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हवा के साथ-साथ

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  July 08, 2018

चूंकि बात हिंदी सिनेमा की हो रही है इसीलिए मैंने आलेख का शीर्षक भी सन 1972 में आई हेमा मालिनी और संजीव कुमार अभिनीत सुपरहिट फिल्म सीता और गीता के गीत से लिया है। गीतकार हैं आनंद बख्शी। इसका अर्थ एकदम सहज है। यह कहता है कि हवा के रुख के साथ बहते रहिए। मैं पहले कह चुका हूं कि विधु विनोद चोपड़ा और राजकुमार हिरानी की फिल्म संजू, संजय दत्त को एक भोलेभाले पीडि़त के रूप में दिखाती है जो कि एक बेईमान कोशिश है। खासतौर पर उन्हें कुछ बदमाश पत्रकारों से पीडि़त दिखाया गया है। मेरा सवाल यह है कि देश के सबसे प्रतिभाशाली और सफल फिल्मकारों को सत्ता को प्रसन्न करने का जी तोड़ प्रयास क्यों करना पड़ रहा है? ऐसे वक्त में जब रॉबर्ट डी नीरो सार्वजनिक मंच से डॉनल्ड ट्रंप को लताड़ चुके हैं, भारत के सबसे बड़े फिल्मकारों को राज ठाकरे का धन्यवाद ज्ञापन क्यों करना पड़ रहा है?

 
आखिर वह हैं कौन? राज्य की 288 सीटों वाली विधानसभा में उन्हें एक सीट से ज्यादा पर जीत नहीं मिल सकती। 227 सदस्यीय नगर निगम में उनके सात सदस्य हैं। ऐसे में एक बड़ी फिल्म की शुरुआत में मुंबई के पसंदीदा देवता और शुभ कामों में याद किये जाने वाले भगवान गणेश के बजाय राज ठाकरे को धन्यवाद क्यों देना पड़ा? इसका जवाब आसान है, वह भले ही कुछ जीत न सकें लेकिन नष्ट बहुत कुछ कर सकते हैं तो उनसे पंगा क्यों लेना? मुंबई सिनेमा (मैं बॉलीवुड कहने से बचता हूं) का माफियाओं से पुराना रिश्ता है। फिर चाहे वे भूमिगत रहकर काम करने वाले हों या सामने रहकर। बड़ा मुद्दा यह है कि वे सरकार समेत हर प्रभावी वर्ग के सामने समर्पण कर देते हैं और उसकी चापलूसी करते हैं।
 
यह हमारे समाज की हकीकत है कि हमारा रचनाधर्मी वर्ग सत्ता प्रतिष्ठान के साथ रहना चाहता है। अकादमिक जगत, पेंटरों और कुछ हद तक मीडिया को छोड़ दिया जाए तो रचनात्मक और लोकप्रिय क्षेत्र के अधिकांश बड़े नाम सत्ता के सामने झुककर प्रसन्न हैं। चाहे वह सरकार हो या माफिया। हमें शास्त्रीय संगीत से जुड़े लोगों और नृत्य करने वालों को कुछ छूट देनी होगी क्योंकि अभी उन क्षेत्रों में पैसे का उतना बोलबाला नहीं है। सवाल यह है कि सप्ताहांत पर सैकड़ों करोड़ की कमाई के साथ शुरुआत करने वाला और अरबों की लागत के स्टूडियो वाला हिंदी सिनेमा इतना अपमानित होने वाला व्यवहार क्यों करता है? इसकी जड़ें हमारी दरबारी संस्कृति में हैं। महाराजा और बाद में सुल्तान और बादशाह कला और संस्कृति के संरक्षक रहे। अपनी प्रतिभा से पैसा कमाने और मान हासिल करने के लिए आपको दरबारी संगीतकार, नर्तक या चित्रकार बनना पड़ता था। उसके बाद भारत सरकार आई लेकिन दरबारी संस्कृति बनी रही। सरकार ने अनुदान, छात्रवृत्ति, विदेश यात्राओं, प्रदर्शनी, आरामदेह नौकरी आदि की व्यवस्था की, दिल्ली में बंगले आवंटित किए और पद्म पुरस्कारों से नवाजा। दो तरह के रचनात्मक लोगों ने शुरुआत में ही इससे दूरी बना ली: लेखकों, खासकर कवियों और दूसरा चित्रकारों ने। लेखकों ने ऐसा अपने मजबूत वाम जुड़ाव के कारण किया और चित्रकारों ने इसलिए क्योंकि पेंटिंग अब एक बड़ा कारोबार बन चुकी थी जिसमें बहुत पैसा था। 
 
