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कर्ज के बोझ से कराह रहा पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  July 06, 2018

पड़ोसी देश पाकिस्तान में 25 जुलाई को होने वाले आम चुनावों के पहले उसकी अर्थव्यवस्था के बारे में आ रही खबरें खास अच्छी नहीं हैं। पाकिस्तानी रुपये का मूल्य पिछले एक साल में 10 फीसदी तक गिर चुका है और जल्द ही इसको एक और तगड़ा आघात लगने के आसार हैं। पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार केवल दो महीनों के आयात का बिल चुकाने लायक ही बचा रह गया है। जून में रेटिंग एजेंसी मूडीज ने पाकिस्तान की साख को कम करते हुए नकारात्मक कर दिया। अब फाइनैंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) का भी पाकिस्तान को अपनी निगरानी सूची में डालना अंतिम आघात है। उसने कहा है कि पाकिस्तान को इस स्थिति से उबरने के लिए 25 सूत्री योजना पर अमल करना होगा जिसमें धनशोधन एवं आतंकी गतिविधियों को फंडिंग रोकने के लिए कानून बनाना और कदम उठाना भी शामिल है।

 
ऐसी स्थिति में क्या कोई संदेह बाकी रह गया है कि अगस्त आते ही पाकिस्तान को कर्ज के लिए एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) के पास जाना पड़ेगा? आखिर एफएटीएफ के इस कदम का असली मतलब क्या है? कल्पना कीजिए कि आप पाकिस्तान में रेडिमेड परिधान बनाने वाली एक कंपनी के मालिक हैं और अमेरिका एवं यूरोपीय संघ से मिलने वाले निर्यात ऑर्डर पर काफी हद तक निर्भर हैं। किसी अमेरिकी खरीदार से मिलने वाले ऑर्डर को पूरा करने के लिए आपको एक बैंक की मदद की जरूरत पड़ेगी। पाकिस्तान का वह बैंक आपको एक साख-पत्र देगा और अमेरिका में मौजूद अपने साझेदार बैंक को इसकी जानकारी देगा। वह अमेरिकी बैंक उस खरीदार के बैंक से संपर्क करेगा और वित्तीय लेनदेन निपटाया जाएगा। लेनदेन पूरा होने तक भुगतान राशि एक एस्क्रो खाते में रखी जाएगी। रेडिमेड परिधान के खरीदार के पास पहुंच जाने के बाद उस रकम को आपकी कंपनी के खाते में डाल दिया जाएगा।
 
इस पूरी प्रक्रिया में अड़चन यह है कि अमेरिकी बैंक उस पाकिस्तानी बैंक के बारे में पड़ताल करेगा। इस क्रम में जुटाई जाने वाली सूचना के आधार पर पाकिस्तानी बैंक की धनशोधन-निरोधक (एएमएल) एवं आतंक फंडिंग-रोधी (सीएफटी) अनुपालन प्रक्रियाओं की भी समीक्षा की जाएगी। इस रास्ते में पेच यह है कि अमेरिका एवं यूरोपीय संघ के अधिकांश बैंक जोखिम आकलन के लिए जिस तीसरे पक्ष पर सबसे ज्यादा यकीन करते हैं वह एफएटीएफ ही है। अगर एफएटीएफ ही यह कहता है कि किसी अमुक देश के बैंक एएमएल एवं सीएफटी गतिविधियों का समुचित पालन नहीं कर रहे हैं तो स्वाभाविक तौर पर विदेशी बैंक सजग रवैया अपनाने लगेंगे। कुछ मामलों में तो ये विदेशी बैंक उस देश के बैंकों के साथ अपने कारोबारी रिश्ते भी स्थगित कर देंगे। अगर ऐसा नहीं भी करते हैं तो वे पाकिस्तानी बैंकों के साथ कारोबार की शर्तों को काफी कड़ा कर सकते हैं। इसका मतलब है कि पाकिस्तानी बैंकों का बहुत कम या नगण्य विदेशी बैंकों के साथ ही लेनदेन रह पाएगा। जिन विदेशी बैंकों के साथ उनके कारोबारी रिश्ते कायम भी रहेंगे तो जोखिम उठाने के एवज में उन्हें मोटी रकम चुकानी पड़ेगी। लेकिन पाकिस्तानी बैंक भी वह रकम खुद नहीं देगा। उस पाकिस्तानी कंपनी का मालिक होने के नाते इसका बोझ आपके ही सिर पर पड़ेगा।
 
यह कहा जा सकता है कि दुनिया भर में हजारों बैंक हैं और उनमें से सारे बैंक तो एफएटीएफ के नजरिये से प्रभावित नहीं होंगे? यह बात सही है लेकिन बाकी बैंक भी राजनीतिक रूप से अधिक जोखिम वाले इलाके में मौजूद बैंक के साथ कारोबार करने के लिए अधिक शुल्क वसूल सकते हैं। जब पाकिस्तान को पहली बार फरवरी में निगरानी सूची में डाला गया था तो प्रधानमंत्री के वित्त सलाहकार मिफ्ता इस्माइल ने पीटीवी को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इस्माइल ने कहा था, 'निगरानी सूची का मतलब प्रतिबंध नहीं होता है, लिहाजा एक पाकिस्तानी कारोबारी एवं उद्योगपति के रोजमर्रा के कामकाज पर कोई असर नहीं पड़ेगा।' इसके बावजूद उन्होंने यह माना था कि यह पाकिस्तान की छवि के लिए जोखिम वाली स्थिति होगी। उन्होंने कहा था, 'अगर हम बॉन्ड जुटाने के लिए पूंजी बाजार का रुख करते हैं तो निश्चित रूप से हम निगरानी सूची में नहीं रखा जाना चाहेंगे। हमें एक शर्मसार करने वाली स्थिति से दो-चार होना पड़ेगा। इसके अलावा हमें निवेशकों के सवालों के जवाब भी देने होंगे।'
 
अगर पाकिस्तान में विदेशी निवेश का प्रवाह सूख जाता है तो फिर अर्थव्यवस्था किस तरह बढ़ेगी? अगर अर्थव्यवस्था बढ़ती नहीं है तो फिर पाकिस्तान किस तरह बचा रहेगा? आईएमएफ जैसे बहुस्तरीय वित्तीय संस्थान से फंड जुटाना इस सवाल का जवाब हो सकता है।  अब यह लगभग तय है कि नई सरकार के वजूद में आते ही पाकिस्तान आईएमएफ से एक और कर्ज लेने की कोशिश करेगा। लेकिन एफएटीएफ की नई चेतावनी के बाद यह कर्ज मिल पाना थोड़ा मुश्किल होगा। ऐसा इसलिए भी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने गलत हरकतों पर कठोर कार्रवाई करने की रवायत तय कर दी है।
 
हालांकि प्रॉफिट पत्रिका के एक लेख में फारूक तिरमिजी ने कहा है कि इसके बावजूद आईएमएफ से नया पैकेज हासिल कर पाने में पाकिस्तान सरकार कामयाब हो सकती है। फारूक कहते हैं, 'आईएमएफ का पैकेज साल के आखिर में मददगार होगा। लेकिन किसी पोंजी योजना की तरह चल रही पाकिस्तान सरकार के लिए खुद को बचाए रख पाने की तिकड़में अब खत्म होती जा रही हैं। ऐसी हालत आने पर केवल ऊपरवाला ही हमारी मदद कर सकता है। हमने बहुत सारे दुश्मन बना लिए हैं जो उस समय हम पर हंसेंगे और हमें नीचे की ओर धकेलेंगे।'
Keyword: pakistan, loan, economy,,
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