बिजनेस स्टैंडर्ड - हमें आईबीसी से नजरें नहीं हटानी चाहिए: अरविंद सुब्रमण्यन
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हमें आईबीसी से नजरें नहीं हटानी चाहिए: अरविंद सुब्रमण्यन

दिलाशा सेठ और सोमेश झा /  July 08, 2018

अक्टूबर 2014 से नीति निर्माण में सरकार की मदद करने के बाद मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन फिर से शिक्षा क्षेत्र की ओर लौट रहे हैं और वह विजिटर के तौर पर हार्वर्ड केनेडी स्कूल में पढ़ाएंगे। दिलाशा सेठ और सोमेश झा के साथ साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि कारोबार को आसान बनाने के एजेंडे को आगे बढ़ाने की जरूरत है और भारत को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश करनी चाहिए। संपादित अंश:

 
अर्थव्यवस्था के मौजूदा हालात को देखते हुए सरकार के लिए आपके तीन मुख्य सुझाव क्या होंगे?
 
पहला सुझाव यह है कि मौजूदा एजेंडे को अंजाम तक पहुंचाएं। इसमें अभी बहुत काम बाकी है। दूसरा, एयर इंडिया का निजीकरण करें। तीसरा, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को स्थिर करें। मेरी चौथी सलाह यह है कि व्यापक स्तर पर स्थिरता बनाए रखना चाहिए क्योंकि यह बेहद अनिश्चित माहौल है। जीएसटी राजस्व का स्थिर होना अच्छा संकेत है लेकिन निर्यात रिफंड और जीएसटी के सरलीकरण पर काम बाकी है।
 
सरकारी बैंकों में फंसे कर्ज के समाधान के लिए नए 5 सूत्री एजेंडे पर आपकी क्या राय है?
 
मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि यह 5 सूत्री कार्यक्रम क्या है क्योंकि इसके ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) प्रक्रिया के तालमेल बिठाने को लेकर कुछ समस्याएं हैं। साथ ही यह भी साफ नहीं है कि वैकल्पिक निवेश फंड के लिए पैसे कहां से आएंगे। मुझे पता नहीं कि ये चीजें कैसे काम करेंगी और नियामक की इस पर क्या प्रतिक्रिया होगी। 
 
क्या आपको लगता है आईबीसी सबसे सही प्रक्रिया है?
 
यह सही है। मुझे लगता है कि आईबीसी एक बहुत बड़ी उपलब्धि है क्योंकि पहली बार हमने एक कानून बनाया है जो कारोबार से बाहर निकलने की प्रक्रिया को आसान बना सकता है। जब मैंने बैंकों के फंसे हुए कर्ज के लिए बैंक (बैड बैंक) बनाने का विचार रखा था तो मुझे अंदाजा नहीं था कि यह समस्या कितनी गंभीर है। तो फिर सार्वजनिक वैधता और सार्वजनिक विश्वास के लिए न्यायिक प्रक्रिया ही एकमात्र उपाय है। इसलिए आईबीसी बैड बैंक से बेहतर प्रक्रिया है और हमें इससे अपनी नजरें नहीं हटानी चाहिए। अलबत्ता हमें यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या आईबीसी एकमात्र उपाय होना चाहिए या फिर विशेष उपाय होना चाहिए। इसका एक संभावित जवाब यह है कि आईबीसी प्रक्रिया जाम हो रही है और इस पर बोझ पड़ रहा है। क्या हमें इसे राहत देने के तरीके ढूंढने चाहिए।
 
एलआईसी के आईडीबीआई बैंक खरीदने पर आपकी क्या राय है?
 
जाहिर तौर पर यह निजी क्षेत्र की भागीदारी नहीं है। हमें नई परिसंपत्तियों के मामले में ही निजी क्षेत्र से ज्यादा भागीदारी देखने को मिलेगी। मौजूदा परिसंपत्तियों के मामले में निजी भागीदारी हासिल करना बहुत मुश्किल होगा। एलआईसी करार मामले में यह बात साबित होती है। एयर इंडिया के विनिवेश का मामला इसका एक और प्रबल उदाहरण है। 
 
बैंकों के विलय के बारे में क्या कहना है?
 