जो लोग सबसे ज्यादा अमीर और शक्तिशाली हैं, खेद की बात है कि वे ही सबसे अधिक डरपोक और कमजोर दिल हैं। गीतकार और कवि गुलजार उन चुनिंदा वामपंथियों में से हैं जिन्होंने रीढ़ दिखाई है। शेष में से ज्यादातर खुशी-खुशी दरबारी बन गए। पिछली कई पीढिय़ों में से गिने चुने सितारे ही वास्तविक और प्रतिस्पर्धी राजनीति में शामिल हुए। अमिताभ बच्चन ने तीन साल के भीतर राजनीति छोड़ दी। उन्होंने कभी एक शब्द ऐसा नहीं बोला जो सत्ता के खिलाफ हो। निर्भया मामले समेत कुछ अन्य मुद्दों पर वह थोड़ा बहुत बोले भी तो उस समय जब तत्कालीन सरकार अपना इकबाल गंवा चुकी थी। हालिया कठुआ और उन्नाव मामलों पर उनकी चुप्पी हम सबने देखी। आप फिल्म में सरकार की भूमिका निभा सकते हैं लेकिन अपने समय की सरकार से नहीं टकराते। राज बब्बर, शत्रुघ्न सिन्हा, हेमा मालिनी, स्मृति इरानी और दिव्या स्पंदना जैसे कुछ नाम अवश्य अपवाद हैं।
 
ऐसे में अगर शीर्ष फिल्मकार भी ऐसा कर रहे हैं तो शिकायत कैसी? हिरानी ने 3ईडियट्स, पीके और मुन्ना भाई शृंखला में कई सामाजिक सोद्देश्यता वाली फिल्में बनाई हैं। चोपड़ा ने मिशन कश्मीर से हमें देशभक्ति का पाठ पढ़ाया और फिल्म में उनके नायकों ने जब उनके गृह राज्य में आईएसआई का खात्मा किया तो हमने भी उनके काम को सराहा। परंतु संजू में उसी आईएसआई को उन्होंने आसानी से जाने दिया है। संजू को एक प्रतिभाशाली लेकिन गड़बड़ चरित्र के बजाय पीडि़त दिखाना जनता के लिहाज से बेहतर बात है। इतना ही नहीं दाऊद इब्राहिम का भाई अनीस (जिसे संजय दत्त ने राइफल, ग्रेनेड और हथियार पाने वाले दिन छह बार फोन किया था) और माफिया अभी भी जिंदा हैं और कराची से अपना कारोबार चला रहे हैं। ऐसे में पंगा क्यों लेना?
 
बड़े सितारों के पास आसान बचाव है। उनका काफी कुछ दांव पर लगा रहता है। आमिर खान ने एक बार बोलने की गुस्ताखी की थी जिसकी कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ी थी। उनके सबसे बड़ा ब्रांड प्रायोजन छोडऩा पड़ा। शाहरुख खान कभी उतना आगे बढ़े ही नहीं और वह अक्सर खामोशी बरतते हैं। बहरहाल उन्होंने कई फिल्मों में मुस्लिम नाम वाले किरदार निभाकर खामोशी से विरोध दर्ज कराया है। वहीं सलमान ने पूरा ध्यान सबका दिल जीतने वाले बढिय़ा हिंदू किरदार निभाने में लगाया। अपनी एक हालिया फिल्म में तो वह आईएसआईएस को परास्त करते नजर आते हैं। आप ध्यान दें कि वह भी संजू की तरह दोषसिद्ध हो चुके हैं।
 
