बिजनेस स्टैंडर्ड - बिजली और दूरसंचार कारगर कदम की दरकार
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बिजली और दूरसंचार कारगर कदम की दरकार

श्याम पोनप्पा /  July 09, 2018

आगामी आम चुनाव में चाहे किसी की जीत हो लेकिन बिजली और दूरसंचार के क्षेत्र में हमें कारगर कदम उठाने की आवश्यकता है जो हमें वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाएं। बता रहे हैं श्याम पोनप्पा

 
देश में संसदीय और कुछ प्रमुख राज्यों के विधानसभा चुनाव करीब हैं। उनको लेकर व्यस्तता बढऩे के साथ ही अर्थव्यवस्था से ध्यान हट सकता है। कुछ उत्साहवर्धक घटनाओं के बावजूद बैंकों के फंसे हुए कर्ज और लंबित पड़ी परियोजनाओं जैसी प्रमुख ढांचागत समस्याएं बरकरार हैं। इन पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। 
 
अच्छी खबर
 
वर्ष 2017-18 की अंतिम तिमाही में सकल स्थायी पूंजी निर्माण सुधरकर 11,185 करोड़ रुपये के साथ अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। इससे पिछली तिमाही में यह 10,240 करोड़ रुपये था। 
 
ऋण में बढ़ोतरी हुई। गैर खाद्य ऋण मई 2018 में 11.1 फीसदी बढ़ा जबकि एक वर्ष पूर्व यह 4.1 फीसदी था। सेवा क्षेत्र का ऋण भी मई 2017 के 4 फीसदी से बढ़कर मई 2018 में 21.9 फीसदी हो गया। वहीं व्यक्तिगत ऋण इसी अवधि में 13.7 फीसदी से बढ़कर 18.6 फीसदी पर पहुंच गया। बहरहाल बुनियादी ढांचा, मूल धातुओं और धातु उत्पादों, विनिर्माण, रत्न एवं आभूषण तथा वाहन एवं परिवहन के क्षेत्र में गिरावट देखने को मिली। 
 
ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) पर अमल काफी किफायती ढंग से हो रहा है। फरवरी में मुंबई में आयेाजित एक सम्मेलन से संबंधित ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट में रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर समेत वित्तीय विशेषज्ञों का कहना था कि फंसे हुए कर्ज का 50 प्रतिशत फिलहाल इस संहिता के माध्यम से निपटाया जा रहा है और 25 फीसदी भी जल्द ही इसके दायरे में आएगा। उनका कहना है कि न्यायपालिका संहिता में उल्लिखित समय सीमा का पूरा ध्यान रख रही है। 
 
पिछले सप्ताह सरकारी क्षेत्र के बैंकरों की एक समिति ने वित्त मंत्रालय के समक्ष फंसे हुए कर्ज को लेकर संभावित उपायों की अनुशंसा की। इनमें परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी का गठन करने की बात भी शामिल है जिसका संचालन बैंक करेंगे। ऋण के लिए एक परिसंपत्ति कारोबारी मंच और बैंकों के बीच अंतर-ऋणदाता समझौते की बात शामिल है। इसमें सबसे प्रमुख बैंक को यह अधिकार होगा कि वह फंसे र्ज का समयबद्घ निस्तारण करे। इसके बाद दिवालिया संहिता और बिकवाली का विकल्प है। शंकालु इन पर अविश्वास कर सकते हैं। हकीकत तो यह है कि हमें स्वीकार करना पड़ेगा कि साझा लाभ के लिए आपसी विश्वास की आवश्यकता होती है जो बेहतर संगठनात्मक ढांचे, अच्छी जांच परख के साथ तैयार हो। रोनाल्ड रीगन के शब्द (दरअसल एक रूसी कहावत) में कहें तो यकीन करें लेकिन पुष्टि करने के बाद। 
 
ऐसे में सवाल यह है कि गिलास आधा भरा है या आधा खुला है? 
 
