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अनावश्यक शर्तें

संपादकीय /  July 09, 2018

खबरों के मुताबिक सोमवार को दूरसंचार विभाग ने वोडाफोन और आइडिया के काफी समय से लंबित विलय को मंजूरी दे दी। दोनों कंपनियां भारतीय दूरसंचार बाजार की बड़ी कारोबारी हैं। बजाय इसके कि दूरसंचार विभाग दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी दूरसंचार कंपनी की राह आसान करता, उसकी स्वीकृति ने मामले को और अधिक जटिल बना दिया है। ऐसा इसलिए कि उसने दोनो कंपनियों के समक्ष कुछ कठिन शर्तें रख दी हैं। ऐसे में काफी संभावना है कि भविष्य में और अधिक विवाद सामने आएंगे और देरी होगी। शुरुआती रिपोर्ट के मुताबिक विभाग ने आइडिया सेल्युलर से कहा है कि वह वोडाफोन के स्पेक्ट्रम के लिए 39 अरब रुपये नकद चुकाए और 33 अरब रुपये की बैंक गारंटी का इंतजाम करे। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। न केवल इसलिए कि कंपनियां नई प्रबंधन टीम की घोषणा समेत बदलाव की पूरी तैयारी कर चुकी हैं बल्कि इसलिए भी कि यह हाई प्रोफाइल विलय इस काबिल है कि इस क्षेत्र की तकदीर बदल सके। दूरसंचार क्षेत्र की सेहत बहुत मायने रखती है और उसे प्रक्रियाओं में नहीं उलझाया जाना चाहिए। 

 
विभाग को पुरानी कंपनी के स्पेक्ट्रम के अधिग्रहण के बकाया भुगतान से जुड़ी शर्त तय करने के बजाय कहीं अधिक रणनीतिक नजरिया अपनाना चाहिए था। यह सुनिश्चित करने के लिए पहले से ही तमाम नियम कायदे हैं कि विलय और खरीद को ऐसा न तैयार किया जा सके कि अतीत में आवंटित स्पेक्ट्रम का कोई रणनीतिक लाभ ले सके। ऐसे बकाया निश्चित तौर पर चुकाए जाने चाहिए। उदाहरण के लिए वोडाफोन और अधिकारियों के बीच इस बात को लेकर विवाद चल रहा है कि कंपनी को 2015 में समूह की कुछ कंपनियों के विलय के बाद 47 अरब रुपये की राशि चुकानी चाहिए या नहीं। कंपनी पहले ही सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद 20 अरब रुपये की राशि चुकता कर चुकी है। दूरसंचार विभाग का यह जोर देना भी सही है कि बकाया राशि को चुकाना विलय के बाद बनी इकाई का दायित्व है। हालांकि विभाग को खुद को इतना अधिकार संपन्न समझना चाहिए कि वह इस सीमा पर विलय को रोक सके।
 
उसे विलय को विवाद निस्तारण प्रक्रिया पर सवाल उठाने के लिए बचाव के तौर पर नहीं इस्तेमाल करना चाहिए। उदाहरण के लिए इस अहम क्षेत्र से जुड़े कारोबारी निहितार्थ को विभाग की जल्दी से जल्दी बकाया धनराशि चुकता करने की इच्छा के समक्ष बंधक नहीं बनाया जाना चाहिए। भले ही उसे लगता भी है कि उसे इस मसले को विलय से पहले निपटाने का कानूनी अधिकार प्राप्त है। विलय को मंजूरी देने के लिए भुगतान के तरीके को भी वजह नहीं बनाया जाना चाहिए। इससे इसका क्या लेना-देना कि भुगतान नकद किया जाता है या बैंक गारंटी के माध्यम से किया जाता है। निश्चित तौर पर अगर दूरसंचार पंचाट यह तय करता है कि दूरसंचार विभाग का पैसा बकाया है तो विलय के बाद बनने वाली कंपनी को वह राशि चुकानी होगी। सरकार को भी उससे ऐसी शपथ लेनी चाहिए कि कंपनी वह धन चुकाएगी। परंतु दूरसंचार विभाग को सरकारी वकील की बात की व्याख्या इस प्रकार नहीं करनी चाहिए कि वह भुगतान न किए जाने पर विलय को रोकने का अर्थ असंभव शर्तें थोपने के रूप में लगाने लग जाए। इससे जवाबदेही के सिद्घांत को नुकसान पहुंचेगा। आखिरकार अगर गलत व्याख्या और कानूनी जटिलताओं की वजह से विलय की प्रक्रिया पूर्ण होने में देरी हो तो यह कंपनियों के लिए अच्छी बात नहीं है क्योंकि उनके लिए ग्राहकों और राजस्व बाजार के नुकसान की आशंका उत्पन्न हो जाती है। इतना ही नहीं इस देरी की वजह से कंपनियों को नेटवर्क की गुणवत्ता में सुधार और बाजार नीतियां तैयार करने का मामला भी काफी पीछे चला जाएगा। 
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