एक आरामदेह दलील यह है कि लोकप्रिय संस्कृति हमारे समय की हकीकत दर्शाती है। भारतीय सिनेमा इसे राजनेताओं और बाजारविदों से भी पहले भांप लेता है लेकिन हिंदी सिनेमा यही काम देरी से करता है। हिंदी सिनेमा के पास नए विचारों की कमी है और यदाकदा सामाजिक मुद्दों को छोड़ दिया जाए तो अक्सर यहां महानायक की छवि ही गढ़ी जाती है। मीडिया इस भय से शिकायत नहीं करता कि उसकी पहुंच सीमित हो जाएगी। संजू को लेकर भी मैं यह शिकायत नहीं कर रहा हूं कि यह पत्रकारों को गाली देती है। मैं समझ सकता हूं कि जब फिल्मकार आसानी से प्रमुख समाचार पत्रों और टेलीविजन चैनलों पर समय और स्थान खरीद सकते हैं, पैसे से समीक्षकों की स्टार रेटिंग बदलवा सकते हैं तो वे पत्रकारों के प्रति तिरस्कार दिखा सकते हैं। मेरा कहना केवल यह है कि इससे सन 1993 के बम धमाकों का इतिहास नहीं बदल जाएगा।
 
फिल्मी दुनिया ताकतवर है और वह गरीबों, मजलूमों, अल्पसंख्यकों का बचाव करते हुए बदलाव की वाहक बन सकती है। लेकिन वह सरकार, राज ठाकरे या दाऊद इब्राहिम जैसे शक्तिशाली वर्ग के सामने झुककर ऐसा नहीं कर सकती। वह सामाजिक पूर्वग्रहों तक को चुनौती नहीं देगी। वह शौचालय पर फिल्म बना सकती है क्योंकि वह सरकार को पसंद आएगी लेकिन हिंदी सिनेमा के शीर्ष 10 नायकों में से किसी ने लंबे समय से दलित या संकटग्रस्त किसान की भूमिका तक नहीं निभाई है। दक्षिण भारत के सुपरस्टार रजनीकांत यह काम गर्व से कर सकते हैं।
 
याद रहे कि यह फिल्मी दुनिया भाइयों के सामने दंडवत हो चुकी है। उन्होंने उनका विरोध करते हुए प्रधानमंत्री से मुलाकात नहीं की बल्कि खामोशी से शांति कायम कर ली। बाद में जब मुंबई पुलिस के निशानेबाजों ने गैंगस्टर्स को निशाना बनाना शुरू किया तो ये उनका गुणगान करने लगे। मैंने एनडीटीवी के अपने शो वॉक द टाक में इनमें से दो दया नायक और प्रदीप शर्मा पर कार्यक्रम किए थे। इन दोनों ने सैकड़ों जान ली थीं। नायक ने बताया कि कैसे नायकों के महानायक ने उनके गांव में उनकी मां के नाम पर बने अस्पताल के लिए धन मुहैया कराया था। इसके बाद कर्नाटक के एक गांव में उस अस्पताल का उद्घाटन करने जाकर भी महानायक ने पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को चकित कर दिया था। परंतु जब यही नायक अदालती चक्करों में फंसे, निलंबित हुए और पकड़े गए (बाद में रिहा भी हुए) तो किसी ने उनकी मदद नहीं की।
 
अब एक नई आशा जगी है। फिल्म जगत के कई नए लोग अपने दिल की बात कहने में हिचकते नहीं हैं और सत्ता पर सवाल भी खड़े करते हैं। ऐसे लोग बढ़ रहे हैं और सफल हो रहे हैं। हालांकि अभी भी सुपरस्टार नहीं हैं और शायद कभी न हों। परंतु उनका दखल बढ़ रहा है। बाकी के लोग चाहें तो हवा के साथ-साथ घटा के संग-संग बहते रह सकते हैं।
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