बुरी खबर 
 
समस्याओं के दो उदाहरण हमारे सामने हैं। 
 
1. लंबित परियोजनाएं
 
आरबीआई का 12 फरवरी, 2018 का परिपत्र निजी क्षेत्र की कई बिजली परियोजनाओं के लिए कुठाराघात की तरह था। हालात नियंत्रण के बाहर होने के कारण नकदी की स्थिति ठीक नहीं है। इस दिशा में एक विचार यह भी है कि देनदारी में चूक करने वाले सभी लोगों पर एक समान मानक लागू किए जाने चाहिए। बिजली मंत्रालय ने यह भी कहा है कि समस्याएं डेवलपर के नियंत्रण से बाहर हो सकती हैं जिसके लिए वह जिम्मेदार नहीं है। मिसाल के तौर पर ईंधन की कमी, निजी खनन की इजाजत न मिलना, वितरण कंपनियों की वित्तीय कमजोरी या सरकारी अथवा नियामकीय मंजूरी में होने वाली देरी। डेवलपर इन पर नियंत्रण नहीं कर सकता। इसलिए ऐसी परियोजनाओं को आरबीआई के परिपत्र के दायरे से बाहर रखा जाए। बीते मार्च महीने में एक संसदीय समिति ने भी ऐसी ही अनुशंसा की। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दिवालिया प्रक्रिया के खिलाफ भारतीय स्वतंत्र बिजली उत्पादक संघ की याचिका की सुनवाई करते हुए आदेश दिया था कि संशोधित ढांचे के अधीन बिजली क्षेत्र के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। उसने वित्त सचिव को निर्देश दिया कि वे बिजली और कोयला मंत्रालय के अपने समकक्षों के साथ, आरबीआई और भारतीय दिवालिया बोर्ड के साथ जून में बैठक कर संकटग्रस्त बिजली कंपनियों की दिक्कतों को हल करने का प्रयास करें। 21 जून 2018 को आरबीआई इस बैठक में अविचल रहा लेकिन जानकारी के मुताबिक वित्त सचिव ने अंशधारकों से लिखित प्रस्तुति मांगी। विशेषज्ञों का एक समूह इसकी समीक्षा के बाद आगे के कदम पर विचार करेगा। इलाहाबाद उच्च न्यायालय हमें अब भी इससे बचा सकता है। 
 
2. रुकावटी नीतियां: उदाहरण वाईफाई 
 
सरकार राजस्व के लिए 5जी स्पेक्ट्रम की नीलामी करने को उत्सुक है और उसे सेवा प्रदाताओं को उपलब्ध कराना चाहती है। उद्योग जगत को स्पेक्ट्रम तो चाहिए लेकिन वह कर्ज में डूबा हुआ है। इसके अलावा ग्रामीण और अद्र्घ शहरी क्षेत्र में बहुत सारे इलाके ऐसे हैं जिनमें अभी निवेश की जरूरत है। बैंक खुद दिक्कत में हैं जबकि अब तक वे ही वित्त पोषण का मुख्य जरिया थे।  इस बीच वाईफाई के लिए 5 गीगाहट्र्ज को लेकर ढीला-ढाला रुख इस बात का उदाहरण है कि कई नीतियों पर काम करना है। देश के नैशनल फ्रीक्वेंसी अलोकेशन प्लान ने 5 गीगाहट्र्ज बैंड में 380 मेगाहट्र्ज का लाइसेंस खत्म कर दिया है। यह मानक के अनुसार जरूरी स्तर से 200 मेगाहट्र्ज कम है। यानी उपभोक्ताओं को कम स्पेक्ट्रम उपलब्ध हैं। दूसरा, देश में बाहरी इस्तेमाल के लिए केवल 50 मेगाहट्र्ज की मंजूरी है। शेष 330 मेगाहट्र्ज आंतरिक प्रयोग के लिए है। यह बात इस बैंड और उपलब्ध उपकरणों के इस्तेमाल को सीमित करती है। यह शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में वाईफाई हॉटस्पॉट के लिए प्रभावी नहीं रह जाता। हमें देश की 5जी नीति में संशोधन की आवश्यकता है ताकि उसे अंतरराष्टï्रीय मानकों के अनुरूप बनाया जा सके। आंतरिक और बाह्यï प्रयोग की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए। 
 
हमें वैश्विक बाजारों के अनुरूप नीतियां अपनानी होंगी। उपभोक्ताओं के लिए इसका अर्थ यह हो सकता है कि किसी भी बाजार का कोई भी उपयुक्त उपकरण बिना किसी बदलाव के प्रयोग किया जा सकता है। इससे स्थापना और रखरखाव करना आसान होगा क्योंकि किसी विशिष्टï व्यवस्था की आवश्यकता नहीं होगी। विनिर्माताओं के लिए अच्छी बात यह होगी कि सभी उपकरण वैश्विक मानकों के अनुरूप होंगे और वे हर उस जगह काम करेंगे जहां उन मानकों का पालन होता है। यानी उनके लिए नए बाजार खुलेंगे। इससे कारोबार बढ़ेगा और कीमत कम होगी। ऐसे बदलाव वाईफाई की राह और सहज बनाएंगे। यह एक तरह का नीतिगत बदलाव है जिसकी आवश्यकता है। तभी हम इस गतिरोध से आगे बढ़ सकेंगे। हमें इसके लिए सकारात्मक सोच रखनी होगी, बजाय कि प्रतिबंधात्मक सोच के। बिना सकारात्मक बदलाव के आगे की राह बहुत कठिन होगी। इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि किसकी सरकार बन रही है।
Keyword: power, electric, telecom, loan, NPA,,
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