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महज कम प्रीमियम देखकर ही न बदल डालें अपना स्वास्थ्य बीमा

प्रियदर्शिनी माजी /  July 08, 2018

अक्सर देखा जाता है कि स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी खरीदने के कुछ साल बाद ही लोगों को उनमें कई तरह की कमियां नजर आने लगती हैं। उसके बाद वे अपनी पॉलिसी को बदलकर ऐसी पॉलिसी लेने की उधेड़बुन में फंस जाते हैं, जिसमें और भी बेहतर फायदे हों तथा साथ में कुछ ऐड-ऑन यानी अतिरिक्त लाभ भी हों। कभीकभार लोग पॉलिसी इसलिए भी बदलते हैं क्योंकि पुरानी पॉलिसी में दावे के निपटान का उनका अनुभव अच्छा नहीं रहा था या उन्हें प्रीमियम ज्यादा देना पड़ रहा था। बीमा कंपनियों का कहना है कि कीमत के लिहाज से देखा जाए तो उनके पास बीमा खरीदने के जो भी प्रस्ताव आ रहे हैं, उनमें से 8 से 18 फीसदी पुरानी पॉलिसी छोड़कर आने वालों के प्रस्ताव हैं।

 
जब कोई व्यक्ति मौजूदा कंपनी को छोड़कर नई कंपनी से बीमा कराने यानी अपनी पॉलिसी 'पोर्ट' कराने के लिए आवेदन करता है तो इस बात की पूरी संभावना होती है कि नई कंपनी उसकी अर्जी को प्रतिकूल माने और बीमा देने से इनकार कर दे। उस सूरत में पॉलिसीधारक के पास अपनी पुरानी बीमा कंपनी के साथ बने रहने के अलावा कोई और चारा नहीं रह जाता। स्टार हेल्थ ऐंड अलाइड इंश्यारेंस के मुख्य परिचालन अधिकारी एस प्रकाश कहते हैं, 'पोर्टिंग के जो भी प्रस्ताव आते हैं, उन्हें अंडरराइटिंग के दिशानिर्देशों की कसौटी पर कसा जाता है। किसी भी पॉलिसी की अंडरराइटिंग का अर्थ है उससे जुड़े जोखिम का मूल्यांकन करना और उसके आधार पर वह प्रीमियम निकालना, जो पॉलिसीधारक से वसूला जाना चाहिए। अंडरराइटर भी पॉलिसी को नकार सकता है।' 
 
पोर्टिंग भी एक जैसी स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों के बीच ही की जा सकती है। मगर नई बीमा पॉलिसी की खासियत और उसके फायदे नई बीमा कंपनी के हिसाब से ही होंगे। पुरानी बीमा पॉलिसी में क्या फायदे थे और क्या अच्छा-बुरा था, इससे कोई भी फर्क नहीं पड़ता। हां, पुरानी पॉलिसी में आपको जो प्रतीक्षा अवधि मिलती थी और बीमा का दावा नहीं करने के कारण आपने जो नो-क्लेम बोनस इक_ïा कर लिया था, वे नई बीमा पॉलिसी में चले आते हैं।  ऐको जनरल इंश्योरेंस में अपॉइंटेड एक्चुअरी वीरेश गिरि बताते हैं, 'अगर पुरानी बीमा पॉलिसी जैसा ही कवर नई बीमा पॉलिसी में भी है तो जितनी प्रतीक्षा अवधि पुरानी पॉलिसी में बीत चुकी है, उतनी नई पॉलिसी की प्रतीक्षा अवधि में से घटा दी जाती है। जहां तक इन्क्रीमेंटल कवर का सवाल है तो नई बीमा पॉलिसी में उसके लिए प्रतीक्षा अवधि नए सिरे से शुरू होती है।'
 
