागू करने का फैसला मुसलमानों को ध्यान में रखते हुए किया गया था और अगर ऐसा था तो क्या वह अमेरिकी संविधान का उल्लंघन नहीं था?

 
सुप्रीम कोर्ट के नौ न्यायाधीशों के पीठ ने 5:4 के अल्प बहुमत से सुनाए गए फैसले में कहा है कि ट्रंप के इस फैसले में मुस्लिम समुदाय का नाम नहीं लिया गया है, लिहाजा इसे मुस्लिमों को निशाना बनाने वाले आदेश के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। पीठ के बाकी चार न्यायाधीशों की राय से असहमति जताते हुए पांच न्यायाधीशों ने यह फैसला दिया। ट्रंप ने राष्ट्रपति पद के अपने चुनाव अभियान में मुस्लिमों के प्रवेश पर रोक लगाने का मुद्दा प्रमुखता से उठाया था। ट्रंप ने मुस्लिम आव्रजन पर निषेध संबंधी दस्तावेज जारी करते हुए अमेरिका में मुसलमानों पर प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगाने का वादा किया था। उन्होंने कहा था कि 'इस्लाम हमसे नफरत करता है' और 'अमेरिका में मुसलमानों के आने से समस्या खड़ी होती है'। 
 
चुनाव जीतने के बाद ट्रंप ने मुस्लिमों के प्रवेश पर रोक लगाने के बारे में पूछे गए सवाल पर कहा था, 'आपको मेरी योजना के बारे में पता है।' जब ट्रंप ने पहली बार चुनिंदा इस्लामी समुदायों से संबंधित लोगों के अमेरिका  आने पर रोक का ऐलान किया तो उनके सलाहकारों ने इसकी व्याख्या 'मुस्लिम पाबंदी' के तौर पर की। हालांकि ट्रंप ने इस फैसले को वापस ले लिया और उसमें कई बदलाव भी किए। निषेध सूची में एक गैर-मुस्लिम समुदाय को भी जोड़ा गया और कुछ रियायतें एवं छूट भी दी गईं। हालांकि छूट दिए जाने का फैसला हरेक मामले के गुण-दोष के आधार पर करने की बात कही गई। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष समीक्षा के लिए यही मुद्दा आया था। सुप्रीम कोर्ट ने यात्रा निषेध की घोषणा को एक धर्म-विशेष के प्रति तटस्थ नजर आने वाला बताते हुए कहा है कि राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के पहले कई अनावश्यक बयान दिए गए थे। न्यायाधीशों ने कहा है कि वे यात्रा प्रतिबंध को एक धर्म-विशेष को निशाना बनाने के मकसद से उठाया गया कदम नहीं मानते हैं।
 
इस राय से असहमति जताने वाले बाकी चार न्यायाधीशों ने तथ्यपरक साक्ष्यों के आधार पर कहा कि ट्रंप के आदेश की भाषा देखने में भले ही तटस्थ लगे लेकिन वह दिखावटी है। बहुमत वाले पांच न्यायाधीशों ने कहा कि वे ट्रंप के चुनाव पूर्व दिए गए भाषणों के बारे में विचार करने के लिए नहीं बैठे हैं। लिहाजा उनके विचार का केंद्र बाहरी साक्ष्यों तक नहीं जाता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के पास ऐसे आदेश जारी करने की शक्ति है और इसे कारगर बनाने के लिए जरूरी कदम भी उठाए गए हैं। उन्होंने यात्रा प्रतिबंध संबंधी नियमों में छूट के प्रावधानों को समुचित बताया जबकि बाकी न्यायाधीशों का मानना था कि छूट के प्रावधान केवल दिखावा हैं और न तो प्रतिबंधात्मक आदेश और न ही छूट प्रावधान अपने दावे के मुताबिक कारगर होने वाले हैं।
 
भारत के नियामकीय परिवेश में भी अक्सर आदेशों को इस तरह लिखा गया होता है कि वे सामान्य तरीके से तैयार नजर आते हैं लेकिन असल में वे खास लोगों पर ही लागू होने वाले बेहद कारगर आदेश होते हैं। मसलन, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने एक परिपत्र में कहा था कि डिपॉजिटरी के बीच होने वाला हस्तांतरण शुल्क-मुक्त होना चाहिए। जब एक डिपॉजिटरी ने इस परिपत्र को 'आदेश' बताते हुए चुनौती दी तो प्रतिभूति अपीलीय अधिकरण (एसएटी) ने कहा कि परिपत्र के तौर पर जारी किए गए आदेश को खारिज नहीं किया जाएगा। इस पर उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सेबी अधिनियम के नियम-निर्माण संबंधी प्रावधानों के तहत जारी किसी भी परिपत्र को आदेश नहीं माना जाएगा और उसके खिलाफ अपील भी नहीं की जा सकती है। ऐसी स्थिति में सेबी के परिपत्रों को रिट याचिका के स्वरूप में ही संवैधानिक अदालतों में चुनौती दी जा सकती है, एसएटी में अपील के जरिये नहीं।
 
एसएटी को अक्सर ऐसे हालात का सामना करना पड़ता है जिसमें उसे खुद ही निर्णय लेने पड़ते हैं। मसलन, किसी लेखपत्र को विधि-निर्माण या कार्यकारी शक्तियों के तौर पर देखा जाएगा। ट्रंप के यात्रा निषेध मामले की तरह 'अनावश्यक' साक्ष्य भी इसमें अपनी भूमिका निभाते हैं। नियामक अपने संभावित कदमों के बारे में अक्सर खुलकर बात करते हैं और उनकी तरफ से उठाए गए कदमों को इसी संदर्भ में देखने की जरूरत है। भारत में नियामकों की ढांचागत संरचना ऐसी है कि उन्हें विधायी एवं कार्यकारी दोनों तरह के काम करने होते हैं और यही बात उनकी स्थिति को ट्रंप के यात्रा प्रतिबंध मामले के करीब लाकर खड़ा कर देती है। यह अलग बात है कि नियामकों की तरफ से इस्तेमाल की जाने वाली भाषा में निवेशकों के हित, पॉलिसी धारक के हित और जमाकर्ताओं के हित जैसे शब्द शामिल होते हैं।
 
नियामक और अदालतों के बीच किसी नियम या आदेश के असली मतलब और उसके दिखावे वाले चेहरे की व्याख्या को लेकर रहने वाला तनाव लंबे समय तक बना रहेगा। यह उस कहावत के पादरी की तरह है जिससे एक बच्चे ने धूम्रपान और प्रार्थना के बारे में सवाल पूछा था। जब पूछा गया कि प्रार्थना करते समय क्या कोई व्यक्ति धूम्रपान कर सकता है तो जवाब नकारात्मक आया लेकिन धूम्रपान करते समय प्रार्थना कर पाने के बारे में पूछे गए सवाल का जवाब हां में आया था। इस पूरी प्रक्रिया में कोई भी ट्रंप की तरह हो सकता है। 
 
(लेखक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)
Keyword: america, court, trump,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 लघु बचत की दरें बढ़ाने के बाद बैंकों पर भी ब्याज बढ़ाने का होगा दबाव?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.