खराब बैंक को खराब बैंक के साथ या खराब बैंक को अच्छे बैंक के साथ जोडऩे का कोई तुक नहीं है। रिजर्व बैंक ने त्वरित उपचारात्मक कार्रवाई (पीसीए) व्यवस्था बनाकर अच्छा काम किया है।
 
आप अर्थव्यवस्था और शासन को कैसे आंकेंगे? नौकरी और निर्यात के मामले में इस सरकार का प्रदर्शन कैसा रहा?
 
जहां तक रोजगार का मामला है तो हमारे पास विश्लेषण के लिए वास्तविक आंकड़े मौजूद नहीं है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) इस साल के आखिर में या अगले साल की शुरुआत में आंकड़े जारी करेगा। तब तक मेरे पास इस सवाल का जवाब नहीं है। जिन आंकड़ों पर चर्चा हो रही है वे मेरी समझ से परे हैं। आर्थिक समीक्षा में हमने जिन आंकड़ों पर बात की है मुझे वहीं समझ में आते हैं। कृषि, निर्माण और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र का प्रदर्शन पहले बहुत अच्छा रहा था लेकिन अब वे अच्छा नहीं कर रहे हैं। रोजगार की चुनौती वास्तविक है और अब भी बनी हुई है। हमें संगठित क्षेत्र में ज्यादा रोजगार पैदा करने की जरूरत है।
 
निर्यात के बारे में क्या कहना है? अगर निर्यात नहीं बढ़ता है तो आर्थिक वृद्घि के लिए इसका क्या मतलब है?
 
जब तक हम 15 फीसदी निर्यात वृद्घि हासिल नहीं करते हैं तब तक 8 से 9 फीसदी की आर्थिक वृद्घि हासिल करना मुश्किल है। निर्यात के मोर्चे पर प्रदर्शन उतना अच्छा नहीं रहा है जितना रहना चाहिए था। जीडीपी में विनिर्माण निर्यात की भागीदारी घटी है। कुछ हद तक इसके लिए कमजोर वैश्विक अर्थव्यवस्था भी जिम्मेदार है। जनवरी 2014 से रुपया भी 20 फीसदी मजबूत हुआ है। विनिमय दर अपनी प्रतिस्पद्र्घा खो रही है, वैश्विक अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त है और शुल्क की बाधाएं बढ़ रही हैं, ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पद्र्घी बनाना एक बहुत बड़ी चुनौती है। हम इस समस्या का समाधान कैसे करेंगे? मुझे लगता है कि कारोबार को आसान बनाने के एजेंडे को आगे बढ़ाने की जरूरत है और भारत को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं के साथ तालमेल बैठाने की कोशिश करनी चाहिए।
 
क्या विदेशी प्रत्यक्ष निवेश में कमी चिंता की बात है?
 
ब्याज दरें एक बार फिर अमेरिका के अनुरूप हो रही हैं और वहां की अर्थव्यवस्था फिर से पटरी पर लौट रही है, इसलिए ऐसा तो होना ही है। पूंजी का प्रवाह उभरते बाजार से दूर जा रहा है और इसमें कमी आएगी। हमें खुद को एक ऐसी अर्थव्यवस्था के रूप में दिखाना होगा जहां एफडीआई के लिए अच्छी संभावनाएं हैं। हम चुनावी वर्ष में हैं, इसलिए इस बारे में सवाल उठेंगे कि अर्थव्यवस्था किस दिशा में जा रही है।
 
अपनी आर्थिक समीक्षाओं में आपने संरक्षणवाद के खिलाफ रुख दिखाया है। अमेरिका ने वैश्विक स्तर पर व्यापार युद्घ शुरू कर दिया है तो क्या भारत को भी कार्रवाई करनी चाहिए?
 