पुरानी पॉलिसी को नई बीमा कंपनी में पोर्ट कराते समय पॉलिसीधारक पुरानी पॉलिसी जितनी ही बीमा की रकम चुन सकता है, बशर्ते नई बीमा पॉलिसी में उतनी रकम का विकल्प मौजूद हो। बीमा कंपनी अनुमति दे तो बीमा की रकम (सम इंश्योर्ड) में इजाफा भी किया जा सकता है। बजाज आलियांज जनरल इंश्योरेंस के मुख्य तकनीकी अधिकारी शशिकुमार आदिदामू का कहना है, 'नई पॉलिसी में आते समय आप अपने सम इंश्योर्ड में इजाफा तो कर सकते हैं, लेकिन पोर्टिंग के फायदे केवल सम इंश्योर्ड तक और पुरानी बीमा कंपनी के नो-क्लेम बोनस पर ही लागू होंगे।' उदाहरण के लिए अगर आपकी 5 लाख रुपये की पॉलिसी है और पोर्ट करते समय आप बीमा की रकम को बढ़ाकर 10 लाख कराना चाहते हैं। आप ऐसा कर सकते हैं, लेकिन पोर्टिंग के फायदे केवल 5 लाख रुपये की रकम और बोनस पर ही लागू होंगे।
 
केवल कम प्रीमियम देखकर ही अपनी बीमा पॉलिसी पोर्ट कराने के चक्कर में न पड़ें। पॉलिसीएक्स डॉट कॉम के मुख्य कार्य अधिकरी नवल गोयल की सलाह है, 'यदि आप कम प्रीमियम देखकर ही अपनी बीमा पॉलिसी बदलने जा रहे हैं तो यह जरूर जांच लीजिए कि आपकी कवर की राशि तो कम नहीं हो जाएगी क्योंकि ऐसा हुआ तो आपको बड़ा घाटा होगा। इसी तरह अगर आप अधिक सम इंश्योर्ड देखकर पॉलिसी बदल रहे हें तो आपको यह बात भी ध्यान रखनी होगी कि बीमा की रकम में आप जो भी इजाफा कराते हैं, उसके एवज में आपको प्रतीक्षा अवधि भी बितानी होगी यानी नई पॉलिसी में कुछ समय तक आपको कुछ बीमारियों का बीमा नहीं मिल पाएगा।'
 
पोर्टिंग के समय पॉलिसीधारकों के सामने कुछ समस्याएं भी आ सकती हैं। अगर नई पॉलिसी में कुछ नए फायदे जुड़े होंगे तो उनके बदले प्रीमियम में भी इजाफा हो सकता है। इसके अलावा आपको यह भी देखना पड़ेगा कि नई पॉलिसी में आपको कुछ खास फायदों से हाथ तो नहीं गंवाना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पॉलिसीधारक की उम्र अधिक है या उसकी सेहत अच्छी नहीं रहती तो बीमा कंपनियां आम तौर पर बीमा पॉलिसी को पोर्ट कराने की इजाजत नहीं देतीं। अगर ऐसे मामलों में वे इजाजत दे भी दें तो नई पॉलिसी में ढेर सारे प्रावधान और बंदिशें जोड़ देती हैं। यदि पॉलिसीधारक को बीमा कराने से पहले कोई ऐसी बीमारी है, जिसके लिए उसे अस्पताल में बार-बार भर्ती होना पड़ता है तो उसका प्रस्ताव खारिज होने की आशंका बहुत अधिक होती है।
 
पोर्टिंग यानी बीमा पॉलिसी बदलने की इजाजत तभी होती है, जब आप पॉलिसी का नवीकरण कराने जाते हैं। अपनी पुरानी पॉलिसी खत्म होने यानी एक्सपायर होने से कम से कम 45 दिन पहले आपको पोर्टिंग के लिए आवेदन करना पड़ेगा। नई बीमा कंपनी को आपकी वर्तमान पॉलिसी के नवीकरण की ग्रेस अवधि पूरी होने से पहले ही बताना होगा कि वह पोर्टिंग की आपकी दरख्वास्त को स्वीकार कर रही है या खारिज कर रही है। पॉलिसी बाजार में हेड-प्रोडक्ट वैद्यनाथन रमानी कहते हैं, 'आपकी ग्रेस अवधि के दौरान अगर आप किसी दुर्घटना के शिकार हो जाते हैं तो आपकी वर्तमान बीमा कंपनी आपको किसी तरह का कवर या बीमा लाभ नहीं देगी क्योंकि आपने अपनी पॉलिसी का नवीकरण नहीं कराया है। लेकिन आप जिस बीमा कंपनी की पॉलिसी लेने के लिए आवेदन कर चुके हैं, यदि उसने आपके आवेदन को खारिज नहीं किया है तो उस अवधि में हुई किसी भी तरह की दुर्घटना के लिए बीमा का लाभ प्रदान करने का जिम्मा उसका है।'
Keyword: health, policy, insurance,,
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