हमें विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के ढांचे के तहत कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन बड़ा मुद्दा यह है कि हमने इस साल बजट में व्यापक तौर पर शुल्क बढ़ाया है। इस पर हमें ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि अगर आपको वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पद्र्घी बनना है और वैश्विक मूल्य शृंखलाओं का हिस्सा बनना है तो फिर इस तरह की कार्रवाई से आपको मदद नहीं मिलेगी। इससे हम वैश्विक मौकों को खो देंगे। दूसरी तरफ अगर वैश्विक स्तर पर लोग वैश्वीकरण और उदारवाद से किनारा कर रहे हैं, तो भारत में कुछ लोगों के लिए संरक्षणवाद की मांग करना आसान हो जाता है। मुझे इसकी ज्यादा चिंता है। 
 
13 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाया गया है। क्या कृषि संकट की चुनौती से निपटने के लिए यह सही फैसला है? इसका महंगाई पर क्या असर होगा?
 
मुझे लगता है कि इसमें वितरण लाभ और व्यापक स्तर पर अर्थव्यवस्था के परिणाम सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। खरीद के स्तर पर हम जितने सफल होंगे, उतना ही किसानों को फायदा होगा और राजकोषीय लागत और महंगाई में भी इसका असर देखने को मिलेगा। यह स्वाभाविक समायोजन व्यवस्था है। हमें इंतजार करना होगा क्योंकि सरकार ने अब तक इसकी व्यवस्था के बारे में घोषणा नहीं की है। 
 
प्रत्यक्ष कर कानून के बारे में आपका क्या कहना है? इस कानून को नया रूप दे रही समिति को आपने क्या सुझाव दिए हैं?
 
मैं इसका पहले से आकलन नहीं करना चाहता हूं। अरविंद मोदी समिति जल्दी ही अपनी रिपोर्ट सौंपने वाली है। मैं आपको अपना अनुभव बताना चाहता हूं। पिछले 2 साल मैंने कुछ चीजें महसूस की हैं। आगे का रास्ता कर घटाने और कर दायरा बढ़ाने का है। दूसरी बात यह कि कम कॉरपोरेट कर को वैश्विक कॉरपोरेट करों के अनुरूप करने की जरूरत है। खासकर इसे अमेरिकी करों के मुताबिक किया जाना चाहिए। हमें कई तक की दुश्वारियों के बावजूद पूंजी निवेश को आकर्षित करना है। हमें सरल व्यवस्था और तेज प्रगति की जरूरत है। इस लक्ष्य को हासिल करने के तरीके पर चर्चा होनी चाहिए। 
 
सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की गणना के आधार वर्ष को फिर से बदलने का फैसला कितना उचित है?
 
आधार वर्ष में बदलाव होना ही है। अधिकांश विकसित देशों में आधार हर साल बदलता है। हमें कम से कम हर 5 साल में आधार वर्ष बदलने की जरूरत है, इससे हरकुछ मौजूदा वास्तविकता के अनुरूप हो जाएगी।
 
आपके कार्यकाल का सबसे निराशाजनक दौर कौन सा रहा है? क्या यह नोटबंदी का फैसला था जिसमें आपकी राय को नहीं माना गया?
 
हर काम की तरह इसमें भी उतार चढ़ाव आए। अगर ऐसा नहीं होता है तो फिर इसका मतलब होता कि आपका कार्यकाल नीरस और अनुत्पादक रहा। उतार चढ़ाव का अनुपात असाधारण रूप से सकारात्मक रहा। कभी-कभार आपको यह बात स्वीकार करनी होती है कि नेता वही करते हैं जो उन्हें करना होता है। आप एक बिंदु से ज्यादा उनके विकल्पों के बारे में अनुमान नहीं लगा सकते हैं। कुछ चीजें पर आपको आंतरिक तौर पर विरोध करना चाहिए और कुछ को आपको स्वीकार करना पड़ता है। इस मायने में आपको उनमें से कुछ को स्वीकार करना होगा। 
 
अपने अगली आर्थिक समीक्षा में आप कौन सी बातों को शामिल करना पसंद करते?
 
4 ऐसे सुझाव ऐसे हैं जो आप नहीं देख पाएंगे। इनमें से एक राज्यों के बीच क्रय शक्ति समानता की गणना है ताकि विभिन्न राज्यों के बीच आय और जीवनयापन के मानकों की तुलना की जा सके। दूसरी बात यह है कि मैं ईपीएफओ/ईएसआईसी के आंकड़ों के आधार पर रोजगार की गणना करना पसंद करता। तीसरी बात यह कि मैं जीएसटी के आंकड़ों के आधार पर राष्ट्रीय, राज्यवार और जिलावार आरंभिक अनुमान जारी करना पसंद करता। साथ ही मैं व्यापार युद्घ और मुद्रा युद्घ तथा भारत में इसके प्रभाव पर एक अध्याय शामिल करता।
 
व्यक्तिगत आय कर में सीमा बढ़ाने के बारे में आपकी क्या राय है?
 
मैं इसके खिलाफ हूं। इस सीमा को कभी भी नहीं बढ़ाया जाना चाहिए। हम चाहते हैं कि भारत करदाताओं का देश बने। इसका एक तरीका यह है कि कानून का डंडा चलाया जाए लेकिन इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। दूसरा तरीका यह है कि लोगों की आय बढ़ेगी तो वे खुद ब खुद आयकर के दायरे में आ जाएंगे। आयकर की सीमा बढ़ाकर आप अपने लक्ष्य का नुकसान करते हैं। इसलिए सबसे अच्छा और राजनीतिक रूप से आसान तरीका यही है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को आयकर के दायरे में लाया जाए और आयकर की सीमा न बढ़ाई जाए।
 
आपके पूर्ववर्तियों ने फिर से शिक्षा क्षेत्र में वापसी की। आपका अगला कदम क्या होगा?
 
मैं अगले साल विजिटिंग पद पर हार्वर्ड केनेडी स्कूल जा रहा हूं। साथ ही मैं पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनैशनल इकनॉमिक्स में नॉन रेजिडेंट सीनियर फैलो के पद पर रहूंगा। मेरे पोते की जिद है कि मैं बोस्टन में ही रहूं क्योंकि मेरा बेटा और बहू वहीं रहते हैं। मुद्दा यह है कि मैं फिर से जीवन में लौट रहा हूं। अपने पूर्ववर्तियों की तरह शिक्षा और शोध के क्षेत्र में जा रहा हूं। इसके अलावा मुझे बच्चों की देखभाल करनी है। 
 
ऐसा लगता है कि अब आप राजनीतिक वर्ग के साथ ज्यादा सहज हो गए हैं। उदाहरण के लिए आपका कहना है कि एनसीएलटी बैड बैंक से बेहतर है जो कि आपका पसंदीदा सुझाव था। 
 
मुझे लगता है कि यह एक सबक है कि फंसे कर्ज की समस्या कितनी गंभीर है और आगे एनसीएलटी ही इसका वास्तविक समाधान है। सार्वभौमिक मूल आय के मुद्दे पर मैं यही कहना चाहता हूं कि यह बहस का मुद्दा बन चुका है। तेलंगाना में इसे लेकर बेहतरीन प्रयोग हुए हैं। इस बारे में मेरी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी चर्चा हुई थी और वह भी इस विचार से सहमत थे। मुझे लगता है कि आने वाले दिनों में यह जोर पकड़ेगा। मैं इसे आर्थिक समीक्षा में मुख्य आर्थिक सलाहकार की विरासत समझूंगा।
Keyword: Arvind Subramanian, economist, Chief Economic Adviser,
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